Tuesday, 18 July 2023

भारतीय रेल.....ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी!

1970 के दशक के शुरुआती साल ...हम बच्चे थे, छोटे ....😎 लेकिन अपनी कॉलोनी की एक महिला की बहादुरी का एक किस्सा सुना करते थे अकसर...बार बार ...कभी उन के सामने भी कोई न कोई उस किस्से को दोहरा दिया करता ..और इतराते हुए मंद मंद मुस्कुराना भी उन का याद है ...वह रेलवे के एक सैनेटरी इंस्पेक्टर की पत्नी थीं...(पहले हेल्थ-इंस्पैक्टर को इसी नाम से जाना जाता था) - शुक्ला जी बनारस के रहने वाले थे ...एक बार श्रीमति शुक्ला जी जब वहां गई हुई थीं तो उन की सासू मां गंभीर रूप से बीमार थीं, अब मिेले बगैर किसी से कोई सलाह-मशविरा करने का तो सवाल ही न होता था किसी के साथ, उन्होंने जैसे तैसे उस गंभीर हालत में ही अपनी सासू मां को भी अमृतसर की गाड़ी में साथ ही चढ़वा लिया, और सीट पर लेटा दिया.....और वह बेचारी इतनी बीमार थी कि चंद मिनटों में ही उस बुज़ुर्ग महिला को मुक्ति मिल गई ...

दो बरस पहले इस लेखक ने बनाया था यह पोस्टर ...आज इसे ढूंढ निकाला यहां चिपकाने के लिए , फोटो भी मैंने खींची थी और कैलीग्राफी भी लॉक-डाउन के दिनों में ...

अब आप श्रीमति शुक्ला की मनोस्थिति देखिए, मौके को संभालने की जुगत देखिए कि उस ने उस पर चद्दर डाल दी लेकिन ज़िंदा लोगों से भरे डिब्बे में कोई लाश भी लदी हुई है...इस बात को उन्होंने अमृतसर पहुंचने तक दबा कर रखा, वह यह कैसे रख पाईं मुझे आज भी याद है जिस तरह से लोग उन के मुंह से वर्णन सुनते थे, हम हैरान रह जाते थे ....टीटीई आया, उसको बता दिया कि मां हैं, सोई पड़ी हैं, चलिए ...दो तीन घंटे और बीत गए ....अगर सोया हुआ यात्री के शरीर में कोई हिल-ढुल नहीं हो रही तो लोगों को एक बात करने का मौका मिल जाता है, शक सा हो जाता है.....अन्य यात्री पूछते तो उन को समझा-बुझा देना कि मां हैं, खासी बीमार हैं ....यह तो श्रीमति मिश्रा के लिए तो बहुत आसान था। सफर चलता रहा ...अभी भी 18-20 घंटे का रास्ता है बनारस से अमृतसर तक का ...वह सोई नहीं, सचेत रह कर उस पार्थिव शरीर की रखवाली करती रही ...खैर, ये बातें ज़्यादा छुपती कहां हैं.....अंबाला आते आते टीटीई फिर आ गया कि माजरा क्या है ...इन को क्या है....उसने कहा कि ये तो लगता है चल बसीं हैं ....इतना सुनने पर उसने टीटीई की क्लास ले ली कि ऐसे आप कैसे किसी के बारे में कह सकते हैं। ज़माना सीधा था, जब उसने टीटीई को ही हड़का के रफ़ा-दफ़ा कर दिया तो डिब्बे के दूसरे लोगों की जिज्ञासा को शांत रखना कौन सी बड़ी बात थी ...

दरअसल बात यह थी कि यात्री डिब्बे में किसी लाश को ले जाना मना है, और अगर किसी को यह पता चल जाता कि वे लोग एक लाश के साथ सफ़र कर रहे हैं एक ही डिब्बे में ...तो पता नहीं डिब्बे में हड़कंप मचता या न, लेकिन श्रीमति मिश्रा को फ़ौरन अगले स्टेशऩ पर उतार दिया जाता ...खैर, वह महिला ने अपनी प्रेसेंस ऑफ माईंड से अपनी सास के पार्थिव शरीर के अमृतसर स्टेशन तक पहुंचा दिया ...आगे का सारा इंतज़ाम उस सैनेटरी इंस्पैक्टर ने संभाल लिया जो वहीं, उसी स्टेशन पर तैनात था...

