Sunday, 30 April 2023

दादर स्टेशन- जहां पब्लिक का समंदर उमड़ता है रोज़

यह पोस्टर मैंने दो बरस पहले बनाया था ...नई नई कैलीग्राफी सीखी थी तब मैंने 

बंबई नगरिया के बारे में अपनी नोटबुक में कुछ लिखना शुरु करें और उसमें लोकल गाडियों और लोकल स्टेशनों से जुड़ी ढ़ेरों बातें न हो तो यह कापी नीरस लगेगी बेशक....इसे एहसान-फ़रामोशी की हद भी कहा जा सकता है क्योंकि जिन स्टेशनों और ट्रेनों की वजह से इस महानगरी की सारी रौनक है ....सारा सिलसिला यहां का जिन के भरोसे चल रहा है, ऐसे कैसे इन को बिसार दें...

जो भी बंबई में रहते हैं, उन के पास यहां की ट्रेनों और लोकल स्टेशनों से जुड़ी ढेरों बातें-यादें होंगी ...लेकिन कौन किस का कहे, किसे सुनाए वे सब बेशकीमती बातें ...ऐसे ही अंदर ही दबाए रखने से क्या होगा...अपने आस पास के चार लोगों से अगर साझा कर भी लेते हैं तो कोई ख़ास बात नहीं, ज़माने के साथ उन को बांटिए...आज तो ये सब नेट-वेट की इतनी सुविधाएं हैं कि आप जो भी लिख देंगे, इंटरनेट का पटल हमेशा के लिए उसे सहेज लेगा....इसलिए, मैं हरेक को कहता हूं कि लिखा करिए...अपने अनुभव, ज़िंदगी ने जो सिखाया....आपने उस से कितनी सीख ली ...ये सब सहेजिए...

खैर, मेरे पास तो लिखने का इतना मसाला है कि मुझे बहुत बार यही समझ नहीं आती कि यार आखिर शुरु कहां से करूं....अब ये जो लोकल ट्रेनें हैं और मुंबई के जो लोकल स्टेशन हैं, उन पर इतना कुछ लिखा जा सकता है लेकिन कुछ करने के लिए मूड ठीक चाहिए और फ़ुर्सत होनी चाहिए ...और मेरे केस में मेरा सिर भी ठीक होना चाहिए, कमबख्त बात बात पर दुःखने लगता है और फिर सारा दिन खटिया पर लेटे रहने को मजबूर कर देता है ...मैं भी कोई कम थोड़े न हूं ...उस हालत में भी पड़ा पड़ा ख्याली पुलाव बनाता रहता हूं ..

दादर स्टेशन का मेन पुल ...मध्य रेल और पश्चिम रेल के बीच सेतु 


अच्छा, आज मुझे दादर स्टेशन के बारे में कुछ कहना है ...दादर स्टेशन - एक स्टेशन जिस की यादें मेरे बचपन की यादों में बड़े प्यार से गुंथी पड़ी हैं....१९७० का दशक ...हम लोग अमृतसर से अकसर डीलक्स ट्रेन सुबह साढ़े छः बजे के करीब लेते थे ....जो अगले दिन बाद दोपहर ढ़ाई बजे के करीब दादर स्टेशन पर पहुंच जाया करती थी, वहां से हमें लेने आए रिश्तेदार अपनी गाड़ी में या कभी कभी टैक्सी में लेकर चेंबूर के लिए निकल पड़ते ...ज़्यादातर रिश्तेदार तब चेंबूर में ही रहते थे...

दादर का मुंबई वासियों की ज़िंदगी में बडी अहमियत है ...एक तो यहां से लोकल ट्रेन में यात्रा करने वालों को पश्चिम और मध्य रेल की लोकल गाड़ियों की अदला बदला करने को मिलती है ...इंटरचेज स्टेशन ...वैेसे तो कईं दूसरे स्टेशन भी हैं, लेकिन दादर ठहरा दादर ....किसी भी वक्त यहां पर लोगों का हुजूम देिख जाता है ..सब अपनी धुन में चले जाते हैं...मैं कईं बार सोचता हूं कि मुंबई में आ कर रहने वाली की कुछ परेशानियां तो तब खत्म हो जाती हैं जब उसे मुंबई की लोकल गाडि़यों का रूट-मैप समझ में आ जाता है ...आज नेट की वजह से, नए नए ऐप की वजह से यह जितना आसां हो गया है, उतना आज से तीस-चालीस बरस पहले न था ...मैं जब नया नया मुंबई में आया तो मेरे भाई ने मुझे कागज़ पर लोकल स्टेशनों के नाम - सेंट्रल और वेस्ट्रन दोनों के - लिख दिए थे और साथ में इंटरचेंज स्टेशन के बारे में बता दिया था...मैं अगर एक दो बरस नहीं भी तो भी कुछ महीने तक तो उस कागज़ को अपनी जेब में रखता था ...और पहले लोकल ट्रेनों में दरवाज़े के पास मध्य और पश्चिम रेल का एक रूट-मैप लगा रहता था ...जिसे लोग यात्रा करते वक्त निहारते रहते थे ....अच्छा गाइड का काम करता था वह रूट मैप...

