Saturday, 27 May 2023

जैसी संगत, वैसी चढ़े रंगत

कल देर शाम मैं कांदिवली में एक ओला कैब में था... टैक्सी में बैठ कर वक्त कैसे बीते, सब से बढ़िया तरीका है ड्राईवर से गुफ्तगू शुरु कर दी जाए...जो मैं अकसर करता हू्...सब से बड़ी बात होती है ब्रेकिंग-दा-आईस ....याने बात शुरु कैसे की जाए...वह काम कोई मुश्किल नहीं है...बुज़ुर्ग ड्राईवर अगर फुर्ती से अपनी पुरानी गाड़ी भायखला के एस-ब्रिज से भी बड़ी सहजता से निकाल ले आता है तो उस से पूछ लेते हैं कि कितने समय से हैं...कितने समय से टैक्सी चला रहे हैं....बस, एक बार बात शुरू हुई तो फिर सिलसिला चल निकलता है, दूसरे की सुनने के साथ साथ अपने बारे में भी दो बातें कहनी होती हैं, और वह काम कोई मुश्किल नहीं है...कईं बार, जब कोई टपोरी बड़ी बेफ़िक्री से भाग कर सड़क क्रॉस करता है तो फिर बंबई के बिगड़ते ट्रैफिक से बात शुरू हो जाती है ....सौ बातों की एक बात, अगर आपने बात करनी है किसी अंजान से तो बहुत कारण हैं, और अगर बेकार में बिना वजह मुंह फुलाए बैठे रहना है तो वह भी हमारी च्वॉइस है ...

ब्रेकिंग-दा-आईस ..

हां, तो कल जो ड्राईवर था कैब का ...वह एस भीड़ भाड़ वाले एरिया से जैसे ही निकला तो अपने आप कुछ कहने लगा कि इस एरिया में रहने से आदमी तरक्की नहीं कर सकता। आदमी इसी दायरे का हो कर रह जाता है। मैंने उस की हां में हां मिला दी ...क्योंकि मैं तो वैसे ही किसी से भी बातचीत के लिए उतावला रहता हूं...यही चलती फिरती पाठशाला है ....

फिर वह कहने लगा कि मैं भी कुछ साल पहले तक इतना गुटखा खाता था कि क्या बताऊं....बाद में मेरे पूछने पर उसने बताया कि एक सौ रूपये से भी ऊपर का गुटखा हो जाता था। बताने लगा कि सब छोड़ दिया। 

यह कैसे मुमकिन हुआ? - मैंने सवाल दाग दिया...

ग्राहकों से ही मिली सीख ...

बस, तीन कस्टमर मिले अलग अलग वक्त पर उन दिनों जिन्होंने मुझे खिड़की से बाहर गुटखा थूकते हुए टोका, उसने बताया ...और फिर एक बार तो एक बुज़ुर्गवार इंसान के साथ एक महिला थी, उसने तो मुझे खूब झांपा और कहा कि तुम ऐसे कैसे अपना आस पास इतना गंदा कर सकते हो...तुम्हें ऐसा देख कर हमें उल्टी जैसा होता है, चलो, हमें अपने घर ले कर चलो, मैं वहां थूकूं तो तुम्हें कैसा लगेगा - उसने आगे बताया। 
उन दिनों की ही बात है कि उस यादव नाम के ड्राईवर को उसके एक दोस्त ने बताया कि अगर तुम्हें गुटखा छोड़ने में दिक्कत हो रही है तो एक बार मेरे साथ टाटा अस्पताल के कैंसर वार्ड में चलो और देखो कि मुंह के कैंसर से ग्रस्त लोग किस हालात में जीने पर मजबूर होते हैं...

यादव ने बताया - बस, ऐसे ही इतना सब होने पर, तीन सवारियों के टोके जाने पर मुझे गुटखे से नफरत होने लगी ...और मैंने धीरे धीरे उस का इस्तेमाल कम करना शुरू कर दिया। क्योंकि जब मैं गुटखा चबाता था तब मैं चिढ़चिढ़ा सा रहता था, जल्दी में रहता था...कईं बार सिग्नल भी जंप कर जाता था, यही थूकने के चक्कर में ....और फिर धीरे धीरे मैंने इसे चबाना बिल्कुल बंद कर दिया। हमारा नाता यू.पी से है और वहां पर तो इन सब चीज़ों का इस्तेमाल कितना होता है, वह आप जानते ही हैं, पिता जी डायमंड बिजनेस में थे ...और वह निरंतर गुटखा खाते थे...और मैं पांचवी कक्षा से उन का गुटखा चुरा चुरा कर चबाना शुरू कर दिया...एक बार तो पिता जी ने पकड़ भी लिया....

पिता जी ने पकड़ कर अच्छे से ठुकाई की या झिड़क दिया, यह वह बता नहीं पाया,  कैब के सामने कोई वाहन आ गया था। और मैंने भी पुराने ज़ख्‍म कुरेदने की ज़रुरत नहीं समझी....वैसे मैं उस की इस बात से इत्तफाक नहीं रखता कि यह गुटखा अब यूपी की ही समस्या है, यह जानलेवा शौक अब देश के कोने कोने में फैल चुका है ...

और गुटखे की लत से मिल गई निजात ...

उसने बताया कि पिछले साढ़े तीन साल से उसने गुटखा नहीं चबाया ...यह सुन कर मुझे बहुत खुशी हुई...कहने लगा कि सारा दिन थूकने से उस के शरीर से कैल्शीयम कम हो रहा था...खैर, यह उस की सोच थी...गुटखे के नुकसान ही नुकसान...

बहुत बढ़िया, भई ...बहुत अच्छा किया...मैंने कहा और पूछा---वैसे गुटखा छोड़ने के फायदा क्या हुआ?

फायदे ही फायदे हुए...अब मैं ग्राहक से अच्छे से बात कर सकता हूं। वैसे भी कैब में बड़ी बड़ी कंपनियों में काम करने वाले सफर करते हैं तो उन की बातें सुन सुन कर मैंने भी अच्छे से बात करना सीख लिया है। पहले मुझे मुंह खोलने में दिक्कत होती थी, और मेरे मुंह में दो उंगली ही जा पाती थी,अब देखिए तीन उंगली के बराबर मैं मुंह खोल सकता हूं....और मुंह के अंदर जो मुझे मिर्ची-तीखा खाते वक्त लगता था, वह अब नहीं लगता...

वह ३०-३२ वर्षीय युवक बिल्कुल सही कह रहा था... यह मुंह का खुलना कम होना गुटखा खाने वाले में एक महत्वपूर्ण लक्षण है ....और इसे छोड़ने पर बहुत से  मरीज़ों में मुंह के अंदर की लचक वापिस आने लगती है और मुंह पहले से बेहतर खुलने लगता है...

गुटखे की जगह ले ली तंबाकू ने ..

अब, आंवला खाया करो, साग-सब्जी लिया करो और सलाद भी खाया करो, उस से और भी बढ़िया लगेगा...आंवला खाने पर मैंने बहुत ज़ोर दिया तो उसके मुंह से अचानक निकल गया - पूरा ख्याल रखता हूं अपना , बस कभी कभी तंबाकू रख लेता हूं ...वह भी ज़्यादा वक्त के लिए ...थोड़े समय के बाद ही उसे थूक देता हूं..

अब मुझे उसे अपनी पहचान बतानी पड़ी ताकि वह मेरी कही बात मान ले। मैंने उसे समझाया कि ज़हर तो ज़हर है ....चाहे तुम उसे तंबाकू के रूप में इस्तेमाल करो या गुटखे के रूप में चबा लो। चाहे जल्दी थूको या देर से ...तंबाकू के लफड़े से नहीं बच पाओगेे...गुटखा छोड़ दिया तो क्या, अब तंबाकू को पकड़ लिया ....बचो, इस से भी, छोड़ो इसे भी ....मैं रोज़ाना इस से ग्रस्त अनेकों मरीज़ देखता हूं इसलिए कह रहा हूं....

बात उस की समझ में आ गई ...कहने लगा कि छोड़ दूंगा धीरे धीरे ...मैंने कहा - एक ही झटके में छोड़ दो.....

कहने लगा कि यह न हो पाएगा उससे क्योंकि गुटखा भी उसने धीरे धीरे कर के छो़ड़ा था। मैंने सोचा कि इतना भी किसी के क्या पीछे पड़ा जाए, बंदे में विल-पॉवर है तो ..तभी तो गुटखे जैसी नामुराद चीज़ से निजात पा ली उसने, मुझे यकीं था कि तंबाकू भी वह छोड़ देगा...

फॉलो-अप भी कर लेंगे !!

फिर भी लगा कि इस का फॉलो-अप ज़रूरी है ...उसे कहा ...मेरा फोन नंबर और नाम तुम्हारे पास आ गया है, ंतंबाकू छोड़ने पर मुझे वाट्सएप करना....वह कहने लगा ज़रूर करूंगा....मैंने कहा कोई दिक्कत आए तो बताना, मुझ से पूछ भी लेना...कभी भी ....देखूंगा ...कुछ दिन तक नहीं बताएगा, तो खुद मैसेज कर लूंगा .....फोन मैंने भी सेव कर लिया है उस का ....रास्ते में इतनी बातें हुईं...यह तो फिर टाइम-पास हो गया अगर उसने मेरी बात मान कर तंबाकू न छोड़ा ....तंबाकू तो उस का छुड़ा कर ही दम लेंगे हम भी...देखते  हैं...बताएंगे आप को भी .... अपना काम है लोगों को इस भयंकर तंबाकू के किसी भी रूप के बारे में जागरूक करना और तब तक उन की पीछा न छोड़ना जब तक वे इस लत को लात न मार दें....क्योंकि यादव हो, शर्मा हो, कपूर हो, शेट्टी हो या शिंदे,...एक एक बंदे के साथ पूरा कुनबा जुड़ा होता है ...वे सब खुश रहें, स्वस्थ रहें ....यही शुभ इच्छा है ...

मैंने उससे ऐसे ही सरसरी पूछा- तुम ग्रेजुएट हो? ......नहीं, सर, मैट्रिक हूं और बंबई में ही पढ़ाई की है, और जो लोग कैब में बैठते हैं उसने बहुत कुछ सीखा है....👍 जैसे कि बात चीत करने का तरीका, सलीका...बहुत कुछ। 

सही कह रहा था वह ....सयाने भी तो यही कहते हैं ...जैसी संगत, वैसी चढ़े रंगत... 

बस, इतने में कांदिवली स्टेशन आ गया...हम टैक्सी से उतर गए....एक बार उस को फिर मुफ्त की सलाह बांट कर ....😎तंबाकू भी छोड़ दो और मैसेज करो.... 😄..और हां, आगे से जब तीन ग्राहकों की बात किसी को सुनाओ तो मुझे चौथे नंबर वाले की भी सुना दिया करना....😃

कांदिवली ...यादों के झरोंखे से

स्टेशन के बाहर एक बहुत बड़ी लाइन लगी हुई थी रिक्शा के लिए ....कम से कम ५० लोग होंगे उस लाइन में ....लोकल गाड़ी पकड़ने से पहले स्टेशन के बाहर एक बहुत मशहूर वडे़-पाव की दुकान दिखी ....मशहूर का पता हमें देखते ही चल जाता है जिस तरह से लोग वहां जमघट लगा कर खड़े थे, उससे सब पता चल जाता है..हमने भी वड़ा-पाव खाया, और साथ की दुकान से दो गिलास गन्ने का रस पिया और किसी के पूछ कर प्लेटफार्म पर आ गए....शायद मैं २७-२८ साल बाद कांदिवली स्टेशन आया था ..१९९५ के अगस्त महीने में यहां दो तीन हफ्तों के लिए आता था ...एस एस वॉय का कोर्स किया था ...वह भी ज़िंदगी में एक टर्निंग-प्वाईंट से कम न था ...शाम के वक्त तीन घंटे की क्लास लगती थी ...और बंबई सेंट्रल से एक घंटा आने का और एक घंटा कांदिवली से वापिस लौटते वक्त...लेकिन जवानी के दिनों के क्या कहने .....हम लोग हंसते खेलते यह सब नया कुछ भी सीखने के लिए करते ऱहते थे ...

