Sunday, 25 June 2023

दुनिया की सैर कर लो...

अभी मैं जब यह लिखने लगा तो मुझे पोस्ट के शीर्षक के लिए कुछ सूझ नहीं रहा था ...फिर अचानक बचपन से सुनाई दे रहा गीत याद आ गया...दुनिया की सैर कर लो....यू-ट्यूब पर देखा तो पता चला कि यह 1967 में आई हिंदी फिल्म अराउंड दा वर्ड का गीत है ...रेडियो पर इसे बार 2 सुनाई देने पर न थकते थे, न अकते थे....

न्यूयार्क के स्टेचू ऑफ लिबर्टी के खुशनुमा बाग का दिलकश नज़ारा 

हमारे एक दोस्त आज कल श्री मति जी के साथ अमेरिका की यात्रा पर हैं...वहां से वह वहां के कुदरती नज़ारों की तस्वीरें और वीडियो भेजते हैं ...हैरत में पड़ जाता हूं मैं उन सब नज़ारों को देख कर ...ऐसे ऐसे मनोरम नज़ारे, नदियां, पहाड़, झरने-  उन का वर्णन ही नहीं कर सकता...मैं अकसर यह सब देख कर यही सोचता हूं कि यह तो दुनिया के एक देश के एक इलाके के दृश्य हैं ...और पूरी दुनिया में न जाने क्या अद्भुत भरा पड़ा होगा....

न्यू-यार्क में एक सप्ताह रहने के बाद ...ऐसे लगने लगा जैसे ज़िंदगी ही बदल सी गई है😎😂

हमें भी चार साल पहले अमेरिका के वाशिंगटन-न्यू-यार्क और न्यू-जर्सी जाने का मौका मिला था ..आठ दस दिन ही रहे लेकिन वही बात ..नज़ारे देख कर थक गए, तस्वीरें लेकर ऊब गए...वहां की आबोहवा के कारण चेहरे बदल गए (शायद यह भी खुशफ़हमी ही रही होगी...😃)...कभी कभी ख्वाबों की उड़ान भरते भरते (उसमें कौन सा पैसा लगता है!) मेरा तो वहां से आने का मन ही नहीं करता था ...लेकिन फिर भी अपनी दाल-रोटी और कांच के गिलास- कप में कड़क चाय पीने के लिए तरस गए....चाय-काफी मिलती तो थी सब जगह लेकिन वही कोई स्टाईरोफोम के मग या कप में ही ...अजीब सा स्वाद लगता था, ऐसे लगता था सच में जैसे दवाई पी रहे हैं ...जैसे तैसे दिन बीते और वापिस देश लौट आए। इतनी तस्वीरें खींची कि फोन भी थक गया और हम भी ..हम दोनों एक दूसरे से ही थक गए। 

यह व्हाइट-हाउस के अंदर की तस्वीर है ....चार बरस पहले ...

अभी भी अखबारों में इश्तिहार आते रहते हैं कि उन उन देशों का टूर कर लो, अब देख कर नज़रअंदाज़ करने लगे हैं...पहले अखबार की कतरन रख लिया करते थे ...लेकिन उन का भी कुछ हुआ नहीं, कभी कहीं गए ही नहीं, आने वाले वक्त का पता नहीं ...लिखते लिखते ख्याल आया पहले हिंदी-इंगलिश के मैगज़ीन में पर्यटन विशेषांक आते थे (जैसे सरिता में) ...जहां पर कुछ हिल स्टेशन या अन्य टूरिस्ट स्पॉट के बारे में जानकारी मिलती थी ...उन पन्नों का ज़रूर पढ़ा करते ...खास कर, यह जानने के लिए कि वहां जाना कैसे है, रेलगाड़ी कहां तक जाती है, वहां से बस या टैक्सी में कितना वक्त लगता है ....इतना सब कुछ पढ़ कर ही मज़ा आ जाता है ...जाना वाना तो कहां होता है , सिवाए नानी-दादी के घर-अंगना जाने के ....😎

न्यू-यार्क में सब लोग स्टॉक-मार्केट के पास डटे हुए इस सांड के साथ कुछ कुछ पंगे ले रहे थे ....मैंने भी फोटो खिंचवा ली एक 

कश्मीर जाने की तमन्ना है जब से होश संभाला है ...लेकिन नहीं जा नहीं पाए...मां जब तक रहीं कहती रहीं कि जाओ, हो कर आओ....कश्मीर नहीं देेखा तो कुछ नहीं देखा...दरअसल वह कश्मीर के उस इलाके (मीरपुर) की रहने वाली थीं जो अब पाकिस्तान के कब्जे में है, मां के दादाजी की लारीयां थीं वहां ...ये बड़े रईस थे (वैसे उन दिनों सभी रईस थे जैसे सभी लोगों से किस्से सुने हैं...)..ये लोग कश्मीर आते जाते रहते थे ...