मुझे आज यह बात याद आई सुबह सुबह जब मैं अखबार पढ़ रहा था ...उसने एक न्यूज़ स्टोरी थी कि मध्य रेल ने पिछले तीन बरसों में 1500 के करीब मृत लोगों को उन के मुलुक (किसी के गांव, कसबे के लिए बंबईया भाषा) पहुंचा दिया ...और उसमें उस की सारी प्रक्रिया बताई गई थी ...किस तरह से एजैंट लोग ढ़ेरों औपचारिकताएं कैसे आसानी से पूरी करवा के पार्थिव शरीर को उसके गन्तव्य स्टेशन की तरफ़ रवाना कर देते हैं...एजैंटों के रेट फिक्स हैं ....अभी लिखते लिखते ख्याल आया कि जो एजेंट लोग भी हैं, इन के साथ भी टैग-लाइन - ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी....जोड़ी जा सकती है ...खैर, जो डिटेल्स हैं, वह तो आप इस खबरों में पढ़ ही लेंगे। 

इसे अच्छे से पढ़ने के लिए आप को इस फोटो पर क्लिक करना होगा...

मेरे लिए भी यह एक अहम् जानकारी थी ...अभी मैंने खबर का शीर्षक ही पढ़ा तो मुझे लगा कि यार, मिट्टी तो मिट्टी है ..उसे भी मुलुक पहंचाने के लिए पेचीदगी भरा इतना रास्ता तय करना ....औपचारिकताओं से भरा हुआ...सरकारी विभाग के अपने नियम-कायदे होते ही हैं, फिर यह भी ख्याल आया कि साधन-संपन्न लोग तो हवाई-जहाज़ से सात समंदर पार से अपने परिजनों के पार्थिव शरीर ले आते हैं ....और वैसे भी मानवीय संवेदनाओं के आगे बहुत से तर्क क्षीण पड़ जाते हैं ...जैसे मेरे भी ज़ेहन में जो बाबा बुल्ले शाह की वह काफ़ी आ रही थी, मिट्टी उत्ते मिट्टी डुल्ली (मिट्टी पर मिट्टी गिरी)....वह गायब हो गई इस न्यूज़-स्टोरी को पढ़ते पढ़ते। 

मानवीय संवेदनाओं की बात है कि सैंकड़ों-हज़ारों कोसों दूर बैठे परिजन कैसे अचानक अपने सगे-संबंधी के आखिरी दीदार करने आएं, रेलवे की इस अत्यंत मानवीय सुविधा की वजह से एक पार्थिव शरीर ही अपने गांव पहुंच जाता है ...और जो बात हैरान करने वाली है कि रेलवे विभाग इस के लिए सिर्फ़ एक हज़ार से डेढ़-हज़ार वसूलता है लेकिन सामान ढोने के जिस डिब्बे में इस शव को रखा जाता है उस में किसी और माल की ढुलाई नहीं की जाती उस दिन ...और इससे रेलवे को उस दिन माल ढुलाई के लिए मिलने वाले 30 हज़ार रूपये की राशि से महरूम होना पड़ता है ..

टाइम्स ऑफ इंडिया, मुंबई 18 जुलाई 2023

लेकिन यही तो है देश की इस लाइफ-लाइन का सामाजिक दायित्व  -यह दायित्व बहुत भव्य है, लोकल गाड़ी में बैठे बैठे कईं बार सोचता हूं कि दस-बीस रूपये खर्च के बंदा बम्बई के एक कोने से दूसरे कोन तक पहुंच जाता है, खोमचे वाले, सब्जी वाले, दफ्‍तर तक खाना पहुंचाने वाले (मुंबई के डिब्बे वाले)....कैसे नियत समय पर अपने ठिकाने पर पहुंच जाते हैं ....बरसात हो या हो तूफ़ान....देश की यह लाइफ-लाइन का ही कमाल है कि चौबीसों घंटे देशवासियों के दुःख सुख में उस को अपने साथ रहने का अहसास दिलाती है ...ज़िंदगी के साथ भी जैसे हम अकसर देखते हैं और उस के बाद भी जैसा आपने ऊपर पढ़ लिया...