इस पोस्ट का कोई खास मकसद नहीं था, बात सिर्फ इतनी सी है कि आपस में हम सब बात करते रहना चाहिए, कोई बंदा भी परफेक्ट नहीं है, क्या पता किस की कौन सी बात किस की ज़िंदगी बदल दे, यह सच में होता है, हमने देखा है, और अभी आपने यह सच्चा किस्सा भी पढ़ लिया..बात करने से ही बात बनती है। ऐंठे ऐंठे , अलग थलग रहने से कुछ नहीं होता, सिरदर्द के सिवा.....हम ने वह भी अजमाया हुआ है। 

चलिए, कांदिवली जहां गए थे वहां की कुछ फोटू ही दिखा दें आप को ....

बहुत से श्रमिक प्लास्टिक के इन बेल-पत्तों से सजावट करते दिखे....मैंने कहा वह गाना सुना होगा....रूप ले आएंगे, रंग ले आएंगे....ये कागज़ के फूल...खुशबू कहां से लाएंगे...यह सुन कर हंसने लगे...

जहां गए थे वहां की पहली मंज़िल पर पोडियम का एक नज़ारा -खुशनुमा एकदम 



चिट्ठीयां तो लोग लिखते नहीं अब....लैटर-बॉक्स बराबर लगाए जा रहे हैं... 


मल्टीलेवल पार्किंग ...आज किसी ने बताया कि उन के यहां तो "पज़ल-पार्किंग" है....पूछने पर पता चला कि यह नाम इसलिए है कि आप अपनी गाड़ी खड़ी करिए, वह अपने आप उस जगह पर पहुंच जाएगी जहां तक उस वक्त पार्किंग स्लॉट खाली मिलेगा...

कांदिवली स्टेशन पर मखाने देख कर हमें भी खाने की इच्छा हुई..स्टॉल पर मिल रहे थे, खरीद लिए ...१६ ग्राम बीस रूपये के ..हवा से लैस हुए लिफाफे में ...😀😂😎

अब गाना कौन सा लगाऊं...उमस बड़ी है, कल बरसात का गीत लगाया था....और कल शाम को मैं ड्रम्स बजा रहा था, सीख रहा हूं बिल्कुल किंडरगार्डन के छात्र की तरह यू-ट्यूब से ....दो छोटे ड्रम्स खरीद लिए हैं...कल मैं बजा रहा था ..बहुत अच्छा लग रहा था, बेटे ने देखा फोटो खींचने लगा...विडियो बनाने लगा ....मैंने पूछा ..यार, कैसे लगा................उसने कहा ...वाह, बाप, वाह ....बस, इतना देख लेना, बाप, आप के बजाने से कहीं बरसात ही न शुरू हो जाए....😂😃😎😇

Thursday, 25 May 2023

बारिश आने से पहले ....

बारिश के आने से पहले ...बारिश से बचने की तैयारी जारी है ...लोकल ट्रेन में दिखा यह विज्ञापन दो दिन पहले 

आज सुबह उठा, बॉलकनी से बाहर देखा तो ज़मीन पर पानी दिखा...यह न पता चल सका कि रात में बरसात हुई या फिर पानी के जो टैंकर रोज़ाना बिल्डिंग में आते हैं उन से पानी बह गया होगा...फिर भी मौसम के मिज़ाज बदले बदले दिखे..खुशग़वार...सिर थोड़ा भारी हो रहा था, सोचा बहुत दिन हो गए सुबह टहलने गए हुए...अजीब अजीब तरह के बहानों की वजह से ...कि लेट उठा लूं, ड्यूटी पर लेट हो जाऊंगा, अब धूप निकल आई है, कल चले जाएंगे ....सब के सब स्कूल के बच्चे के बहानों की तरह कच्चे, अपने दिल को दिलासा देने के लिए....खैर, चलिए, आज सुबह टहलने निकल ही गया...और बिना मोबाइल के ही ...और सड़कों पर भी रात में हुई बारिश के कुछ सुराग मिल गए...😎मलाल भी हुआ कि बारिश की पहली बूंदों से मिल ही न पाए ...

बाग़ में पहुंचते ही बरसात की कुछ बूंदें सिर पर पड़ी --हल्की हल्की बूंदाबांदी हुई कुछ पलों के लिए...दिल की किसी अंदर की तह में यह डर भी लगा कि अगर यह तेज़ हो गई और मैं भीग गया तो मेरा सिर दुःखने लगेगा ...खैर, ये मानसून के नहीं, प्री-मॉनसून की एक प्यारी सी फुहार थी ....अच्छा हुआ मोबाइल घर छोड गए थे, वरना या तो उस की फ़िक्र करने लगते या शेल्फी लेने के चक्कर में पड़ जाते ...

सुबह सवेरे धूप से बचने का कोई मेडीकल कारण भी हो सकता है 

हम लोग धूप से बचते फिरते हैं, तेज़ धूप से बचना भी चाहिए....कुछ दिन पहले मैंने एक महिला को देखा सुबह सैर करते वक्त भी वह छतड़ी का इस्तेमाल कर रही होगी...तरह २ की सनस्क्रीन अब घरों में डिस्कस होने लगी है, ये लगाओ बहुत ज़रुरी है, इस में इतना बचाव है ....लेकिन अब तक हमने कभी न तो इसे लगाया है और न ही कभी लगाएंगे...अब इस उम्र में क्या करेंगे ये सब चोंचलेबाज़ी...धूप में निकलना नहीं बन पाएगा तो घर ही बैठेंगे ...नहीं निकलेंगे बाहर ...

ये जो बड़े बड़े लेखक होते हैं ये सहज भाव से कुछ भी लिख देते हैं लेकिन उन की बातें हमें मुहावरों-कहावतों-लोकोक्तियों की तरह, अपने बड़े-बुज़ुर्गों की सीख की तरह दिन दिन कईं बार याद आती हैं....गुलज़ार ने बारिश के आने से पहले वाली अपनी नज़्म में एक बहुत अच्छा कटाक्ष किया है ...किस तरह से बारिश के आने से पहले हम लोग उस से बचने की तैयारी कर लेते हैं...पढ़िए आप भी ...

ठीक से पढ़ न पाएं तो इमेज पर क्लिक कर के पढ़िए...

बचपन था तो उस दौर में मौसम भी अलग थे, हम पहली बरसात हो या आखिरी उस में भीगने के लिए तैयार रहते थे....जानबूझ कर छाता न ले कर जाते ...ऊपर ऊपर से नाटक करते भीग गए हैं लेकिन अंदर से खुश होते ...सड़क कर इक्ट्ठा हुए पानी में हो कर निकलना....कईं बार जब बर्फबारी होती तो उन छोटे छोटे बर्फ के गोलों को इक्ट्ठा करना और उन को खाने का मज़ा लेना...और सब को कहते सुनना कि आज तो यहां ही शिमला-मनाली बन गया है ..

फिर बेसौसमी बर्फ के ओले गिरने लगे ..और सारी ज़मीन को कभी भर देते तो हम डर भी जाते कि यार, यह तो कुछ गड़बड़ मामला है, यह कुदरत का रौद्र रूप है ...कहीं दुनिया ही तो खत्म नहीं होने वाली ...क्योंकि आस पास बड़े बुज़ुर्ग को भी अकसर यही कहते सुना करते थे ... 

कुदरत के साथ प्यार से रहने वाले संदेशे, अपनी औक़ात में रहने के रिमाँइडर हमें कहीं से मिलते रहते हैं..हम देख कर अनदेखा करें, वह हमारे ऊपर है ...लगे रहो मुन्ना भाई में यह जो बात सुनाई दी थी, उसे सुनिए, यहां क्लिक करिए..

हां, असल बात तो मैं करना भूल गया कि यह जो गुलज़ार साहब की कही बात मुझे याद ऐसे आई कि परसों शाम मैं एक लोकल ट्रेन में दादर से चढ़ा ..तो यह रेन-कोट का इश्तिहार देखा- फ़ौरन यही ख्याल आया कि अभी तो मानसून ने दस्तक भी नहीं दी कि हम लोगों की तैयारी हुई....मैंने जैसे ही इस की फोटो ली, साथ बैठे बंदे ने भी वैसा ही किया....वैसे मैंने कभी रेन-कोट पहना नहीं, एक बार खरीदा था, लेकिन शायद ही एक-दो बार पहना हो, मुझे इतने भारी-भरकम कपड़ों से सिर दुखने का डर रहता है ....और मुझे उसे पहनना ही बडा़ झंझट लगता है। खरीदा तो था मैंने लेकिन बिना इस्तेमाल के पड़ा पड़ा ही कट गया...और फिर उसे फैंक दिया...

रेन कोट से ख्याल आया...डकबैक कंपनी की सेल का ...यह दुकान बंबई के फ्लोरा फाउंटेन के ठीक पीछे हुआ करती थी (अब है या नहीं, पता नहीं) लेकिन ३० बरस पहले की यादे हैं कि मुंबई की मॉनसून के दौरान उस डकबैक के शोरूम में छतरीयों, रेनकोटों, हॉट-वॉटर बोतलों आदि की सेल लगा करती थी ...उन दो चार दिनों के लिए वहां मेला लगा होता था ....मैं भी गया था एक बार वहां ...अब तो छतरीयां, रेनकोट एडवर्टाइज़िंग के लिए, फैशन स्टेटमैंट के लिए इस्तेमाल होने लगे हैं...लेकिन हम लोगों को तो वह लंबा सा छाता, जैसे स्कूल के मास्टर , गांव के डाकखाने के बाबू रखते थे फिल्मों में ...हमें अभी भी वही अच्छा लगता है ...लगता है बंदा बारिश से बच रहा है ....लगना भी तो ज़रूरी है ...

बारिश पर लिखे गए फिल्मी गीत हमें कितने अच्छे लगते हैं....मैं तो जैसे ही इस के बारे में सोचता हूं ...एक के बाद एक मेरे दिमाग में दस्तक देकर उसे थका देते हैं...अभी भी ऐसा ही हुआ...मुझे यह गीत याद आया...यू-टयूब पर सर्च किया...हैरानी हुई ...इसलिए कि मैं इस गीत को तो बहुत ज़्यादा पसंद करता हूं लेकिन इस का वीडियो देखते हुए मुझे क्यूं ऐसे लगा कि मैं पहली बार इसे देख रहा हूं...यह फिल्म भी मुझे याद नहीं आ रही ......कोई नहीं, शाम को देखता हूं ....अभी उठूं और ड्यूटी पर भागूं.....शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है, सुनने में अच्छा लगता है, उड़ लिया ख्वाबों में थोड़ा इस तरह के गीतों का सहारा लेकर, लेकिन यथार्थ के धरातल पर भी लौटना ज़िंदगी की सच्चाई है ...😎

Sunday, 21 May 2023

बम्बई में दैनिक भास्कर की एंट्री ...