दादर स्टेशन - मध्य रेल का और पश्चिम रेल का एक ही है ....प्लेटफार्म अलग अलग हैं....मुझे तो इतने बरस हो गए हैं इस स्टेशन पर आते-जाते, अभी तक मैं उस स्टेशन को अच्छे से समझ नहीं पाया...मेरे कहने का मतलब है कि अकसर मुझे नहीं पता चलता कि यह सीढ़ियां या यह एक्सकेलेटर किस पुल पर ले जाएगा....पिछले बीस तीस बरसों में दादर स्टेशन का इतना कायाकल्प हुआ है कि मेरे जैसे इंसान के लिए इस का लेखा-जोखा, इस की ओरिएंटेशन रखना भी मुश्किल है ....

इतने ज़्यादा सामान की हमें क्या फ़िक्र - बापू ले कर आए हैं, वही जाने कैसे लदेगा यह सब, हमें तो मस्ती से मतलब है ..

सब से बड़ा कौतूहल मेरे मन में जो बरसों से है वह यह है कि जब हम लोग डी-लक्स ट्रेन पर आते थे ...जिसे बाद में पश्चिम एक्सप्रे कहने लगे ...तो दादर उतर थे, तो टैक्सी से बाहर निकल कर किसी पुल से होते हुए सीधा आम्बेडकर रोड़ पर निकलते थे ...जो माटुंगा सायन को जाती है ...कुछ बरसों से मैं इस प्रश्न से जूझ रहा हूं कि हम जहां पर उतरते थे वह तो पश्चिम रेल का एरिया है और उस के आगे तो मध्य रेल का एरिया है ...इतने प्लेटफार्म हैं..और फिर बाद में मध्य रेल के दादर स्टेशन का बाहरी इलाका शुरू हो जाता है ....इस के समाधान के लिए मैंने कईं बार सोचा कि एक बार दादर स्टेशन के किसी ऊंचे से ब्रिज पर खड़े होकर सभी तरफ देखने की कोशिश करूंगा ...तो शायद बात मेरे पल्ले पड़ जाए ...

सच में दादर मेरे लिए अभी भी भूल-भुलैयां जैसा ही है ...जैसा कि मैंने ऊपर लिख ही दिया...लेकिन एक बात यह भी है न कि अगर हम लोग किसी चीज़ को ज़्यादा समझने की कोशिश करेंगे तो शायद यही होगा, दिमाग पर वज़न ही पडे़गा ....वैसे भी बंबई में लोगों के पास इस तरह की मगज़मारी का वक्त ही कहां है, उन्हें अगर ५.१३ की फास्ट लोकल चाहिए तो उन्होंने अपनी दिमाग में जो घड़ी फिट कर रखी है, उसे अच्छे से पता है किस एस्केलेटर को लेकर, किस ब्रिज से होते हुए और कहां से नीचे उतर कर उस प्लेटफार्म पर आने वाली गाड़ी के किस डिब्बे की जगह पर खड़े होना है ....सब कुछ सैट है ...और इस दौरान न तो किसी को देखना है, न ही किसी के किसी भी झमेले में पड़ना है...

सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं ...लोग आते हैं, लोग जाते हैं....

दादर स्टेशन ऐसा है जहां पर इस के मेन ब्रिज पर (जो सेंट्रल और वेस्ट्रन लाइनों को भी जोड़ता है...वैसे तो सभी ब्रिज यही काम करते हैं ...और अब तो ब्रिज भी पर्याप्त संख्या में हैं और एस्केलेटर भी ...)....लोगों का समंदर तो देखने को मिलता ही है...सच में कईं बार ऐसा माहौल होता है ..जैसे कहते हैं न ..सावधानी हटी, दुर्घटना घटी....अगर आप ने थोड़ा भी इधर उधर देखा, अपने निशाने से चूक कर थोड़ा सा भी टस से मस हुए तो अगले पल आप को दूसरी तरफ से कोई टक्कर मार के निकल जाएगा....इसलिए फोकस बहुत ज़रूरी है ...😎 