और हां, श्रीमति मिश्रा जी से बात शुरु की थी, उन से ही खत्म करेंगे ....जब सैनेटेरी इंस्पैक्टर की रिटायरमैंट हुई तो सरकारी आवास खाली तो करना ही थी...जब मां और उन की सहेलियां श्रीमति मिश्रा से मिलने गईँ तो वह आंगन में लगे एक तंदूर को तुड़वा में लगी हुई थीं, ...मां ने कहा- बहन जी, इसे क्यों तोड रही हैं, रहने दीजिए, जो भी आएगा, इस में लगी रोटीयां खाएगा....मां ने बताया कि उसने इस का कोई जवाब न दिया ...लेकिन जैसे ही तंदूर का किला पूरी तरह से धवस्त हो गया तो अपने बेटे को थोड़ा और नीचे खोदने को कहा ...तब वहां बैठी हुई महिलाओं की उत्सुकता बढ़ गई ...लेकिन दो मिनट में ही वह भी शांत हो गई जब थोड़ा सा ही खोदने पर खुर्पी के किसी पीतल के बर्तन के साथ टकराने की आवाज़ आई ....एक पीतल का बर्तन निकाला गया जिस में उन्होंने अपने गहने संभाल कर रखे हुए थे .....तो यह हुई तंदूर के अंदर छुपे लॉकर की कहानी - कौन कहता है जब बैंक-लॉकर न थे या उन तक उन की पहुंच न थी, तब वे कैसे करते थे अपने माल की रक्षा ....उस का एक सच्चा किस्सा आपने पढ़ लिया, जब किसी भी चीज़ का अभाव होता है तो यह लोगों को जुगाड़ करने के लिए तैयार करती है, जिसे आज के पढ़े-लिखे लोग क्रिएटिविटि कहते हैं ....अनेकों-अनेक किस्से अभी भी अनकहे धरे पड़े होंगे, लेकिन कोई साझा तो करे। जब कोई बात लिख कर दर्ज कर दी जाती है तो सहज भाव में वह आने वाली पीढ़ियों के लिए साहित्य गढ़ देती है....और साहित्य की अहमियत से तो हम सब वाकिफ़ हैं ही ...

मानवीय संवेदनाएं सर्वोपरि हैं....शायद रहेंगी भी

PS....आज की जिस अखबार में यह न्यूज़-स्टोरी दिखी जिस में पार्थिव शरीर की बातें लिखी थीं, उसी के बाईं तरफ़ ख़बर दिखी कि पुलिस ने करोड़ो रूपये की नशीली दवाईयों को जला दिया....और उस की दाईं तरफ़ पालतू जानवरों के दाह-संस्कार के लिए 50 करोड़ की लागत पर तैयार किए जाने वाली एक श्मशान-भूमि के तैयार किए जाने की खबर थी...संयोग की बात है ...एक ही पन्ने पर ये सारा कंटैंट .....लेकिन पढ़ते पढ़ते फिर एक ख्याल ने घेर लिया कि अच्छा है जानवरों की कोई राष्ट्रीयता नहीं होते, धर्म नहीं होते, जात-पात के बखेड़े नहीं होते, रंग-नसल के भेद से दूर हैं....वरना कईं मसले पैदा हो जाते कि पालतू जानवरों का अंतिम संस्कार किस रस्म से किया जाएगा...

Saturday, 15 July 2023

चाय पे चर्चा .....

मैं अकसर सोचता हूं कि आज से २०-२५ बरस पहले जब लिखने का बहुत जज़्बा था, चाहत थी ....लेकिन लिखने के गुर न पता थे ...एक लेख लिखने के बाद लगता था कि कुछ ही विषय हैं जिन पर हम लोग लिख सकते हैं...अब जब कुछ थोड़ा जान पाए हैं लिखते लिखते कि विषय तो हर तरफ़ बिखरे पड़े हैं...हमारे आस पास, हमारी ज़िंदगी में, हमारी गलियों में, फुटपाथों पर ...स्टेशनों पर, लोकल गाड़ियों में और हां, अखबारों में भी ....बहुत कुछ है जिस पर अभी लिखा जा सकता है, लेकिन अब लिखने का वैसा पैशन नहीं रहा, शाम होने तक इतना थक जाते हैं, घुटने दर्द करने लगते हैं ....ख्याल आता भी है लिखने का तो फिर लगता है छोड़ो, यार, बहुत हो गया....बस, ऐसे ही लिखना पीछे छूटता जा रहा है ...ढीठ बन कर ब्लॉग लिखने बैठ जाता हूं कि जो काम १६ बरसों से कर रहा हूं उसे कम से कम चालू तो रख सकूं....यह पोस्ट भी मैं कोई बीस दिन बाद लिख रहा हूं ...