२२ मई २०२३ 

मुझे कल सुबह बोईसर में टाटा होम्स की एक टाउनशिप में कोई आशियाना देखने जाना था ...यही कोई आठ बजे के पास बोरिवली पहुंच गया और डहानू रोड़ के लिए किसी गाड़ी की इंतज़ार करने लगा...एक लोकल ट्रेन आई लिखा था उस पर डहानू रोड लेकिन बीच में कुछ स्टेशनों पर घोषणा होते सुनी कि यह गाड़ी पालघर स्टेशन पर ही खत्म कर दी जाएगी...आगे आज रेल्वे का जम्बो-ब्लॉक है....

पालघर ...अब एक ज़िला है ....(रेलवे स्टेशन..प्लेट-फार्म नं १).. .साफ सुथरा स्टेशन...

पालघर की दूरी मुंबई से १०० किलोमीटर से कुछ ज़्यादा है ...गाड़ी वहीं तक थी तो वहां उतरना ही था, अभी विचार कर ही रहा था कि बाहर से रिक्शा ले लूं कि बोईसर जाने वाली ट्रेन का इंतज़ार करूं ...१० किलोमीटर की दूरी है पालघर से बोईसर की ..इतने में प्लेटफार्म नंबर १ पर ए.एच.व्हीलर की दुकान दिखी ....बचपन से ही इन दुकानों से हमारा गहरा रिश्ता रहा है ....स्टेशन पर पहुंचते ही चंदामामा, पराग, नंदन, लोटपोट, मायापुरी...इन सब के पन्ने उलटने पलटने के लिए पहुंच जाते ...और हमेशा एक-दो खरीद भी लेते ....पुरानी आदतें नहीं छूटतीं ...यह आदत आज भी कायम है। 

पालघर का बुक स्टाल जहां हमारी दैनिक भास्कर मुंबई से मुलाकात हुई 

विभिन्न अखबारों को ताक रहा था कि दैनिक भास्कर अखबार देख कर आंखें उसी पर टिकी की टिकी रह गईं। सब से पहले ख्याल यही आया कि पालघर में यह पहुंच गया लेकिन मुंबई में नहीं...फिर उस को ध्यान से देखा तो पता चला कि यह तो मुंबई ही में छपा है। हैरानी हुई, कोई खबर नहीं हमें इस के आने की ...हमारे वर्तमान महानगर में इतनी बड़ी घटना हुई और वाट्सएप यूनिर्वसिटी से भी इस के बारे में पता न चला...

दुकानदार ने बताया कि यह ९ मई से बंबई से छपना शुरू हुआ है...मैंने उसे खरीदा और पढ़ना शुरू किया...दैनिक भास्कर को २००५ से २०२० तक उत्तर भारत के विभिन्न नगरों में रहते हुए पढ़ते रहे हैं...यहां मुंबई में नहीं दिखता था...अखबार एक ऐसी चीज़ है जिसे कोई किसी के कहने से नहीं पढ़ता और किस के हाथ में कौन सी अखबार होगी, यह भी वह खुद ही तय करता है। इसलिए अकसर हम लोग देखते हैं कि लोगों का अपने टुथपेस्ट, शेविंग क्रीम की तरह अपनी अखबार से भी एक भावनात्मक जुड़ाव सा हो जाता है ...

मुझे दैनिक भास्कर को वहां से लेकर बहुत खुशी हुई ...और यह हैरानी भी हुई कि यह अखबार के मुंबई में प्रवेश करने की खबर हमें बंबई से १०० किलोमीटर दूर पालघर में हासिल हुई...खैर, मिल गई, यही अच्छी बात है ...

अच्छा, पिछले लगभग १५ से भी ज़्यादा वर्षों से लोग कहते रहे हैं कि अब सारे अखबार लैपटाप-मोबाइल में आ गए हैं, इसलिए कहीं का भी अखबार कहीं बैठे बैठे देख लो.......वह सब हम जानते हैं लेकिन दिल का क्या करें, वह तो कमबख्त कागज़ की साक्षात अखबार को हाथ में पकड़ कर, फोल्ड करने, उस पर फांउटेन पेन से गोले लगाने, कुछ पंक्तियों को अंडरलाइन करने, एक -दो कतरन लेने और उन्हीं समाचार-पत्र के पन्नों को हाथ में लिए लिए सो जाने और सपने बुनने से बाज़ ही नहीं आता। जब अखबार हाथ में आता है न तो वह अपना लगता है ...यह हमारी मानसिकता है, इस का आप विश्लेषण कुछ भी करें...

कल के दैनिक भास्कर में छपे ये नंबर इस्तेमाल कीजिए....

कुछ अखबारें पढ़ते हुए अपने स्कूल में पढ़े-लिखे हुए समाचार पत्र के निबंध का ख्याल आ जाता है, दैनिक भास्कर जैसे अखबार में भी सभी आयुवर्ग के पाठकों के लिए कुछ न कुछ बढ़िया रहता है ....आप के लिए क्या है, आज ही से इसे लगवा लीजिए और इसे पढ़ने का आनंद लीजिए....

और जाते जाते एक बात तो लिखनी भूल गया....वहीं पालघऱ स्टेशन पर बैठे बैठे दैनिक भास्कर को पढ़ा कल भयंकर गर्मी थी ....दैनिक भास्कर को हाथ में लेकर दिल को ठंडक तो मिल चुकी थी लेकिन शरीर पर लगने वाली उमस भरी तपिश के लिए क्या करता, उस के लिए वहां के मशहूर एवं मीठे चीकू और मलाई वाला नारियल पानी बहुत काम के साबित हुए ....सारी तपिश ..रूह की, शरीर की भी जाती रही ..😎
वाह रे, पालघर के चीकू...तेरा भी जवाब नहीं!!

 बढ़िया मीठे चीकू और मलाईदार नारीयल पानी से बढ़िया नाश्ता क्या होता होगा🙌

शीर्षक लिखते वक्त एक बार लगा कि लिख दूं ..बम्बई में दैनिक भास्कर की हुई धमाकेदार एंट्री ..लेकिन यही लगा अगर कुछ धमाकेदार हुआ ही नहीं, उस के लिए किसी लफ्‍ज़ का इस्तेमाल करना खुशामद होगी, जो हमें गवारा नहीं ....जो बात हुई ही नहीं, उसे कैसे दर्ज कर दें और वह भी अपनी डॉयरी में, अखबार का पता ही हमें मुंबई से १०० किलोमीटर दूर जने पर चला..वैसे हमने कल २१ मई २०२३ का अखबार संभाल कर रख लिया है ..सोविनर की तरह ...😄... मुंबई में भी धाक जमाने के लिए दैनिक भास्कर को ज़रूरत होगी बहुत मेहनत करने की ...नीचे एक फिल्मी गीत में एक बालक किस तरह से अपना अखबार बेचने के लिए कितनी मशक्कत कर रहा है...दैनिक भास्कर को भी ऐसे ही इस महानगर के जन-मानस के दिलो-दिमाग में जगह बनानी होगी ....क्योंकि अब हम भी तो इस महानगरी की रग पहचानते हैं ....ज़्यादा नहीं तो थोड़ी सी सही। 

और जिस काम के लिए बोइसर गया था उस आशियाने की खिड़की से भी एक नज़ारा देखिए...एक बार तो लगा कि यहीं रूक जाऊं..क्या करना है वापिस उस कंकरीट के जंगल में जाकर ....फिर पापी पेट का ख्याल आ गया जो कमबख्त भरने का नाम ही नहीं ले रहा 😁😎😇...!!

बोइसर के टाटा होम्स के जिस आशियाने को देखने गया था, वहां से बाहर का मंज़र कुछ ऐसा दिख रहा था ...

डा प्रवीण चोपड़ा 
मुंबई 

Tuesday, 16 May 2023

मुर्गा बांग देता है ..और टांग दिया जाता है ...


वाट्सएप विश्वविद्यालय की कक्षाओं में पढ़ी हुई कुछ बातें, कुछ लतीफ़े याद रह जाते हैं...जैसे यही बात कि इस दुनिया की रीत ऐसी है कि इसे जिसने भी जगाने की कोशिश की, उसे ही सदा के लिए सुला दिया जाता है ...और साथ में लिखा हुआ था...मुर्गा सुबह सुबह बांग देकर हमें जगाता है और हम उसे ही टांग देते हैं...बात सच में सोचने लायक लगी। 

आज की टाइम्स में इस नगरिया की एक खबर पढ़ कर दिल दहल गया...दो दिन पहले मुंबई के गोवंडी लोकल स्टेशन पर दो लड़के रात में सिगरेट पीने के लिए माचिस ढूंढ रहे थे ...जिस युवक से उन्होंने माचिस मांगी, उसने माचिस की बजाए उन को गाली दी कि इतनी छोटी उम्र में सिगरेट पीते हो ...बस, उन दोनों ने उसी वक्त जेब से चाकू निकाला और उस युवक को वहीं का वहीं चाकू के गोद कर ढेर कर दिया... (यह पैरा मैंने ९ मई को लिखा था..) 

यह गुलशन नंदा या सुरेंद्र मोहन पाठक के किसी नावल से लिया गया वाक्या नहीं है ....सच्ची घटना है। 

इसलिए मैं भी नॉन-वेज पर लिखते हुए थोड़ा झिझकता हूं....लेकिन ब्लॉग है, अपनी डॉयरी में कुछ भी लिख तो सकते ही हैं...कुछ मंज़र आते जाते रास्तों में ऐसे दिख जाते हैं कि बिना लिखे, बिना उन को दर्ज किए चैन भी नहीं पड़ता....क्या करें...

बंबई में मैं जहां रहता हूं वहां पर हमें सुबह सुबह कौओं की आवाज़ें ही सुनती हैं ....चलिए, कुछ तो सुनता है और अगर करीब के एक बाग में चले जाएं तो वहां सुबह सुबह मुर्गा बांग दे रहा था ....आज भी उस की बांग सुनी तो सोचा कि बाग से बाहर आते वक्त उस के पिंजरे में उसे देखते आएंगे .....लेकिन दिखा नहीं, क्या पता उसे बांग दिलाने के लिए माली कहीं किसी दूसरे एरिया में ले गया हो....इस शहर में कुछ भी मुमकिन है ....

दो दिन पहले मैं एक बाज़ार से निकल रहा था ...एक मुर्गे की दुकान के बाहर एक लोहे की तार से बनी टोकरी में गुर्गे ठूंसे पड़े थे, चलिए, वह तो अब आम बात दिखती है ...लेकिन उस तारों वाली टोकरी के ऊपर एक मुर्गा खड़ा था...मुझे अचानक हैरानी सी तो हुई एक बार कि यार, यह इतनी शांति से कैसे खड़ा है, फिर मुझे लगा कि अभी इस पर चाकू चलने की बारी होगी...इसलिए उस बड़े से पिंजरेनुमा शो-केस में से निकाल कर ऊपर रख दिया होगा...फिर भी मैं उसे दूर से देखता ही रहा ...एक अजीब सा ख्‍याल यह भी आया कि खड़ा तो ऐसे है जैसे इस को फेवीकोल से चिपका दिया गया हो...मैं आगे निकल गया...

वापिस आते वक्त मुझे उसी रास्ते से आना था ...मैंने थोड़ा सा ध्यान से देखा तो उस के पैर के पंजों को एक पतली सी रस्सी की मदद से उस शो-केस से बांधा हुआ था...मुझे यह देख कर बेहद पीड़ा हुई ...अगले दिन देखा एक की जगह दो मुर्गे इस ड्यूटी पर लगे थे कि लोगों को दूर से पता चल सके कि इधर आइए, मुर्गा आप के सामने हलाल किया जाएगा...मैं जब भी उस मंज़र को याद करता हूं तो दिल दहल जाता है ...

