Thursday, 25 May 2023

बारिश आने से पहले ....

बारिश के आने से पहले ...बारिश से बचने की तैयारी जारी है ...लोकल ट्रेन में दिखा यह विज्ञापन दो दिन पहले 

आज सुबह उठा, बॉलकनी से बाहर देखा तो ज़मीन पर पानी दिखा...यह न पता चल सका कि रात में बरसात हुई या फिर पानी के जो टैंकर रोज़ाना बिल्डिंग में आते हैं उन से पानी बह गया होगा...फिर भी मौसम के मिज़ाज बदले बदले दिखे..खुशग़वार...सिर थोड़ा भारी हो रहा था, सोचा बहुत दिन हो गए सुबह टहलने गए हुए...अजीब अजीब तरह के बहानों की वजह से ...कि लेट उठा लूं, ड्यूटी पर लेट हो जाऊंगा, अब धूप निकल आई है, कल चले जाएंगे ....सब के सब स्कूल के बच्चे के बहानों की तरह कच्चे, अपने दिल को दिलासा देने के लिए....खैर, चलिए, आज सुबह टहलने निकल ही गया...और बिना मोबाइल के ही ...और सड़कों पर भी रात में हुई बारिश के कुछ सुराग मिल गए...😎मलाल भी हुआ कि बारिश की पहली बूंदों से मिल ही न पाए ...

बाग़ में पहुंचते ही बरसात की कुछ बूंदें सिर पर पड़ी --हल्की हल्की बूंदाबांदी हुई कुछ पलों के लिए...दिल की किसी अंदर की तह में यह डर भी लगा कि अगर यह तेज़ हो गई और मैं भीग गया तो मेरा सिर दुःखने लगेगा ...खैर, ये मानसून के नहीं, प्री-मॉनसून की एक प्यारी सी फुहार थी ....अच्छा हुआ मोबाइल घर छोड गए थे, वरना या तो उस की फ़िक्र करने लगते या शेल्फी लेने के चक्कर में पड़ जाते ...

सुबह सवेरे धूप से बचने का कोई मेडीकल कारण भी हो सकता है 

हम लोग धूप से बचते फिरते हैं, तेज़ धूप से बचना भी चाहिए....कुछ दिन पहले मैंने एक महिला को देखा सुबह सैर करते वक्त भी वह छतड़ी का इस्तेमाल कर रही होगी...तरह २ की सनस्क्रीन अब घरों में डिस्कस होने लगी है, ये लगाओ बहुत ज़रुरी है, इस में इतना बचाव है ....लेकिन अब तक हमने कभी न तो इसे लगाया है और न ही कभी लगाएंगे...अब इस उम्र में क्या करेंगे ये सब चोंचलेबाज़ी...धूप में निकलना नहीं बन पाएगा तो घर ही बैठेंगे ...नहीं निकलेंगे बाहर ...

ये जो बड़े बड़े लेखक होते हैं ये सहज भाव से कुछ भी लिख देते हैं लेकिन उन की बातें हमें मुहावरों-कहावतों-लोकोक्तियों की तरह, अपने बड़े-बुज़ुर्गों की सीख की तरह दिन दिन कईं बार याद आती हैं....गुलज़ार ने बारिश के आने से पहले वाली अपनी नज़्म में एक बहुत अच्छा कटाक्ष किया है ...किस तरह से बारिश के आने से पहले हम लोग उस से बचने की तैयारी कर लेते हैं...पढ़िए आप भी ...

ठीक से पढ़ न पाएं तो इमेज पर क्लिक कर के पढ़िए...

बचपन था तो उस दौर में मौसम भी अलग थे, हम पहली बरसात हो या आखिरी उस में भीगने के लिए तैयार रहते थे....जानबूझ कर छाता न ले कर जाते ...ऊपर ऊपर से नाटक करते भीग गए हैं लेकिन अंदर से खुश होते ...सड़क कर इक्ट्ठा हुए पानी में हो कर निकलना....कईं बार जब बर्फबारी होती तो उन छोटे छोटे बर्फ के गोलों को इक्ट्ठा करना और उन को खाने का मज़ा लेना...और सब को कहते सुनना कि आज तो यहां ही शिमला-मनाली बन गया है ..

फिर बेसौसमी बर्फ के ओले गिरने लगे ..और सारी ज़मीन को कभी भर देते तो हम डर भी जाते कि यार, यह तो कुछ गड़बड़ मामला है, यह कुदरत का रौद्र रूप है ...कहीं दुनिया ही तो खत्म नहीं होने वाली ...क्योंकि आस पास बड़े बुज़ुर्ग को भी अकसर यही कहते सुना करते थे ... 