हम भी पिछले कईं बरसों से यही सोच रहे हैं वहां जाएंगे ...जाएंगे ...रोड़ से जाना मोशन सिकनेस की वजह से मुमकिन नहीं है, हवाई यात्रा वहां जाने के लिए करना नहीं चाहते क्योंकि उस से तो ऐसी फील आएगी जैसे किसी ने एयर-एम्बुलेंस में एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचा दिया....बस, अब ट्रेन चलने का इंतज़ार कर रहे हैं....यह तो रही कश्मीर की बात,,,.रेलवे में 32 बरस से काम करने के बावजूद भी हम लोग कहीं नहीं गए...कभी बच्चे छोटे थे, कभी बड़े हो गए, कभी कोई मजबूरी, कभी कोई ....और 300 दिन की छुट्टियां भी इक्ट्ठी करने के चक्कर में भी अपने हिस्से की ज़िंदगी जी ही नहीं ....सच में कईं बार ऐसा ही लगता है ....300 दिन तो अभी भी नहीं बन पाए ....सारांश यही कि हमने अपना देश ही नहीं, किसी प्रदेश को या किसी इलाके को भी कहां तबीयत से देखा ....पंजाब में लगभग तीस-पैंतीस बरस रहे.....28 बरस अमृतसर में और 5-6 बरस फिरोज़ुपर में ...बस, उतना ही देखा पंजाब को या जितना ट्रेन या बस में जाते जाते दिख गया...

जिस भी शहर में रहे, उस को बामुश्किल 2-4-5-10 प्रतिशत ही जान पाए ....और उस से भी कम देख पाए ....यही हाल मुंबई का है ...अभी मुझे मेरे घिसे-पिटे घुटने होते हुए भी नई नई जगहों पर टहलने का शौक है ...नए रास्ते नापने अच्छे लगते हैं, फुटपाथ पर ज़िंदगी दिखती है, सारे किरदार वहीं एक साथ दिख जाते हैं....लेकिन फिर भी मैं मुंबई की तो बात ही क्या करूं....मुंबई के जिस इलाके में रहता हूं वहां के नेबरहुड के बारे में ही नहीं जानता....कुछ दिन पहले एक किताब दिखी .. फोर्ट वॉक्स ....इस के पन्ने उलटने पर इस बात की डिप्रेशन हुई कि हम बंबई को बिल्कुल भी नहीं जानते ....  

किताब के नीचे रखी अखबार में जो फोटो दिख रही है उस में लालू जी राहुल गांधी को मशविरा दे रहे हैं, अब दाड़ी मुंडवा लो और शादी बना डालो...


बस, इस तरह की किताबें इक्ट्ठा कर लेने से, टीटीके द्वारा प्रकाशित विभिन्न शहरों के कैटालॉग, नक्शे, पर्यटन विभाग के पेम्फलेट्स, आईआरटीसी के विज्ञापन, थामसन कुक के अखबा....सब कुछ जमा करते रहे हैं कि कभी जाएंगे ...कभी इन को हाथ में पकड़ कर दुनिया देखेंगे ...जब कि आज के दिन अगर दुनिया में कहीं भी भ्रमण करने का जज़्बा है तो हाथ में मोबाईल ही काफ़ी है....वैसे तो पेमेंट के लिए भी इतना ही काफ़ी है, अगर क्रेडिट-डेबिट कार्ड भी बटुए में होगा तो ठीक ही है ...