दिल दहलने से याद आया ...यही कोई दो तीन साल पहले की बात है ...एक २०-२२ बरस का युवक सुबह सवेरे एक बाज़ार से पैदल निकल रहा था ...और उस के दोनों कंधों पर मुर्गे टंगे हुए थे ....उन की टांगें बंधी हुईं और उल्टे लटकाए हुए...आदत से मजबूर मैंने एक तस्वीर तो खींच ली लेकिन इस डर के चलते कि यह कहीं वॉयरल हो कर समाज को अमन चैन ही न खराब कर दे, उसे किसी के साथ शेयर नहीं किया...


लेकिन, वक्त बीतने के साथ मैंने देखा कि मुर्गों को इस तरह से लेकर चलना .कंधों पर उल्टा लटका के, या हाथों में उल्टा पकड़ कर ...टांगें बांध कर ....या फिर साईकिल-स्कूटर की पिछली सीट के दोनों तरफ़ टांगे बंधे हुए मु्र्गे लटकाए हुए अकसर दिख जाते हैं ...वे पंक्षी इतने खौफ़ज़दा और इतने डरे-सहमे, बीमार दिखते हैं कि उन्हें देख कर यही लगता है कि इन्हें काट के क्या ताकत मिलेगी, क्या किसी की खून की कमी पूरी हो जाएगी....कुछ नहीं होगा, सिवाए इसके कि इतने खौफ़ज़दा परिंदे को मार कर खाने से ज़िंदगी में खलबली ही मचने वाली है ...और कुछ नहीं...

बंबई में ही नहीं, लखनऊ में भी मैं अकसर देखा करता था कि मुर्गे जो बिकने के लिए वाहनों में जा रहे हैं, वे एक दम डरे-सहमे, सिमटे हुए, दुबके हुए ...बीमार से, और इतने बीमार की उन के पेट फूले हुए और ऊपर से पंख गायब ....ये सब हम आप देखते हैं ...और इन मुर्गों को जल्दी से बड़ा करने के लिए जो कुछ खाया-पिलाया जाता है, और कईं बार मीडिया में इन को जो इंजेक्शन लगा कर हृष्ट-पुष्ट करने की तस्वीरे दिखती हैं, वे सब विचलित करने वाली होती हैं....यह भी कितनी अजीब सी बात है कि हमारा मन तो विचलित होने से ही घबरा रहा है और जिन की जान पर रोज़ बन आती है...उन का क्या !

यह धर्म-मज़हब की कोई क्या बात करे इस देश में ....विज्ञान की ही बात करनी मुनासिब है ......और वह यही है कि मानव शरीर की संरचना मांस-मच्छली खाने के लिए हुई ही नहीं है, अगर हम खाते भी हैं तो यह कुदरत के नियमों के ख़िलाफ़ है, लेकिन हमें क्या परवाह कुदरत की ....

इतनी गलतफहमियां हैं - इतनी भ्रामक जानकारियां है नॉन-वैज से संबंधित कि क्या कहें.....जो इन के बारे में सचेत करते है सच में कईं बार ऐसे लगता है कि बांग देने वाली है ...और इस के कुछ भी नतीजे हो सकते हैं...इतने बीमार, इतनी तकलीफ़ मे, इतने भूखे प्यासे मुर्गे खा कर क्या बनेंगे......बाई-सैप्स, ट्राई-सेप्स ...जब ये परिंदे इतने डरे-सहमे-बीमार होते हैं तो इन के शरीर में बहुत से हार्मोन्स रिलीज़ होते हैं ......और मीट मुर्गा खाने वाले उस विष को भी गटक जाते हैं ..खुशी खुशी ...चटखारे लगा के ...लज़ीज़ बटर-चिकन के ज़ायके के मतवाले उंगलियां चाटते भी तो देखे होंगे आपने ...

मुनव्वर राणा कहते हैं ...

एक निवाले के लिए मैेने जिसे मार दिया ..

वह परिंदा भी कईं दिन का भूखा निकला...

मैं अकसर देखता हूं कि मुर्गे की दुकान पर जिस फट्टे पर इन के टुकड़े किए जाते हैं उस पर दर्जनों टांगे पडी़ होती हैं मुर्गे की ....मुझे आज ख्याल आया कि क्या ये खरोड़े होते हैं...मैंने गूगल किया ....मुझे तब पता चला कि खरोड़े ये नहीं, वे तो बकरे के पैर होते हैं...


खरोड़ें मुझे याद इसलिए आते हैं कि अमृतसर के ऐतिहासिक हाथी गेट के अंदर ही हमारा स्कूल था...और उस के बिल्कुल आस पास कुछ रेहड़ीयां लगी देखा करते थे ...खरोड़े के सूप की ....कभी पिया तो नहीं लेकिन इस की तारीफ़े खूब सुना करते थे....और असलियत तो हम अब जानते हैं कि यह है क्या, आपने भी पढ़ ही लिया....अच्छा, लिखते लिखते याद आया कि जैसे ही खरोड़ों के खोमचों की लाइन खत्म होती ...और तंबाकू की दुकानें शुरू हो जातीं ...जहां से आने वाली बदबू की वजह से हमेें उन दुकानों के सामने से जल्दी आगे निकल जाने की जल्दी होती .......और ठीक स्कूल से सामने होती ...ताज़ा ताज़ा पतीसे की दुकान -महाजन की ..हमें तो उसे ही खाने से मतलब होता ....वह स्वाद, वह महक जो उन दिनों वहां के पतीसे में थी, वह फिर कहीं नज़र न आई ....चवन्नी (२५ पैसे) का पतीसा वह खुशमिज़ाज़ महाजन कागज़ में लपेट कर इतना दे देता कि वह सारे रस्ते खत्म ही न होता.....एक एक रेशा अलग पतीसे का ....देखिए, हम लोग भी ज़िदगी की किताब पढ़ कर फिर स्कूल में प्रवेश किया करते थे ...और एक पाठ, हाथी गेट के बाहर अमृतसर का श्मशान घाट ...उस उम्र में हमें उस के सामने से निकलते डर लगता था कि भूत-प्रेत, कोई आत्मा ही न गले पड़ जाए...

और कहीं जानवरों के लिए भी इतना प्यार कि देखने वाले की आंखें भीग 
जाएं इन को देख कर 

अकसर मैं सोचता हूं कि यह ब्लॉगिंग वॉगिंग का चक्कर भी बांग देने जैसा ही काम है, अंज़ाम कुछ भी हो सकता है, ....लोग बेकार में खीझने लगते हैं....खीझ समझ में आती है ....कुछ आत्माएं ऐसी भी दिखीं ब्लॉगिंग के इन १५ बरसों में जो इस बात से परेशान हैं कि यह लिख कैसे लेता है यह सब ...हम सब भी सोचते यही हैं, लेकिन लिख नहीं पाते......उस का जवाब यही है कि कुछ भी करने के लिए, कुछ सीखने के लिए  ज़िंदगी के बरसों-बरस उसे देने पड़ते हैं, कोई काम रातों-रात नहीं हो जाता.....मैने भी दिए है लेखन को २२-२३ बरस....और पूरी इमानदारी से कर रहा हूं ....लेकिन मुझे पता है कि अभी भी मैं सीखने की स्टेज पर ही हूं ....किसी को कुछ भी लगे...पर यह एक समंदर है, और समुद्र-मंथन कहां किसी मानस के बस की बात है ....बस, कभी कभी वाहनों के पीछे लिखी बात यूं ही याद आ जाती है......स़ड़ न, रीस कर ...(जलो नहीं, प्रेरणा लो)... 

(लेखक ने ३० बरसों से मांस-मच्छली का सेवन नहीं किया) 



Friday, 5 May 2023

रेल के सफ़र का एक दिन ....

स्कूल में पढ़ते थे निबंध लिखने को कहा जाता था ...और इस तरह के विषयों पर ....रेलवे स्टेशन का दृश्य, गाड़ी का एक सफ़र ....कुछ दिन पहले मुझे बार बार यह ख्याल आ रहा था कि उस दौर में कितनी कम गतिविधियां चल रही होती थीं रेलवे स्टेशनों पर ...इस से हमारा काम आसान हो जाता था ..हमें कुछ बातें तो लिखनी होती थीं ...कुली के बारे में कि वह लाल कपड़े पहने हुए लोगों के भारी भरकम सामान को यहां से वहां ले कर जा रहा है, दूसरी बात कुछ चाय-नाश्ते या पूरी-छोले के खोमचों के बारे में कहनी होती थी ...साथ में जैसे ही गाड़ी स्टेशन पर रुकी ...चाय, चाय, गर्मागर्म चाय....बस, इस तरह की दो चार किस्से विस्से ऊट-पटांग लिख देेते, हमारे हिंदी के मास्साब हमें पास कर देते, और क्या .....

मज़ा तो अब आए अगर कोई इस तरह के विषयों पर कुछ लिखने को कहे ...लेकिन एक दिक्कत है, अब तो स्टेशनों पर और गाडि़यों में इतनी गतिविधियां एक साथ चल रही होती हैं कि उन का ट्रैक रखना मुश्किल हो जाए ....और वैसे भी अब स्टेशनों पर इतने रौनक-मेले हैं लेकिन स्कूल के बच्चों में अमूमन लिखने में कोई ज़्यादा रूचि है नहीं...बीस-तीस बरस से की-बोर्ड का ही तो बोलबाला है ..लिखने की आदतें छूटती जा रही है आज की पीढ़ी में ...जो है सो है, स्वीकार करिए या नकारिए, इस से कुछ फ़र्क नहीं पड़ता ...

लेकिन आज के स्टेशनों और ट्रेनों पर नावल, उपन्यास अगर कोई न भी लिखना चाहे तो एक लघु-उपन्यास जैसा तो कभी भी लिख सकता है ...बस, यही भावना थी इस पोस्ट को लिखने के लिए कि कभी एक दिन के सफर के बारे में लिखूंगा ...ज़ाहिर सी बात है, अब लिखने में यह छूट है कि जो मेरा दिल चाहेगा वही लिखूंगा....मास्साब नहीं है कान खींचने के लिए, एक बात ..दूसरा, कोई प्रतिक्रिया (फीडबैक) अगर देगा तभी न पता चलेगा कि कहां क्या कमी रह गई ...

सुबह के वक्त में बांद्रा स्टेशन 

खैर, चलिए, बांदरा स्टेशन से शुरू करते हैं...रेल की यात्रा आज सुबह ६-६.३० बजे बांदरा स्टेशन ही से शुरू हुई....मेरी आज भी माइक्रोमैनेजमेंट में कोई रूचि नहीं होती ...स्टेशन पर पहुंच गए हैं तो गाड़ी भी कोई न कोई मिल ही जाएगी...लोकल ट्रेनों की बात नहीं कर रहा हूं..बाहर गांव (आउट-स्टेशन ट्रेन) गाड़ियों की बात कर रहा हूं...। बादंरा स्टेशन की चमक दमक देखिए सुबह सवेरे ....देखिए कैसे चमक रहा है ...मैं पिछले लगभग ढाई बरस से बांदरा स्टेशन के पुनर्त्थान का साक्षी रहा हूं ...इस की सुंदरता को इतनी कामयाबी से बहाल किया गया है कि स्टेशन पर पहुंचते ही पहले तो इस की बिल्डिंग से नज़र नही ं हटती....

एक बात और क़ाबिले गौर यह है कि जैसे हम लोगों के दिन में कई तरह के मूड आते जाते हैं, वैसे ही गौरवशाली इमारतों, प्राचीन कलाकृतियों, बागों, रास्तों का हुस्न भी दिल में कई बार अलग अलग छटा बिखेरते हुए दिखता है ...इस को मैं इस पोस्ट के अंत में साबित भी करूंगा ...पढ़ते चलिए....😎...हां, सुबह के उस वक्त वहां अखबारें बेचने वाले हाकर्स का बोलबाला था....और यह काम उस वक्त वहां होता दिखता ही है ...