पोस्ट में बात तो छोटी सी है लेकिन दर्ज करने लायक है ...छोटी छोटी हल्की फुल्की बातें भी ज़रूरी होती है, केवल सिर-खपाने और दुखाने वाली भारी भरकम बातों से भी कभी छुट्टी लेनी चाहिए। 

चाय पर चर्चा करनी है थोड़ी आज ...चाय, जो बचपन में हमें कम मिलती थी क्योंकि मां को यह यकीन था कि चाय पीने से रंग काला हो जाता है...हमें तो यही लगता कि यार, पता नहीं रंग काला हो जाएगा तो कौन सा कहर ढह जाएगा...लेकिन मुझे अच्छे से याद है दसवीं जमात तक हमें चाय पीने के लिए लगभग मिन्नत करनी पड़ती थी ...क्योंकि वही काले हो जाने का डर ...😎😇😅...लिखते लिखते यह भी लगता है कि उस ज़माने के लोग भी कितने सीधे-सपाट थे ...बस, जो बात दिलोदिमाग में घर कर गई सो कर गई ...उस से टस मस नहीं....हां, यह वह ५०-५५ साल पुराना दौर था जब गोरा होना भी एक गुण जैसा होता था ....मुझे अभी तक समझ नहीं आई कि अगर काले हो भी जाते तो क्या हो जाता....

लेकिन हां, हमें नानी के यहां चाय बिना किसी रोक टोक के मिल जाती ......कईं बार नाश्ता में भी चाय में रस्क डुबो कर खाने को मिलते ...अच्छे से याद है २-३ रूपए में हम लोग अंबाला छावनी की एक बेकरी से वे रस्क ले कर आते ...दो बड़े बड़े खाकी रंग के लिफाफे में रस्क भरे हुए (देखिए, हम ने तो हमेशा रस ही सुना है और बोला है ...लेकिन लिखते हुए रस्क लिख रहे हैं, क्योंकि आज बड़ी बड़ी बेकरियों और ब्रांडों में इसे रस्क ही कहते है ं...) ...नानी की चाय, अंगीठी पर बनी हुई ....शक्कर से लैस होती थी ...वो एक पंजाबी में कहावत जैसी एक बात है.....चाय में दुध रोक के ते मिट्ठा ठोक के ...(दूध कम डालना लेकिन शक्कर भरपूर डालना)...

हां, नानी की बनी चाय से एक बाद याद आई ..वह ज़िंदगी में पी हुई अब तक की सब से बेहतरीन चाय थी ...शायद भरपूर चीनी की वजह से और नानी के प्यार का अदृश्य टी-मसाला भी तो उसमें ज़रूर रहता ही था ...नानी कभी भी चाय को छन कर नहीं पीती थी क्योंकि वह कहती थी कि उस से चाय का साह-सत्त (पंजाबी शब्द, चाय की जान) निकल जाता है ....बरसों बरस हम लोग नानी के जाने के बाद भी उस की यह बात याद कर के मज़ा लेते.....वही आदत नानी से मां में आ गई ....और मां से मेरे में ....जब तक मां रही, मुझे भी मां के साथ बिना छनी हुई चाय ही पीने में मज़ा आता था ....और जब तक चाय पीने के बाद मुंह में पत्ती के कुछ दाने न रह जाएं ....लगता ही न था जैसे चाय पी है....😂