इन पुलों पर बहुत कुछ चल रहा होता है ..जैसे किसी पुल पर किसी दिन अगर कोई रक्त-दान कैंप चल रहा होता है तो किसी दिन एच.आई.व्ही संक्रमण के संबंधित जागरूकता अभियान चल रहा होता है....कभी लिज्जत पापड़ वाली संस्था की कोई प्रदर्शनी ब्रिज पर ही किसी थोड़े से खुले एरिया में लगी दिखती है तो वहीं आस पास दो पुलों को जोड़ने वाले एरिया में एक शहर-एक उत्पाद का स्थायी स्टॉल दिख जाता है ....यहां वहां फूलों के गजरे बेचने वाली बैठी होती हैं, कोई दृष्टि बाधित अपनी बांसुरी वादन से लोगों के मन को लुभा रहा होता है ...और भी बिल्कुल छोटे मोटे काम-धंधे यहां अकसर चलते दिखते ही हैं....अकसर चलते फिरते .....कईं बार ब्रिज के बीचों बीच कुछ फरियादी बैठते दिखते हैं ...और कई ंबार सीढ़ियों पर भी ....

सपनों की नगरी कहते तो हैं बम्बई को...

कौन जाने कितनों के ख़्वाव साकार हुए, कितनों के राख ...

दादर स्टेशन के पुल के ऊपर कईं बार बीमार लोग भी दिखते हैं....जो दादर सेंट्रल की तरफ़ से केईएम अथवा टाटा अस्पताल जैसी जगहों के लिए बेस्ट बस सेवा का इस्तेमाल करते हैं....बस सेवा का स्तर बेहतरीन है ...शायद दस दस मिनट के अंतराल पर ए.सी बस सेवा है जो पांच-छः रूपये में पब्लिक को उन के गंतव्य स्थल तक पहुंचा देती हैं। बीमारों के स्वस्थ होने की दुआ ही तो कर सकते हैं ...लेकिन मन दुःखी होता है किसी की परेशानी देख कर। कल दोपहर में भी एक अधेड़ उम्र का पुरूष बहुत बीमार दिखा उसी मेन पुल पर ..साथ में उस की पत्नी और बेटा से शायद ...बेहद कमज़ोर दिख रहा था, चल नहीं पा रहा होगा...ब्रिज पर रेलिंग की टेक लगा कर बैठ गया...मुझे लगा उसे चक्कर आया होगा ...मैंने उस के बेटे से इशारा कर के पूछा कि पानी चाहिए....उसने अपने झोले की तरफ़ इशारा कर के मुझे बताया कि है, पानी है ....बस, इतने से ही मेरी ड्यूटी पूरी हो गई और मैं आगे बढ़ गया...यही मुंबई है ...

पटरियों का रख-रखाव भी निरंतर चलता रहता है ...ट्रैकमैन अपने काम में लगे रहते हैं...

मुंबई के लोकल स्टेशनों की मेरे पास कम से कम एक हज़ार तो तस्वीरें होंगी लेकिन अब देखिए मेरा आलस कि यहां इस पोस्ट में लगाने के लिए मुझे फोटो ढूंढने की फुर्सत नहीं है ...ये तस्वीरें हैं जिन में ज़िंदगी के लगभग सभी रूप देखने को मिलते हैं ....मैं कोई हिंदी का न तो विद्वान हूं और न ही कोई साहित्यकार ...यह जो हिंदी थोड़ी बहुत लिख लेता हूं यह लिखते रहने का ही नतीजा होगा...हिंदी की अखबार और किताबें पढ़ता रहता हूं ...और लखनऊ में जो सात आठ बरस रहा, उस से हिंदी में कुछ तो सुधार हुआ ही होगा...लखनऊ जगह ही ऐसी है ...बिना कुछ किए आप की हिंदी लखनऊ ठीक कर देता है ...हां, तो वहां रहते हुए कईं बार सुना था कि जीवन में नौ रंग होते हैं ...वात्सल्य, प्रेम, करुणा, पीड़ा ...देखिए, मेरा सतही ज्ञान ...मुझे तो इन के नाम भी नहीं आते ..लेकिन इतना मैं कह सकता हूं कि दादर स्टेशन के पुलों पर और इस के प्लेटफार्मों पर खड़े खड़े आप को सभी नौ रस अनुभव करने का मौका मिल सकता है ....

यह भी दो साल पहले लिखा था ..