वहां से फॉस्ट लोकल लेकर मैं दादर के लिए निकला ...निकला क्या कहूं, अगर कहूं कि उड़ गया तो ज़्यादा बेहतर होगा...कुछ पांच छः मिनट में दादर आ गया....चूंकि मुझे नासिक जाना था इसलिए मैं पश्चिम रेल से मध्य रेल की तरफ़ चला गया...उस के उस प्लेटफार्म पर चला गया जहां पर बाहर गांव गाड़ियां भी आती है और कल्याण और उस के आगे के लिए फॉस्ट-लोकल भी ...मैंने प्लेटफार्म पर नीचे उतर कर एक बंदे से पूछा - पूछने की भी रिवायत है हम लोगों की, क्या करें, पुरानी आदतें....इतनी बढ़िया एनांउसमैंट हो रही है, और इंडीटेकर पर सब कुछ अच्छे से इंडीकेट किया जा रहा है....लेकिन पूछने की आदत ...हां, मैंने उस बंदे से पूछा कि कौन सी गाड़ी आ रही है....उसने अगला सवाल दाग दिया - आपने जाना कहां है..... मैंने कहा-नासिक......कहने लगा कि वह मनमाड़ एक्सप्रैस तो अभी एक मिनट पहले निकली है ....। मैंने कहा कोई बात नहीं, और भी आएंगी ...यह किस गाड़ी का नंबर लिखा हुआ है ....उसने बताया ...वंदेमातरम का नासिक रोड होते हुए शिर्डी साईबाबा धाम पर जाती है....मुझे यही लगा कि देखते हैं, आए तो पता करूंगा...खैर, वह तो अभी न आई, उस से पहले कल्याण की फॉस्ट लोकल आ गई ....स्टॉप भी कम थे ...उस पर बैठ कर मैं सात सवा सात बजे के आसपास कल्याण पहुंच गया, मुंबई की फॉस्ट-लोकल गाड़ीयां चलती नहीं है, उड़ती हैं जैसे.....वहां उतर कर पता चला कि ७.१७ पर लोकमान्य तिलक टर्मिनस से चल कर गोरखपुर जाने वाली गाड़ी आएगी....

जिन की मेहनत और हौंसले पर इस महानगरी का विकास टिका हुआ है ...


सूरज मामू भी जागे ...

खैर, अभी मैं कल्याण प्लेटफार्म पर हो रहे निर्माण कार्य का जायजा लेने की कोशिश कर ही रहा था कि वहां एक स्मार्ट सी ट्रेन आ कर रूकी ...वंदेमातरम जो शिर्डी साई बाबा धाम जाती है ...नासिक होते हुए....मैंने सोचा कि देखता हूं, इस के दरवाज़े खुलते हैं तो टीटीई से पूछता हूं ...लेकिन यह क्या, दरवाज़ा कोई भी न खुला....मुझे लगा कि शायद जिसने अंदर जाना होगा, उसे बाहर से ही खोल कर अंदर जाना होगा...मैंने ऐसे ही एक हैंडल या बटन को हाथ लगाया, उस से क्या होना था, बस दिल की तसल्ली ही देनी थी ....गाड़ी तुरंत चल पड़ी...जैसे ही गाड़ी चली मेरे दूसरे साथियों का फोन आया किसी काम के बारे में...बात चीत हुई तो पता चला कि वे भी वंदेमातरम से नासिक ही जा रहे हैं...मैंने कहा कि वह तो मेरे सामने ही अभी निकली है, लेकिन उस के दरवाज़े ही नहीं खुले। तब उसने कहा कि दरवाज़े नहीं खुले, क्योंकि कल्याण में इस का हॉल्ट नहीं है...मुंबई के उपनगरीय स्टेशनों पर बहुत बढ़िया विकास कार्य हो रहे हैं....जगह जगह एस्केलेटर्ज़, लिफ्टें लग रही हैं...इंडीकेट्रस अच्छे लग रहे हैं....इन सुविधाओ की वजह से लोगों की ज़िंदगी आसान हो जाती है...

खैर, दो पांच मिनट के बाद गाड़ी आ गई....वही गोरखपुर जाने वाली गाड़ी...चढ़ तो मैं गया लेेकिन ठसाठस भरी पड़ी थी ...पब्लिक से ज़्यादा भारी भरकम सामान से ...जहां मैं कुछ वक्त बैठा वहां पर साइड की नीचे ऊपर की सीटें एक दंपति की थीं., सैकेंड ए.सी का कोच था...उन के चार रिश्तेदार उन का सामान लेकर जैसे तैसे जल्दी जल्दी सामान पटक तो गए..उस बंदे ने सीट के नीचे पूरी जगह में वह सामान बिछा दिया...और ऊपर वाली सीट पर भी भारी भरकम सामान ही टिका दिया....मुझे तो यही लग रहा था कि ऊपर वाली बर्थ कहीं नाराज़ हो कर नीचे ही न लुढक जाए ...लेकिन रेलवे की सीटों की ताकत तो आप जानते ही हैं....


गोपाल दास नीरज थे बहुत नामचीन गीतकार ......वह अकसर कहा करते थे ...जितना कम सामान रहेगा, उतना सफर आसान रहेगा....इतने सामान की वजह से जब तक यह कुनबा अपने ठिकाने पर न पहुंच जाएगा, वह सफ़र का आनंद कितना ले पाएगा, कितना नहीं, यह वही जानें.....लेकिन जब सामान को टिकाने की वजह से एक सीट से हाथ ही धोना पड़ जाए तो इसे आप क्या कहेंगे, लिख दीजिएगा नीचे टिप्पणी में ....

उस दंपति का सामान देख कर मुझे यही लगता रहा कि यह भारतीय रेल में ही संभव है कि टिकट के साथ कोई इतना सामान ले कर चल सकता है ...ख्याल आया कि कुरिअर करवाने जाते हैं तो अब अच्छी कंपनियां चार-पांच सौ रूपये की फीस मांगती हैं, सरकारी स्पीड पोस्ट का रेट भी बिलकुल वज़न पर आधारित है ...लेकिन रेलवे में लोग सवारी गाड़ियों में जितना सामान लेकर चलते हैं अगर हवाई जहाज़ से लेकर जाना चाहें तो दिवाला निकल जाए....वहां तो हम जाने से पहले कैसे सुनिश्चित करते हैं कि अटैची १५ किलो से ज़्यादा तो नहीं लग रही ......लेेकिन भारतीय रेल कि दिल बड़ा खुला है....यह मैं नहीं कहता, आप हम रोज़ देखते हैं...चलिए, मै उन का तामझाम देख कर और पानी का १० लिटर की कैन देख कर समझ तो गया कि ये तो लंबे सफर के राही हैं....लेकिन वह हेल्दी सा बंदा नीचे सीट पर पसरा रहा, उन का प्यारा बाबू अपने बापू के पेट पर मस्ती करता रहा ..बंदा लईया, चना, चूरा खाता रहा ....बेटा तो सो गया लेकिन वह औरत की हालत खराब हो रही थी ..कहां बैठे वो......मुझे यही लगता रहा कि ३६ घंटे ऐसे बैठे बैठे इस का क्या हाल होगा, क्योंकि वह "हेल्दी" बंदा तो जिस तरह से उस साइड वाली नीचे की बर्थ पर पसर चुका था, मुझे उठता हुआ नहीं रहा था ....उसे तो चूरा खाने से और बीच बीच में पानी पीने से मतलब था...

नासिक रोड स्टेशन पर यह बोर्ड लगा देख कर अच्छा लगा...

चलिए, मैं तो थोड़े समय के लिए ऊपर वाली बर्थ पर सो गया था...भारतीय रेल की मेल-एक्सप्रेस गाड़ीयां कब उड़ती हुई आप को आपके ठिकाने तक पहुंचा देती हैं, पता ही नहीं चलता...नासिक रोड पहुंच तो गया ..सोचा चाय पी लूं....लेकिन मेरे लिए चाय पीना इतना आसान कहां है। मैंने स्टेशन के बाहर आकर कोई चाय की गुमटी को ढूंढना चाहा ..लेकिन कहीं न दिखी, शायद मुझे ही न दिखी हो ...खैर, चाय कहां से पीनी है इस के बारे में अपने फंड़े बहुत पक्के हैं...जिस चाय की दुकान या ठेले पर सारा शहर उमड़ा हुआ होता है ...रिक्शेवाले से लेकर, सुबह टहलने निकले हुए दोस्त लोग....और जिस चाय वाले को फुर्सत नहीं यहां वहां देखने की ....ऐसी दुकानों की भट्ठी पर रखी पीतल के बडे़ पतीले में पक रही चाय की खुशबू ही आप को बुला लेती हैं, आप को वहां जाना ही पड़ता है, हर शहर में ऐसे खोमचे और गुमटीयां होती ही हैं......देखिए, मुझे ऐसी कुछ जगह अमृतसर की याद आ रही है तो साथ में वेसन के लड्डू याद आ रहे हैं, जिन का दौर चाय के साथ चलता था हमारे ज़माने में, लखनऊ की यादों में हज़रतगंज के पास ही शर्मा टी स्टाल की चाय जो बडे़ बडे़ स्टार और नेता लोग वहां पीने आते थे ....वह यादों में है, साथ में बन-मस्का (जो मैंने ज़िंदगी में कहीं नहीं खाया) और साथ में समोसे (समोसे मुझे लखनऊ के कभी पसंद नहीं आए...एक दम मोटे-मोटे छिलके वाले (जब तक लखनऊ में रहा और समोसे खाने की गल्ती की, उस कच्चे मैदे की वजह से अपने सिर को ही दुःखाया..)....खैर, चाय शर्मा टी स्टॉल के तो कहने ही क्या ...

रेहड़ी पर खड़े होकर केले खाने के भी अपने अपने आदाब हुआ करते हैं...पंजाब-हरियाणा दिल्ली में अगर आप उसे कहेंगे तो वह केले को चाकू से बीच में से कट लगा कर, नमक लगा कर आप को देगा...मुझे तो कहना पड़ता था कि नमक कम लगाइए.....घरों में हम कहां नमक लगा कर केले खाते हैं...

चाय की कोई अच्छी सी दुकान की टोह लेते लेते मुझे यह केले की रेहड़ी देिख गई....मैंने दो केले खाए .....जब छिलके फैंकने के लिए कचरे वाली टोकड़ी के बारे में पूछा तो उस महिला ने ऐसे ही इशारा किया कि यहीं कहीं पास ही में रख दीजिए....अजीब लगा इसलिए क्योंकि अब हमें भी बीच बाज़ार में, सड़कों पर केले खाते खाते उस के छिलके को कचरेदान में फैंकने की आदत पड़ गई है...इस में सब से ज़्यादा भूमिका मां की रही जिसने बचपन से समझाया बार बार कि केले का छिलका इधर उधर गिराने से किसी दूसरे की टांग टूट सकती है....उन्होंने ऐसा कहीं होते देखा था...वह बात ऐसी दिलोदिमाग पर हमारे भी घर कर गई कि आज भी सड़क, फुटपाथ पर कहीं केले का छिलका पड़ा मिलता है तो पहले उसे ठिकाने लगाते हैं, फिर ही आगे चलते हैं....खैर, नासिक में उस केले की रेहड़ी से यह पता चला कि या तो यहां पर ऐसे बीच बाज़ार खड़े होकर केले खाने का रिवाज़ है नहीं या फिर केले के छिलके के निशाने इधर उधर मारने का चलन है, अब क्या पता सच्चाई क्या है....और दूसरी बात, उस रेहड़ी पर यह देखी कि उस महिला का साइड-बिजनेस भी था, मोबाइल आयल बेचने का .....मैं अभी केले खा ही रहा था कि एक रिक्शा वाला आया, और उस महिला ने खुद उस की टैंकी में मोबाइल ऑयल डाला........शाम के वक्त जब लौट रहे थे तो हमारे एक साथी ने बताया कि यहां केरोसीन से आटोरिक्शा चलते हैं, इसलिए उन में यह मोबाइल ऑयल डालना पड़ता है। मुझे यह नहीं पता कि क्या केरोसीन से भी आटो चल जाते हैं, वैसे वाट्सएप ज्ञानी तो पानी पर भी चलाने की बातें कहते रहते हैं....