यह जो नानी के चाय के साह-सत्त निकलने की बात कही ...उस से मुझे एक घटना याद आ गई ...उन दिनों हम लोग फिरोज़पुर में थे . गाड़ी से दिल्ली जा रहे थे, भटिंड़ा में एक बंदे ने अपनी छोटी सी बेटी की फरमाईश पर लिमका की बोतल दिलाई .....उस की बेटी वह खुली हुई बोतल हाथ में थामे हुए आराम से उस का उस का मज़ा लेते हुए आहिस्ता २ पी रही थी, बीच में ब्रेक दे दे कर ...इतने में उस पेंडू ने बच्ची को लगभग डांटते हुए कह दिया......हुन पी वी लै ऐन्नू जल्दी, सारी गैंस निकल जाऊ (अब इस को जल्दी से पी भी ले, वरना इस की सारी गैस निकल जाएगी)....कुछ कुछ किस्से होते हैं जो याद रह जाते हैं ..जैसे भाखड़ा डैम बना तो सुना है बहुत से गांव के बुज़ुर्गों ने यह शिकायत कि अगर पानी से बिजली ही निकल गई तो फिर पानी दा साह-सत्त (पानी की जान) तो निकल गया समझो....

खैर, चाय की बात पर याद आता है कि कालेज के ज़माने से फिर हमने चाय जम कर पीनी शुरू की ...लगता है चाय तो एक बहाना था उस के साथ बेसन और मोताचूर के लड़्डू, और बहुत से आटे के बेकरी वाले बिस्कुट खाने का ...और कभी कभी जलेबी, समोसा और बर्फी भी ....अब जा कर ६० साल की उम्र में डाक्टर की सलाह पर चाय में मीठा कम डाल कर पीना शुरू किया है ..और बड़ी मुश्किल से इन लड्डूओं और बिस्कुटों पर लगाम कसी है ...वैसे, एक बात देखी है जब हम इन सब को खाना बंद करते हैं या बिल्कुल कम भी करते हैं तो वह अच्छा लगने लगता है ..आदत की बात है ...

यह उन दिनों की बात है .....यही कोई 12-13 साल पहले ...लेखक किसी गंभीर मंथन में मग्न 😂

लेकिन चाय की आदत तो ऐसी है कि हमें हमेशा से अच्छी तरह से उबली हुई, देशी चाय ही पसंद रही है ...मुझे ये तरह तरह की ग्रीन, ब्लैक, लेमन टी....और भी पता नहीं क्या क्या ....ट्राई बहुत सी की हैं लेकिन एक बार पी कर फिर कभी न पी ...उस डिप-डिप वाली नौटंकी से भी अपना कुछ नहीं होता ....हमें तो घर और बाहर वही उबली हुई चाय ही भाती है .....जहां भी ये ग्रीन-ब्लैक-लेमन ऑफर की जाती है ..एक घूंट भरने के बाद वहीं रख देते हैं....क्योंकि हमें वह हमेशा कड़वी दवाईयां ही लगती हैं....

इतने शांत स्वभाव वाला, अपने आप में मगन विक्रेता मैंने कम ही देखा है ...ये जो लंबे लंबे पत्ते हैं, यही चाय के पत्ते हैं....
(संपादित--यह पोस्ट लिखने के बाद मुझे नीचे कमैंट से याद आया है कि ये लेमन ग्रास है ...) 

जिस रास्ते से गुज़रता हूं यहां बंबई में वहां पर मेरी ही उम्र का एक बुज़ुर्ग कढ़ी-पत्ता और लंबे लंबे पत्ते रखे दिखता है ....जो उस का अंदाज़ है, सिर पर रूमाल लपेटे हुए ....बड़े इत्मीनान से बैठा दिखता है हमेशा ...कुछ महीने पहले जब जिज्ञासा को रोक नहीं पाया तो पूछ ही लिया कि ये बडे़ बड़े पत्ते क्या हैं....मुझे उस बंदे के हाव-भाव से यही लगता था हमेशा जैसे कि ये कोई पूजा में इस्तेमाल होने वाले पत्ते ही होंगे ज़रूर ...(मुंबई की सड़कों पर तीज-त्यौहारों के मौके पर पूजा-अर्चना के लिए नाना प्रकार के पत्ते बिकते हैं )....खैर, मेरा अनुमान गलत था ...उस बंदे ने बताया कि यह चाय है ..मुझे लगा कि यही होगी ग्रीन टी ...मैने एक बंडल खरीद लिया उन ताज़ा पत्तों का ...उसने बताया दो तीन दिन में इस्तेमाल कर लेना....