कुदरत के साथ प्यार से रहने वाले संदेशे, अपनी औक़ात में रहने के रिमाँइडर हमें कहीं से मिलते रहते हैं..हम देख कर अनदेखा करें, वह हमारे ऊपर है ...लगे रहो मुन्ना भाई में यह जो बात सुनाई दी थी, उसे सुनिए, यहां क्लिक करिए..

हां, असल बात तो मैं करना भूल गया कि यह जो गुलज़ार साहब की कही बात मुझे याद ऐसे आई कि परसों शाम मैं एक लोकल ट्रेन में दादर से चढ़ा ..तो यह रेन-कोट का इश्तिहार देखा- फ़ौरन यही ख्याल आया कि अभी तो मानसून ने दस्तक भी नहीं दी कि हम लोगों की तैयारी हुई....मैंने जैसे ही इस की फोटो ली, साथ बैठे बंदे ने भी वैसा ही किया....वैसे मैंने कभी रेन-कोट पहना नहीं, एक बार खरीदा था, लेकिन शायद ही एक-दो बार पहना हो, मुझे इतने भारी-भरकम कपड़ों से सिर दुखने का डर रहता है ....और मुझे उसे पहनना ही बडा़ झंझट लगता है। खरीदा तो था मैंने लेकिन बिना इस्तेमाल के पड़ा पड़ा ही कट गया...और फिर उसे फैंक दिया...

रेन कोट से ख्याल आया...डकबैक कंपनी की सेल का ...यह दुकान बंबई के फ्लोरा फाउंटेन के ठीक पीछे हुआ करती थी (अब है या नहीं, पता नहीं) लेकिन ३० बरस पहले की यादे हैं कि मुंबई की मॉनसून के दौरान उस डकबैक के शोरूम में छतरीयों, रेनकोटों, हॉट-वॉटर बोतलों आदि की सेल लगा करती थी ...उन दो चार दिनों के लिए वहां मेला लगा होता था ....मैं भी गया था एक बार वहां ...अब तो छतरीयां, रेनकोट एडवर्टाइज़िंग के लिए, फैशन स्टेटमैंट के लिए इस्तेमाल होने लगे हैं...लेकिन हम लोगों को तो वह लंबा सा छाता, जैसे स्कूल के मास्टर , गांव के डाकखाने के बाबू रखते थे फिल्मों में ...हमें अभी भी वही अच्छा लगता है ...लगता है बंदा बारिश से बच रहा है ....लगना भी तो ज़रूरी है ...

बारिश पर लिखे गए फिल्मी गीत हमें कितने अच्छे लगते हैं....मैं तो जैसे ही इस के बारे में सोचता हूं ...एक के बाद एक मेरे दिमाग में दस्तक देकर उसे थका देते हैं...अभी भी ऐसा ही हुआ...मुझे यह गीत याद आया...यू-टयूब पर सर्च किया...हैरानी हुई ...इसलिए कि मैं इस गीत को तो बहुत ज़्यादा पसंद करता हूं लेकिन इस का वीडियो देखते हुए मुझे क्यूं ऐसे लगा कि मैं पहली बार इसे देख रहा हूं...यह फिल्म भी मुझे याद नहीं आ रही ......कोई नहीं, शाम को देखता हूं ....अभी उठूं और ड्यूटी पर भागूं.....शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है, सुनने में अच्छा लगता है, उड़ लिया ख्वाबों में थोड़ा इस तरह के गीतों का सहारा लेकर, लेकिन यथार्थ के धरातल पर भी लौटना ज़िंदगी की सच्चाई है ...😎

5 comments:

  1. सरजी यह सब सोच जिन्दा दिल इनसान ही लिख और सोच सकता है 🙏👍

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  2. मौसमी चटर्जी हैं ये तो। सर बहुत अच्छा लिखा है। इतनी छोटी सी बात को इतने विस्तार से लिखना, वाकई कमाल है। अभिनंदन सर।

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    1. आप का आभार श्रीमान जी पोस्ट देखने के बाद उत्साहवर्धन करने हेतु ....बहुत बहुत शुक्रिया...

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  3. गाना सुनता तो शायद फिल्म का नाम भी याद आ जाता। पर क्या करूं रात के ग्यारह बजे हैं और मैडम सो रही हैं। क्षमा कीजिएगा। दिन में सुनकर बताऊंगा।

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    1. कोई बात नहीं श्रीमान जी, मैडम भी जाग जाती तो वह भी इस गाने का लुत्फ़ उठा लेतीं...क्योंकि यह गाना ही ऐसा है ....बहुत बहुत शुक्रिया ...हा हा हा हा हा

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भारतीय रेल.....ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी!

1970 के दशक के शुरुआती साल ...हम बच्चे थे, छोटे ....😎 लेकिन अपनी कॉलोनी की एक महिला की बहादुरी का एक किस्सा सुना करते थे अकसर...बार बार ......