कारण कुछ भो हों, बुज़ुर्गों की दुर्दशा देख कर मन दुःखी होता है, हमारा तो यह भी मानना है कि समाज में शातिर लोगों को बदनसीब, मुफ़लिसी झेल रहे लोग दिमाग से खिसके हुए ही लगते हैं..लेकिन ऐसा है नहीं, अगर कभी ऐसे हालात हो जाएं कि हमें भी दो एक दिन नहाने का मौका न मिले, खाना न मिले, दाढ़ी बढ़ जाए, कपड़े मैले-कुचैले हों तो हम भी दूसरों को दिमागी तौर पर बीमार लग सकते हैं...बड़ा मुश्किल होता है....रोटी-कपड़ा-मकान के बिना ख़ुद को कायम रख पाना नामुमकिन हो जाता है...लगभग ३० बरस पूर्व मैं और मेरी मां एक भयंकर बाढ़ की चपेट में आ गए थे, हम उसमें घिर गए थे...दो-चार दिन में होश ठिकाने लग गए थे ...वो एक अलग किस्सा है....मैं यह फोटो नहीं लगाना चाहता था, हिम्मत है ऐसे जुझारू लोगों की जो अपने दम पर जैसे तैसे जी ले रहे हैं...दुआएं ही कर सकते हैं इन बेघर उलझे हुए लोगों के लिए कि इन की ज़िंदगी भी सुलझे और सुधरे ...अपनी छत और ढंग का खाना-कपड़ा नसीब हो सब को ...


और हां, केले खाते खाते मेरी नज़र पड़ गई सामने ही एक स्टेशनरी की दुकान पर ...मैं जहां भी जाऊं किसी भी शहर में ....पिछले लगभग २५ बरसों से अगर वहां से पुराने दौर के फाउंटेन पैन मिलते हैं तो मैं उन को ज़रूर खरीद लेता हूं ..मैं फाउंटेन पेन कलेक्टर हूं ..कल उस दुकानदार के पास यही तीन तरह के थे, खरीद लिए ....दो चल रहे हैं, एक नहीं....अब शौक के सामने गारंटी की भी तमन्ना करना आज के दौर में बेवकूफी सी लगती है ...

मैंने उस दुकानदार से पूछा कि मुझे पंचवटी जाना है फलां फलां मेरिज-लॉन में तो वहीं खड़े दूसरे बंदे ने सामने खड़े एक आटो की तरफ़ इशारा किया कि यह आप को सीधा वहां ले जाएगा...मैं आटो रिक्शा में बैठ गया...रास्ते में एक बहुत बड़ा प्राचीन दिखने वाला पेड़ सड़क के बीचों बीच दिखा तो मैंने उसे कहा कि रुको, यार, मुझे इस की फोटो खींचनी है ...उसने तुंरत रिक्शा साइड में लगा दिया...देखिए, कितना खूबसूरत पेड़ हैं, आते जाते को ठंडक का अहसास करवाता, उन के सिर पर हाथ जैसे हाथ रख रहा हो ....मुझे मेरा लिखा एक पोस्टर याद आ रहा है, देखता हूं उसे भी दिखाता हूं आप को ....

मैं नई जगहों पर बडे़ बडे़ पेड़ों की तस्वीरें खींचने से खुद को नहीं रोक पाता ....सब से पुरानी ऐसी फोटो मेरे पास बंगलोर शहर की है....जहां पर मुझे इस तरह का एक पेड़ दिखा था ...वैेसे तो आज मैंने इस पेड़ के साथ एक शेल्फी भी ली थी, लेकिन उसमें मैं उम्र से भी ज़्यादा बूढ़ा लग रहा हूं ....इसलिए नहीं दिखा रहा😎...वैसे तो मुझे कुछ लोग कहते हैं कि मैं अपनी उम्र से दस साल बड़ा दिखता हूं, दिखता हूं तो दिखता हूं, क्या करूं...जान ले लूं अपनी....लेकिन मैं ऐसी बातों की तरफ़ कान लगाता ही नहीं ताकि मुझे वह ज़ेहमत भी न करनी पड़े कि पहले एक कान से उसे अंदर लूं, फिर दूसरे से बाहर निकालूं ...इतना वक्त किस के पास है ...ठीक है, जैसे हैं बिल्कुल बढ़िया हैं, मस्त हैं, अपने आप से खुश है...ऐसा कहने वालों की ऐसी की तैसी ....हटाओ यार..!!

एक तो ये पानी के मटके मुझे बहुत लुभाते हैं....पिछले कुछ दिनों से इन पर एक लेख लिख रहा हूं लेकिन हो ही नहीं पा रहा ....जितनी हमारी उम्र है, उतनी ही गहरी और पुरानी यादें है इन मिट्टी के बर्तनों से जुड़ी हुईं...

इतनी तीव्र इच्छा होती है कि फ़ौरन एक उठा लूं ...लेकिन क्या करता, उसे शादी वाले हाल में कैसे ले जाता ....और फिर वहां से ट्रेन में ले कर घूमता फिरता, मेरी भी फोटो कोई ले लेता, उस गोरखपुर वाले पैसेंजर के सामान की तरह 😇



निदा फ़ाज़ली साब के अल्फ़ाज़ का जादू देखिए ....

मैं पेड़ की फोटो खींच कर वाापिस रिक्शा में बैठा ही था कि ड्राईवर ने बताया कि आपने अगर पुराने पेड़ देखने हैं तो तपोवन जाइए, यह भी नासिक ही में है, वहां पर जो पुराना पेड़ है, उसे भगवाना श्री राम के द्वारा रोपा गया था, उसने बताया, मुझे याद आया जैसे मैं पहले वहां पर जा चुका हूं । आगे एक पुल से गुज़र रहे थे, मौसम भी अच्छा था ....गोदावरी नदी का बोर्ड देखा। आटो वाले ने बताया कि यहां बारिश के मौसम में नदी पूरी ऊपर तक भर जाती है, उसने बताया कि यहां पर बरसात मुंबई से भी ज़्यादा होती है....अभी हमारी बातचीत चल ही रही थी कि वह विवाह-स्थल आ गया जहां जाना था....


लीजिए, घर बैठे आप को गोदावरी मैया के भी दर्शन करवा दिए ..🙏

तीन चार घंटे वहां बिताने के बाद जब हम वहां से लौटने लगे तो हमारे एक साथी ने पूछा कि कौन सी गाड़ी मिलेगी इस वक्त ..मैंने कहा कि हम इतना सोचते ही नहीं, गाड़ी तो मिलेगी ही..कोई न कोई ...हमारा काम स्टेशन तक पहुंचना है....वैसे भी हम उस दौर के हैं मैंने उसे बताया जब गाड़ी के छूटने से आधा एक घंटा पहले प्लेटफार्म पर पहुंच कर अपने बड़े से लोहे के ट्रंक पर बैठ कर और पास ही पड़े उस पहाड़ जैसे होलडाल से कुछ निकालने के चक्कर में उसे खोल कर फिर बंद करने के चक्कर में, पूरी-छोले खाते खाते, चंदामामा-नंदन खरीदते, पानी की सुराही खरीदने और उसे पानी से भरने भराने के चक्कर में वक्त का पता ही न चलता था, ऐसे लगता था जैसे स्टेशन पर पिकनिक मनाने आए हुए हैं...मौज-मेला-रौनक-मेला देखते देखते पता चलता था कि अमृतसर के प्लेटफार्म नंबर एक पर अपनी गाड़ी लग गई है ...

नासिक रोड स्टेशन पर दोपहर साढ़े तीन बजे के करीब पहुंचे तो प्लेटफार्म पर पहुंचते ही पांच मिनट में एक गाड़ी भी मिल गई, काशी एक्सप्रेस, यह भी गोरखपुर से बनारस होते हुए बंबई जा रही थी ....साथियों के साथ बातचीत करते वक्त का पता ही न चला....बीच बीच में किसी दूसरे यात्री की आवाज़ भी कान में पड़ जाती जो मोबाइल पर किसी रिश्तेदार से चल रही होती ..बेटा, मुश्किल ही लग रहा है, चार बोरे हैं...२५-२५ किलो के चावल के ...बैग तो छोटा ही है..., शायद इतने भारी-भरकम बोरों के बारे में सुन कर उस मुंबईया रिश्तेदार ने कन्नी कतरा ली होगी, उस के बाद मोबाईल पर कोई और आवाज़ न सुनाई दी ..। इतने में पास बैठे एक यात्री ने पूछा कि हमें मालाड जाना है ...किसी से मिलने ..हम सब तीनों साथियों ने और पास बैठे एक अन्य यात्री ने "to the best of our knowledge and ability" हम ने उन को अपनी अपनी तरफ से पूरे का पूरा ज्ञान उंडेल दिया ...लेकिन उन की रात में दो बजे इराक की फ्लाईट थी ...लेकिन उन के पास भी ५० किलो का कुछ सामान था, बता रहे थे......इसी के चलते उन्होंने सभी जगह के प्रोग्राम रद्द कर दिए......बैठे रहे होंगे किसी प्लेटफार्म पर, सामान की निगरानी करते करते और आगे की उड़ान के सपने संजोते ...

हम लोग कल्याण स्टेशन पर उतर गए ..क्योंकि हम तीनों को जिस जिस जगह जाना था, यह काशी एक्सप्रेस वहां से हो कर नहीं जाती, यह सीधा लोकमान्य तिलक स्टेशन पर जाती है ...कल्याण से हमें डेक्कन एक्सप्रेस गाडी मिल गई ...जिसने हमें चालीस मिनट में दादर स्टेशन पर छोड़ा ...वहां से हम सब की राहें अलग थीं...वहां से मैं पश्चिम रेलवे की लोकल ट्रेन से बांदरा तक आने से पहले दादर स्टेशन के बाहर चला गया...और फिर लोकल ट्रेन से पांच सात मिनट में बांदरा आ गया ..

बांद्रा स्टेशन (पश्चिम) 


बांद्रा स्टेशन की इस गरिमामयी झलक के लिए रेलवे ने पिछले ढाई बरस बहुत मेहनत की है ...बस बाहरी चमक दमक ही नहीं, वहां पर सुविधाएं -एस्केलेटर, लिफ्टें, इंडीकेटर, प्लेटफार्मों के फर्श और इन के स्टालों की खूबसूरत साज-सज्जा, सब कुछ दिलकश है....



आपने ऊपर वाली तस्वीर में बांद्रा स्टेशन का सुबह का यौवन देखा, देखिए शाम के वक्त इस स्टेशन का हुस्न ...यह भी मुंबई की नाइट-लाइफ का हिस्सा है, इस की रोशनी और इस की सजावट के क्या कहने ....नाइट-लाइफ सिर्फ़ नाइट-क्लबों में ही नहीं दिखती, हमारे आस पास भी हमारे महानगरों की ज़िंदगी-ज़िंदादिली हम महसूस कर सकते हैं ... हम इन की थोड़ी सी भी परवाह करते हों अगर ... 