बात यही है कि हम लोग अपनी खुशियों को टालते रहते हैं ...जिस काम को करने में हमें खुशी मिलती है, वह हम टालते रहते हैं जब तक हम उम्र के उस दौर में नहीं पहुंचते कि हमारा दिल तो करे बहुत जगह जाने को ....ज़िंदगी जीने को ..लेकिन घुटने हड़ताल कर दें ...वैसे भी हम समझते हैं कि युवावस्था से शुरू हो कर बंदा अपनी इच्छाओं की विशलिस्ट बनाने में मसरूफ़ रहता है कि इन इन जगहों पर जाएंगे ....ये ये काम करेंगे ...ट्रेकिंग करेंगे ...कैंपिंग करेंगे...म्यूज़िक सीखेंगे...म्यूज़िक इंस्ट्यूमैंट भी सीखेंगे .....और फिर देखते ही देखते उम्र का वह दौर आ जाता है जब इंसान इस विश-लिट की आइटमों को काटना शुरू कर देता है ....क्या करेंगे वहां जाकर ...इतना कुछ तो वाट्सएप पर देख चुके हैं, फलां फलां जगह जाना अब न हो पाएगा, अब क्या म्यूज़िक सीखेंगे, इस बुढ़ापे में अब क्या गिटार सीखते अच्छे लगेंगे, ऐसे ही ख्याल आते हैं....बस, ऐसे ही सब कुछ टलता रहता है, जितना मैं ज़िंदगी को अब तक समझा हूं ...

ठीक से पढ़ने के लिए इस पर क्लिक कर सकते हैं...

इतना कुछ लिखने के बाद और यह लिखने से पहले भी और लिखते वक्त भी मुझे रविंद्र नाथ टैगोर के वे अल्फ़ाज़ याद आ रहे हैं....जिसे मैंने अपने कमरे की दीवार पर टांग कर रखा हुआ है ...ताकि मैं उन की यह बात कभी न भूलूं.....उन्होंने यही बात कही है कि मैं दुनिया भर को देख आया....पहाड़, झरने, समंदर, आसमां....सब कुछ देख लिया...लेकिन मैंने अपने कमरे की खिड़की केे बाहर धान के पौधे की बाली पर ओस की बूंदों को तो देखा ही नहीं....

बस, रविंद्रनाथ टैगोर की बात दिल में घर कर गई है ....बार बार याद आती रहती है .....जितना भी देख लेंगे, कुछ न कुछ तो छूट ही जाएगा...और वैसे भी अपने परिवेश में, अपने आस पास देखना होगा, उसी से जान पहचान बढ़ानी होगी.....और हां, इतनी बात पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि इस काम के लिए आप को मेडिटेशन (ध्यान) का अभ्यास निरंतर करना होगा .....सब कुछ उसी में शामिल है, रचा बसा हुआ है ....ज़्यादा भाग-दौड़ स्वतः ही ज़िंदगी से दूर होने लगती है .....आजमा कर देखिए आप भी कभी .....

स्टेचू ऑफ लिबर्टी जब गए ही थे, तो फोटो भी खिंचवा ली....😎



लव यू पंचम ....म्यूज़िक कंसर्ट


लखनऊ में और बंबई में रहते हुए ये फिल्मी कंसर्ट इतने देख लिए हैं कि अब मन भर गया है ...अब तो कोई स्पैशल ही कंसर्ट हो या षणमुखानंद जैसे हाल में प्रोग्राम हो तो ही इच्छा होती है ..इन सब के बारे में इतवार के दिन टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ जो बॉम्बे टाइम्स आता है उस से पता चल जाता है ...

आर डी बर्मन का कौन फैन नहीं है....अब उन की याद में प्रोग्राम हो और वहां न पहुंचें तो क्या बात हुई। इस बार तो यह प्रोग्राम छूट ही जाता ..अगर दो दिन पहले एक दोस्त ने याद न दिलाया होता कि पंचम के प्रोग्राम में जाने का क्या ख्याल है। बस, उसी वक्त बुक-मॉय-शो पर टिकटें ले लीं...





इस प्रोग्राम में जाने के लिए बेताबी इसलिए भी थी कि उसमें कविता कृष्णमूर्ति ने भी लाइव गाना था ....कविता कृष्णमूर्ति को इससे पहले लाइव नहीं सुना था ...सारा हाल भरा हुआ था ...कविता कृष्णमूर्ति को टीवी पर अकसर देख चुके हैं....जिनकी आवाज़ इतनी सुरीली है उन के बारे में यह कहना कि वे उतनी ही मृदुभाषी भी हैं...अजीब सा लगता है। 

कविता कह रही थीं कि वह 51 बरसों से गायन कर रही हैं...उन के पति दुनिया में ख्याति-प्राप्त फ्यूज़न-म्यूज़िक के गुरू डा एल सुब्रह्मणयम का भी अभिनंदन किया गया...अभी मैं उन के पति का नाम लिखने लगा तो मुझे लगा कि मैं वह नाम ठीक से लिख पाऊं, इसलिए मैं गूगल किया तो मुझे कविता कृष्णमूर्ति का बॉयोडैटा नज़र आ गया ...ओ मॉय गॉड, फिल्मी गीत गाने के लिए इतने अवार्ड ....आप भी इस लिंक पर देख सकते हैं...