मैंने चाय बनाई और उसमें टाटा टी की चाय पत्ती की जगह उस के दो चार पत्तों को डाल दिया ....कुछ भी न हुआ...शायद मैंने नेट पर भी सर्च तो किया लेकिन कुछ मिला नहीं...बस, वे पत्ते वहीं रखे रखे सूख गए और फैंक दिए....

यह फोटू मैंने अजमेर में 10 साल पहले एक चाय के खोखे पर खींची थी, जहां पर मैंने चाय पी थी  ...
वैधानिक चेतावनी- धूम्रपान सेहत के लिए खतरनाक है ..

दो दिन पहले मैं और मेरे दो-तीन साथी एक जगह से गुज़र रहे थे तो एक ने कहा कि चलो, यहां से चाय बिस्कुट का नाश्ता करते हैं...नेकी और पूछ पूछ ...ये जो चाय की गुमटियां होती हैं न ....बीच रास्तों में, सड़क किनारे पर ...इन की चाय एक दम परफैक्ट होती है ...और यह बंबई की बात नहीं है ...देश से कोने कोने की बात है यह ...मैं तो किसी नईं जगह जाऊं तो सब से पहले ऐसी गुमटी ही ढूंढता हूं जहां दस बीस लोग घेरा डाल कर खड़े होते हैं ....कुछ अखबार पढ़ते दिखते हैं, कुछ फेफड़े सेंकते ....। हां, तो जब वह बंदा चाय तैयार कर रहा था तो उस ने उबलती चाय में एक हरा सा पत्तों का एक पैकेट सा फैंका ...मुझे उत्सुकता हुई कि यह क्या फैंका इसने ....मेरे एक साथी ने कहा कि यह हरी चाय का पत्ता है ...मैं समझा नहीं, मैंने उस के थैले में झांका जहां से उस ने उसे निकाला था ...सारा माजरा मेरी समझ में आ गया....कि ये चाय के पत्ते वही हैं जो बंबई के फुटपाथ पर बिकते हैं ....जिन को चाय पत्ती डालने के साथ साथ इस ढंग से इस्तेमाल करन होता है ....आप देखिए, अगर हम अपने आस पास देखते हुए चलते हैं, लोगों से बोलते-बतियाते हैं तो ज्ञान का क्या है, वह तो हमें कहीं से भी मिल सकता है ....हर इंसान जिस से हम मिलते हैं, वह ज्ञान का भंडार इस तरह से है कि वह ज़रूर कुछ न कुछ ऐसा जानता है जिसे हम नहीं जानते ...मैंने तो इसे आजमाया हुआ है ...और हां, उस चाय का ज़ायका मज़ेदार था, उस दिन से मैंने वैसी चाय पीने की शुरुआत की तो है ...देखते हैं यह शौक कितने दिन तक ढो पाते है ं...😎😂

चाय का ज़ायका बढ़ाने वाले जुगाड़ - लेमन-ग्रास, अदरक...

चाय की बात यहीं खत्म करते हैं ....आप भी इत्मीनान से चाय पीजिए...चाय की ताकत को कम मत समझिए....चाय बेचते बेचते, चाय पर चर्चा करते करते लोग कहां से कहां पहुच गए ....और , मेरी चाय की पत्ती वाली गुत्थी भी इसी चाय पर हुई चर्चा के चक्कर में उस दिन सुलझ गई .... 

ऊपर मैंने एक जगह मेरी मां के दिल में बसी हुई बात का ज़िक्र किया कि चाय पीने से रंग काला हो जाएगा.......वैसे, अगर ऐसा होता भी हो ऐसा तो क्या फ़र्क पड़ता है ....इस दुनिया के फुलवाडी़ की निराली शोभा ही इसीलिए है क्योंकि इस में  भिन्न भिन्न रंगों के इंसान रूपी फूल इस को शोभायमान कर रहे हैं....इसी बात से वह गीत याद आ गया....जंगल में दो फूल खिले, इक गोरा इस काला.... 😎

भारतीय रेल.....ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी!

1970 के दशक के शुरुआती साल ...हम बच्चे थे, छोटे ....😎 लेकिन अपनी कॉलोनी की एक महिला की बहादुरी का एक किस्सा सुना करते थे अकसर...बार बार ......