इतनी चमक दमक के बीचों बीच स्टेशन के बाहर एक किनारे में यह १२० साल पुराना पत्थर ...टर्नर रोड जब इस रोड का नामकरण हुआ होगा ...बहुत कुछ समझाता है, सोचने के लिए कहता है कि सब वक्त का खेल है...लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं...😎...असलियत इस पत्थर की आज यह है कि यह एक नज़र बट्टू से ज़्यादा कुछ नहीं लग रहा ...

PS.....मुझे जाना तो था ...नासिक के इलाके पंचवटी में लेकिन मैं पता नहीं कितनी बार पंचमढ़ी और पंचगणी कहता रहा ....जहां जाना था, वह जगह थी, औरंगाबाद रोड ......मैंने एक दो बार कह दिया ..ओस्मानाबाद रोड़। सुबह ट्रेन में बैठने पर किसी से पूछा कि पंचवटी में इस गाड़ी का स्टॉप है, तो उसने बताया कि जब इस नाम का स्टेशन ही नहीं है तो कैसे होगा स्टॉप ....किस्से कहानी लिखना अलग बात है, लेकिन अपने दरअसल अपने ज्ञान का स्तर बस यहीं तक है ..😎

शीर्षक तो था, रेल का सफर ...लेकिन इसमें उस के अलावा भी बातें आ गईं ...कोई नई बात नहीं मेरे लिए ...स्कूल में उत्तर-पुस्तिकाओं के पन्ने भी हम इसी तरह लिख लिख कर काले करते रहते थे...मास्साब को खीझ कर पास करना ही पड़ता था ...वैसे भी किस्से कहानियां पढ़ने में लुत्फ तो आया ही होगा उन्हें भी ....😎😁....उन सब स्कूल के मास्टरों की याद को सादर नमन....

Thursday, 4 May 2023

मुंबई के डिब्बे वालों को सलाम....




हम लोग आते जाते वक्त कार-टैक्सी में बैठे हुए मोबाइल में किस क़द्र खोए रहते हैं कि आस पास देखने की भी हमें फ़ुर्सत नहीं होती...इसलिए एक चौक पर जिधर से अकसर मैं गुज़रता हूं - भायखला का एस-ब्रिज ....भायखला (वेस्ट) स्टेशन से थोड़ा आगे चल कर ...चिंचपोकली की और जाने वाली सड़क पर ...यही दो तीन महीने हुए होंगे कि मैंने इस चौक पर एक बहुत बड़ा पीतल का खाने का डिब्बा स्थापित हुआ देखा तो मुझे देख कर मज़ा आ गया ..एक दम चमकता-दमकता हुआ पीतल का डिब्बा ...

पीतल की कुछ भी चमकती-दमकती चीज़ दिख जाए तो मुझे बड़ी खुशी होती है ..क्योंकि जब तक हम आठ-दस बरस की उम्र तक नहीं पहुंचे थे ...घर में हर तरफ़ पीतल ही पीतल छाया हुआ था...सब से पुरानी याद है ...पहले दिन स्कूल जाते वक्त मां ने पीतल की एक छोटी सी डिब्बी में एक परांठा डाल कर दिया और उस के बीचों बीच गुड़ की एक छोटी डली रख दी ...अभी घर से निकलने ही लगा था कि पिता जी आ गए दोपहर के खाने के लिए....वह मुझे घर के किवाड़ पर ही मिल गए और उन्होंने मुझे उन दिनों चलने वाला दस पैसे का पीतल का सिक्का दिया और मुझे दूर तक देखते रहे ...साथ में मेरा दोस्त देवकांत था ..हम लोग चल पड़े स्कूल की तरफ़...चलिए, उस सफ़र को अभी यहीं पर छोड़ते हैं, वरना ये डिब्बे वालों की बात बीच में रह जाएगी....


मैं उस चौक पर स्थापित पीतल के इस डिब्बे को आते जाते दो तीन बार देख कर समझ गया कि इसे मुंबई के डिब्बे वालों की सेवाओं के सम्मान में यहां पर स्थापित किया गया होगा...सोचा, फोटो खींच लूं, लेकिन भीड़ इतनी थी कि वह हो नहीं पाया, बड़ा भीड़ भाड़ वाला इलाका है। इस की फोटो खींचने का मौका मुझे दो दिन पहले मिला ...और आज सुबह जब टाइम्स आफ इंडिया पढ़ रहा था तो उस में इन से जुड़ी एक खबर भी दिख गई कि किंग्स चार्ल्ज की ताजपोशी जो ६ मई को लंदन में होनी है, उस के लिेए मुंबई डिब्बा वालों ने एक पगड़ी और एक शाल किंग्ज चार्ल्स को भिजवाई है और इस ताजपोशी से जुड़ा एक समारोह कुछ दिन पहले जब मुंबई के ताज होटल में आयोजित हुआ तो उसमें ये डिब्बे वाली भी विशेष निमंत्रण पर वहां गए थे...

जब प्रिंस चार्ल्स मुंबई में आए थे तो इन्होंने डिब्बे वालों को निमंत्रण भिजवाया था अपनी महफिल में आने के लिए ...तब से इन का और डिब्बे वालों का एक भावनात्मक नाता कायम हो गया है। इन के महान् काम के बारे में अकसर अखबारों में हम पढ़ते ही रहते हैं....पढ़ते तो रहते हैं ठीक है, लेकिन आज कल ये उस तादाद में नज़र नहीं आते जितना इन का काम २०-३० बरस पहले हुआ करता था, यह मेरा अनुमान ही है .....पहले तो मुंबई के लोकल स्टेशनों में इन के डिब्बों की वजह से और भी रौनक हुआ करती थी...

आज मुंबई में इस डिब्बेवाले के दीदार हो गए ....

आज मैंने एक बाज़ार में शाम को एक डिब्बे वाले को देखा ..लेकिन अब बहुत से डिब्बे वाले साईकिल पर चलते नज़र आते हैं....यह भी मेरा अनुमान ही है ...क्योंकि मैं इन की कार्य-प्रणाली के बारे में ऊपर ऊपर से ही जानता हूं ...हम लोग तो नौकरी के सिलसिले में जितना वक्त भी बंबई में रहे, घर भी बिल्कुल नज़दीक ही होते थे, खाना खाने चले जाते थे ....लेकिन इन डिब्बे वालों ने मुंबई के दफ्तरों में काम करने वाले, दुकानें चलाने वालों आदि की खूब सेवा की ....भले लोग...इन की वेशभूषा और टोपी एक दम से महाराष्ट्र की पारंपरिक पोशाक के अनुसार दिखती है....



आज सुबह मैं पैदल ही यह चौक क्रॉस कर रहा था तो मैं इस बोर्ड को पढ़ने लग गया और जिन का इस पर नाम है, उन के बारे में पूछने लगा ..बोर्ड के पास ही खड़े एक बुज़ुर्ग से ...उन्होंने बताया कि वह तो ऊपर चले गए हैं....लेेकिन डिब्बे वालों का वह नेता चिंचपोकली नाके के पास रहता था....मेरे मुंह से ऐसे ही निकल गया कि आज कल डिब्बे वाले कम दिखते हैं...तो वह कहने लगे कि अब कपड़े की मिलें कहां हैं, हैं क्या, जब थीं तो इन के पास बहुत अच्छा काम था, मिल वर्करों को भी यही डिब्बे वाले ही खाना सप्लाई करते थे ...अब मिले ही नहीं रहीं तो डिब्बे वालों का काम भी कुछ मंदा पड़ा हुआ है , और कुछ कोरोना की वजह से भी काम पर असर पड़ा है....हम दुआ करते हैं कि इन का काम बढ़िया चलता रहे, सब के काम धंधे चलते रहें ...क्योंकि ऐसे ही आम खास लोगों से इस मुंबई महानगरी की पहचान है, दूर दूर तक धूम है ...इन के अनुशासन एवं प्रबंधन के चर्चे हैं...नीचे एम्बेड की गई वीडियो को देखिए...


PS...पीतल की दो बातें तो लिख कर दर्ज कर दूं...मैंने ऊपर लिखा न कि हमारे ज़माने में पीतल का ही हर तरफ़ बोल बाला था ....इसलिए आज भी पीतल सोने से भी अच्छा लगता है हमें। कभी सोने की अंगूठी तक नहीं पहनीं, लेेकिन पीतल की शौक से पहन लूं...पता नहीं लोग पीतल के गहने क्यों नहीं पहनते, सोने से कम खूबसूरत थोडे़ न दिखते हैं....अच्छा, घर में सभी बर्तन पीतल के ही थे बचपन में...और नियमित उन की कलई करने के लिए हर गली-मौहल्ले में कलई करने वाला आता था ...वह हम के लिए बड़ा स्पैशल बंदा होता था....जब वह कहीं दिख जाता, हम उस के पास ही बैठ जाते, उस की भट्ठी जलने से लेकर, कलई होने तक और उस के बाद भट्ठी के बुझ जाने तक जब तक वह अपना सारा सामान साईकिल पर लाद न लेता ..उस दौर के बच्चों के सभी अन्य काम स्वतः स्थगित हो जाते...उस की भट्ठी चलने की आवाज़, आर उस का कलई करने के बाद पानी में बर्तन को डुबोना...फिर शूं.....शूं की आवाज़ का आना.....सब कुछ बहुत अच्छा लगता था हमें ...और उस की चुस्ती फुर्ती भी ...वह भी खुश दिखाई देता इतने बच्चे उसे घेरे रहते ....वाट्सएप पर एक लतीफा पिछले दिनों बड़ा चल रहा था न कि अकेलेपन से तो शेर भी परेशान हो जाता है ... 😎....फिर १९७० का दशक आया, लोग झोले भर भर के पीतल के बर्तन बाज़ार लेकर जाने लगे और स्टील के बर्तन लेकर आने लगे ...खुशी खुशी ....पहले तो थोड़ा विरोध भी होता था क्योंकि अफवाह थी कि स्टील इस्तेमाल करने से कैंसर हो जाता है ....लेकिन जो सुविधा स्टील की वजह से हुई ...न तो राख से घिस घिस के चमकाने की मशक्कत और न ही बार बार कलई करवाने का खर्च ...फिर तो हर तऱफ. पीतल ही दिखने लगा ...सच में माहौल पीतलमय हो गया....यहां तक कि त्योहारों के वक्त दरवाज़ों के पीतल के हैंडिल आदि की पीतांबरी से सेवा होने लगी...उन को चमकाने के लिए....😎

जब भी कभी किसी एंटीक शाप में जाता हूं तो पीतल की डिब्बीयां, पीतल के फ्रेम, पीतल के शो-पीस इत्यादि देख कर दंग रह जाता हूं ...अगर किसी चीज़ से नज़र हटने का नाम नहीं ेलेती, तो खरीद भी लेता हूं ....पीतल के बर्तनों पर कलई होते देखना चाहेंगे तो इस पंजाबी गीत को सुनिए....समझ न भी आए तो भी देखिए, आप को भी बहुत कुछ याद आ जाएगा...

Tuesday, 2 May 2023

टाइम्स ऑफ इंडिया मुंबई एडीशन है लाजवाब ....