कविता ने अपने संस्मरण भी साझा किए ...बहुत सी बातें भी की....वह कह रही थीं कि गीत तो आप लोग यू-ट्यूब पर भी सुन लेंगे ...मुझे आप से इन गीतों से जुड़ी यादें भी साझा करनी हैं....एक बात जो क़ाबिले-गौर थी कि अभी तक मैंने कविता को हिंदी में ही बोलते देखा सुना था ....लेकिन इस प्रोग्राम में अपना वार्तालाप इंगलिश में ही किया ...बिल्कुल सरल एवं बहुत प्रभावशाली इंगलिश में ...

वह बता रही थीं कि उन्होंने पंचम के संगीत निर्देशक में जितने भी गीत गाए लोगों ने उन को बहुत पसंद किया ...उन्होंने बताया शुरूआती दौर में दो-तीन गीत जो उन्होंने फिल्मों के लिए गाए, वे सब इतना अच्छा नहीं कर पाए....बता रही थीं कि पंचम कहने लगे कि तुम्हारे साथ एक ऐसा गीत करूंगा जो कमाल कर दिखाएगा...और फिर आई फिल्म 1942- ए लव स्टोरी.....और उस का गीत --लगता है डर सनम....रिम झिम रिम झिम ...




इस प्रोग्राम के डायरेक्टर नितिन शंकर भी एक जानेमाने संगीतकार हैं....हमारा ज्ञान तो संगीत के बारे में ऐसा है कि हमें तो यह भी नहीं पता कि ये जो इतने संगीत के वाद्य-यंत्र बजाए जा रहे हैं इन के नाम क्या हैं....लेकिन इतना तो मानना पड़ेगा कि ये सभी कलाकार अपने अपने फन के माहिर हैं...और नितिन शंकर बता रहे थे कि ये जो ग्रुप हैं इन में से 10-12 लोग ऐसे पुराने फ़नकार हैं जो आर डी बर्मन के साथ काम करते रहे हैं...और हां, उस दिन आरडी बर्मन के साथ बहुत लंबे समय तक काम करने वाले जॉली मुखर्जी भी वहां थे ...ये आरडीबर्मन के संगीत में कोरस का काम देखते थे और पंचम दा के बहुत करीबी थे....उन्होंने भी दर्शकों के लिए एक दो गीत पेश किए...शोले के गीत के बाद तो तालियों की गूंज सुनते बनती थी ....  

 

कविता कृष्णमूर्ति ने अपने पसंदीदा गीतों की एक मेडली भी प्रस्तुत की ....


लव यू पंचम प्रोग्राम में जाकर उन के बारे में बहुत सी अच्छी बातें सुन कर बहुत अच्छा लगा...संयोग से मैं पिछले दिनों ही पंचम पर लिखी गई एक किताब पढ़ रहा था, लेकिन वही बात है किताब पढ़ना एक बात है और किसी लाइव प्रोग्राम में उनके उन साथियों से उन की बातें सुनने का मज़ा ही अलग होता है ....और रही बात नामचीन गायकों को सुनने की.....जिन्हें हम लोग रेडियो पर सुनते रहे, जिन के गाए गीत कैसेटों में भरवा कर सुनते रहे, जिन की आडियो सीडी और बाद में वीडियो सीडी और बाद में एफएम पर दिन रात जिन के गाए हुए गीतों की धूम मची हो, अगर इन को साक्षात गाते हुए देखने का मौका मिले तो क्या महसूस होता है ....यह ब्यां करना मुश्किल जान पड़ता है .......वैसे उस की ज़रुरत भी तो नहीं.....प्रोग्राम का आंखों देखा हाल जितना ज़रूरी समझा आप तक पहुंचा दिया न ....बात खत्म हुई ....लिखना तो और भी बहुत कुछ चाह रहा था, लेकिन इच्छा नहीं हो रही ....पोस्ट को यही पर बंद करते हैं....

भारतीय रेल.....ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी!

1970 के दशक के शुरुआती साल ...हम बच्चे थे, छोटे ....😎 लेकिन अपनी कॉलोनी की एक महिला की बहादुरी का एक किस्सा सुना करते थे अकसर...बार बार ......