आज सुबह बांद्रे वर्ली सी-लिंक पर अचानक गाड़ीयां चलती चलती थोड़ी धीमी हो गईं ...होता है अकसर यह ...सुबह सी-लिंक पर भी खूब ट्रैफिक होता है ..तभी मेरी नज़र पड़ी साथ वाली गाड़ी में एक काका पर जो बड़े मज़े से इक्नॉमिक्स टाइम्स पढ़ रहे थे ...अच्छा काका तो मैंने ऐसे मज़े लेने के लिए लिख दिया है ...सारा दिन लोग मुझे काका-काका कहते फिरते हैं ...और वह काका भी मेरी उम्र के ही रहे होंगे...कम से कम मेरे जैसे उन के सफेद बाल तो यही बता रहे थे ...



खैर, मैंने झट से मोबाइल निकाल कर उस लम्हे को अपने मोबाइल में कैद कर लिया ...क्योंकि मुझे खुद याद नहीं पिछली बार कब कितने बरसों पहले मैंंने किसी को ऐसे कार में जाते वक्त अखबार पढ़ते देखा होगा ...अखबार तो मुझे भी पढ़ना अच्छा लगता है, लेकिन मैं कार में नहीं पढ़ सकता, वैसे ही मेरा दिल कच्चा होने लगता है अगर मैं खिड़की खोल के न रखूं तो ...जैसे मैंने उस काका की फोटो खींच ली ....कोई न कोई इस लेखक काका की भी फोटो खींच ही लेता होगा जो हमेशा कार की खिड़की खोल कर ही सफ़र करता है ..वरना दिल कच्चा होने लगता है ...


हां, काका पढ़ रहे थे इक्नॉमिकस टाइम्स ... जो लोग मुंबई की टाइम्स आफ इंडिया के बारे में न जानते होंगे उन के लिए बता दें कि यहां टाइम्स आफ इंडिया जो इन दिनों सात रूपये में मिलता है ...उस के साथ बॉम्बे टाइम्स और इक्नामिक्स टाइम्स साथ में ही होता है ....लेकिन अगर कोई इक्नामिक्स टाइम्स नहीं लेकर, महाराष्ट्र टाइम्स लेना चाहे तो ले सकता है जो मराठी का एक बहुत सम्मानीय पेपर है। 

आज कल मोबाइल की वजह से अधिकांश लोग अखबारों से दूर हो चुके हैं...खास कर के युवा वर्ग तो बिल्कुल दूर ही है ..युवा क्या, जो लोग अभी ४०-५० की आयु के हैं, वे भी अखबार पढ़ने से दूर ही हैं..लेकिन जो मेरे उम्र के जो काका लोग हैं, उन में से बहुत हैं जिन का अखबार के बिना काम नहीं चलता...जब तक अखबार हाथ में न आ जाए, ऐसे लगता है जैसे कुछ कमी कमी सी है ....आदत हो जाती है....अब हम जैसे लोगों की उम्र ६० पार की है और जब से हमने होश संभाला, हमने घर में इंगलिश और हिंदी का अखबार आते देखा ...पंजाब में ट्रिब्यून आता था और मां को वीर-प्रताप हिंदी का अखबार पढ़ना ही अच्छा लगता था ...घर के सभी लोग अखबार पढ़ते थे ...कोई इंगलिश के नए शब्द लिखता, किसी को कोई कतरन चाहिए होती, कभी पड़ोसी किसी नौकरी के इश्तिहार के लिए उसे लेने आ जाता, मां स्वैटर के नमूने देख देख कर बनाया करतीं, घरेलू टिप्स भी बडे़ चाव से पढ़ती....

ऐसे ही पेपर तो पढ़ते ही रहे ...हमेशा ...और नौकरी में भी आ गए इस पेपर की वजह से....१९९१ में एक नाई की दुकान पर मेरा एक दोस्त हजामत करवा रहा था ...मैंने बैठे हिंदी की अखबार उठा ली, उसमें यूपीएससी का विज्ञापन देख कर, अर्जी भेज दी....कुछ महीने बाद चयन भी हो गया....ऐसे हम सब के पास बहुत से किस्से-कहानियां हैं सुनाने के लिए...


पिछले ३२ बरस से टाइम्स ऑफ इंडिया ही पढ़ रहा हूं ...इस के साथ दूसरे अखबार भी देखता था ...संयोग से जब चार पांच बरस के लिए पंजाब में नौकरी कर रहा था तो वहां भी टाइम्स आफ इंडिया आना शुरू हो गया....लेकिन वहां इसे पढऩे का वह मज़ा न था, जो बंबई में था ...हरियाणा में भी जब तक रहे, और लखनऊ में भी ...टाइम्स आफ इंडिया बंबई जैसा न था। हां, लखनऊ बड़ा पढ़े-लिखों का शहर है, वहां पर फिर भी ठीक ही लगता था। बहुत से अखबार देखने-पढ़ने के बाद मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि बंबई से छपने वाला टाइम्स ऑफ इंडिया लाजवाब था .....कालेज की पढ़ाई होने के बाद जितना कुछ भी सीखा उसमें टाइम्स ऑफ इंडिया की अहम् भूमिका है ...मेरे लिए यह लिखना भी मुश्किल हो रहा है कि इस से हमें क्या क्या मिलता है.....मैं अगर यह कहूं कि कुछ भी ऐसा नहीं है जो हमें इस से न मिलता हो.....सूचना मिलती है, मनोरंजन होता है, दिलो-दिमाग़ खुलता है ....और क्या चाहिए...

दस साल पुरानी एक फोटो.....अजमेर में चाय पर होती चर्चा दिखी थी कुछ इस तरह से ...


हां, अपनी अपनी रूचि है, अब इस के साथ जो इकॉनोमिक्स टाइम्स आता है, जो सुबह वाले काका पढ़ रहे थे ....वह हमारे यहां भी आता है टाइम्स के साथ ...लेकिन मैंने कभी उसे खोला तक नहीं, जिस विषय की एबीसी नहीं आती, उस के पन्ने उलट कर भी वह कहावत ही चरितार्थ होगी ..काला अक्षर भैंस बराबर .....मैेंन आज तक एक शेयर नहीं खरीदा, मेरे लिए इकॉनोमिक्स टाइम्स का क्या मतलब....वैसे भी हम लोगों की पढ़ाई ऐसी रही है कि इन विषयों का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है, सिवाए इस के कि डाकखाने में एनएससी, केवीपी और पीपीएफ बचत योजनाएं हैं....और हां सावधि बचत योजना भी ...(रेकरिंग डिपॉज़िट)...😎 ...

मुंबई को लोकल गाड़ी में जब बैठने की जगह मिल जाए तो अखबार मैं आराम से पढ़ने लगता हूं ...कईं कईं बार कुछ लोग और भी दिख जाते हैं अखबार पढ़ते ...लेकिन १९९० के दशक में जो अखबार का क्रेज़ था न कि लगभग हरेक के हाथ में अखबार ....उस पर अब मोबाइल का कब्जा है ...अपनी अपनी पसंद है, हमें तो अभी भी अखबार पढ़ कर ही मज़ा आता है...यह मेरे लिए और भी ज़रूरी है क्योंकि हमारे यहां टीवी बंद पड़ा है, कईं बरसों से ...कोई पसंद नहीं करता .....किसी ज़माने में सुनते थे लेकिन जब से उछल उछल कर खबरें पेश की जाने लगीं और हमारा सिर दुःखने लगा, हमने सोचा ....छोड़ो यार, बंद करो..। घर में मुझे ही नहीं, किसी को भी पसंद नहीं, शायद आठ दस साल तो हो ही चुके होंगे ..हमारे टीवी को बंद होए हुए ...। 

आज कल किसी को अखबार पढ़ने के बारे में अगर गल्ती से पूछ लें ....(वैसे तो पूछने का सवाल ही पैदा नहीं होता), तो वह इंसान बड़ी हैरानी से आप की तरफ़ देखेगा और कहेगा....सब नेट पर ही हो जाता है। लेकिन हमारी पीढ़ी शायद इस से इत्तेफाक नहीं रखती, मेरी मां ८५ बरस की उम्र के आगे तक भी जब अंग्रेज़ी का अखबार पढ़ती तो बेड की साइड टेबल पर एक डिक्शनरी रखी होती ...मुश्किल लफ़्ज का फौरन मानी देख लेतीं ...जो आदत हमें नहीं पड़ी, हम अनुमान लगा लगा कर ही काम चला लेते हैं...

टाइम्स आफ इंडिया के एक अलग ही नाता है ....मुझे तो टाइम्स ऑफ इंडिया की बि्लडींग के आगे से गुज़रते वक्त भी बडा़ अच्छा लगता है ...मेरे पास एक किताब है इंडिया डाउन दा पेजेज़ (India- Down the Pages) ....यह टाइम्स ऑफ इंडिया का प्रकाशन है ....बीस साल पुराना...२००२ में छपा था (उस वक्त की कीमत थी...१२०० रूपए) ..उसमें टाइम्स ऑफ इंडिया का १५० बरसों का इतिहास है ...जब भी उस के पन्ने उलटता हूं मज़ा आता है ...टाइम्स आफ इंडिया के प्रकाशन समूह की अन्य जो मैगज़ीन हैं उन के बारे में भी उस में भी बहुत कुछ दर्ज है ...जैसे इलेस्ट्रेटेड वीकली जिस के हम दीवाने रहे हैं...नवभारत टाइम्स के बारे में भी ....


नवभारत टाइम्स के बारे में इतना ही कहना है कि मुझे आज से तीस-चालीस बरस पहले जो दिल्ली से निकलती थी, वह बहुत पसंद थी ...लेकिन बंबई से निकलने वाली नवभारत टाइम्स पढ़ना पसंद नहीं है, उस में इंगलिश और हिंदी की एक तरह की खिचड़ी है, हिंग्लिश है..संपादक कहते हैं कि लोग यही चाहते हैं ....ठीक है, फिर जो लोग चाहते हैं उसे पढ़ें...मैं उसे जब भी पढ़ता हूं तो यही सोचता हूं कि हिंदी और इंगलिश पाठक के लिए जो सामग्री उपलब्ध है, उस में ज़मीन आसमां का फ़र्क़ है ....मैंने बहुत बार उसे पढ़ने की कोशिश की क्योंकि मैं हिंदी में लेखन करता हूं और मुझे हिंदी का अखबार भी पढ़ना चाहिए, लेकिन मेरे से नहीं पढ़ा जाता ....वैसे भी मैं सात-आठ बरस लखनऊ में रह कर आया हूं, वहां के हिंदी के कुछ अखबार पढ़ कर अच्छा लगता था ...और रोजा़ना हिंदी का अखबार भी पढ़ता था ..

15 बरस पहले ..काका बनने और दिखने से पहले का दौर...लेखक टाइम्स ऑफ इंडिया बांचते हुए ...😎

चलिए, यही बात को खत्म करें..कुछ कहने को ज़्यादा है नहीं इस टापिक पर ..लेकिन सातवीं आठवीं कक्षा में समाचार पत्र के लाभ - इस शीर्षक के साथ लिखा जाने वाला निबंध याद अकसर आ जाता है ...और पिता जी को हिंदी न आती थी, लेकिन वे कहते थे कि कोई भी निबंध लिखते वक्त सब से पहले कुछ बड़ा सा वाक्य लिखो तो निबंध में चार चांद लग जाते हैं....अखबार वाले निबंध के ऊपर उन्होंने लिखवाया था....

खींचों न कमानों को न तलवार निकालो....

जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो....

भारतीय रेल.....ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी!

1970 के दशक के शुरुआती साल ...हम बच्चे थे, छोटे ....😎 लेकिन अपनी कॉलोनी की एक महिला की बहादुरी का एक किस्सा सुना करते थे अकसर...बार बार ......