दादर स्टेशन के मध्य रेल के प्लेटफार्मो पर बहुत अच्छी अच्छी पेंटिंग्स देखने को मिलती हैं...यह जो ऊपर दिख रही है, यह भी वहीं के किसी प्लेटफार्म की है दो बरस पहले की ...लिखा मैंने है उस के चेहरे के भाव देेख कर ....यह उन दिनों की बात है जब कोविड की दूसरी लहर चल रही थी...मैं अकसर इन पेंटिंग्स की तस्वीरें खींच लेता हूं ...
















दादर स्टेशन पर अकसर कर्मचारी संगठनों के बड़े नेताओं के फुल-बॉडी टाइप के बड़े पोस्टर भी नज़र आते हैं....दो दिन पहले की एक घटना का ज़िक़्र करना चाहता हूं...एक बुज़ुर्ग पुरुष रैंप से नीचे प्लेटफार्म पर उतरा और आते ही उसने सामने दिखे एक नेता की तस्वीर पर उस के पैर छू कर अपने माथे पर हाथ लगाया...। यह बिल्कुल सच्ची घटना है, मेरी आंखों देखी....और उस बंदे को ऐसा करते देख कर मैंं यही सोचने लगा कि हमारा जन-मानस भी कितना सीधा-सरल है....इससे पहले कि मुझे कुछ और सोचने का मौका मिलता मेरी लोकल आ गई और मैं उस में सवार हो गया...

दादर स्टेशन पर पांच दस मिनट बिताने को मिलें तो बंदा रेलवे विभाग की कार्य कुशलता की दाद देने पर मजबूर हो जाता है ..हर दो मिनट के बाद स्लो और फॉस्ट लोकल आ जा रही हैं ...और बीच बीच में बाहर गांव की गाड़ियां (आउट-स्टेशन ट्रेन) दादर से आ जा रही हैं ....ये गाड़ीयां आती हैं दो मिनट रूक कर आगे निकल जाती हैं और अगले मिनट ही उसी प्लेटफार्म पर लोकल गाड़ी यात्रियों की सेवा के लिए हाज़िर हो जाती है...यह सारी व्यवस्था जिन रेल कर्मियों एवं अधिकारियों के जिम्मे है, उन को सलाम .... लोगों के इतने समंदर को कंट्रोल में रखना....यह किसी अजूबे से कम नहीं है...

रेल प्रशासन की नज़र एक एक गतिविधि पर रहती है ....लोकल स्टेशनों पर जो हो रहा है ...दादर मध्य रेल का प्लेटफार्म नंबर १ की चौड़ाई थोड़ी कम है ...अब भीड़ ज़्यादा होने लगी है ..कुछ महीने पहले कुछ युवक लोकल गाड़ी के नीचे आ गए थे ...अब सुन रहे हैं कि इस प्लेटफार्म की चौड़ाई शीघ्र बड़ाई जा रही है ..वैसे अभी भी समुचित पुलिस कर्मी तैनात कर के उस प्लेटफार्म की भीड़ को नियंत्रित किया जाता है ताकि लोग इधर उधर एक दूसरे से न टकराएं और सजग-सचेत हो कर चलें....कईं बार प्लेटफार्म पर भी गाड़ी चढ़ते उतरते वक्त ऐसा कुछ लफडा हो जाता है ...देखिए इस काका की कमीज़ का बटन एक महिला के बैग की ज़िप में अटक गया...छूट तो गया बाद में लेकिन आने जाने वाले लोग ...क्या काका, क्या काका कहने से कहां चूके!! 😎


एक बात तो मैं लिखना भूल ही गया कि आज से पच्चीस तीस बरस पहले मैंने भी बच्चों के लिए दादर स्टेशन के ब्रिज से बहुत खिलौने खरीदे हैं- पानी में चलने वाली नांव, साबुन के लिक्विड से बबल बनाने वाला खिलौना, हैलीकाप्टर (जो घर आ कर पहली उड़ान भरते वक्त ही धाराशाही हो गया था), हवाईजहाज़ 😀...एक दो बार तो मैं वहां से बच्चों की सूती निक्कर-और कमीज़ें ले आया ...यही कोई ३०-३५ रूपये में बच्चों की कमीज़ मिलती थी तब पुल पर बैठे हुए उन हॉकरों से ...और बेटे को इतनी पसंद आई कि वह उसे ही पहनना पसंद करता था ...

जाते जाते एक बात और दिख गई जो मैंने लिखी थी कैलीग्राफी सीखने के दौरान ...वैसे दादर स्टेशन की बातें अभी पूरी नहीं हुई हैं, इस की और इस के आसपास की बातें अभी बची हुई हैं, फिर कभी समेट लेंगे ...😎


Saturday, 29 April 2023

मुंबई के पृथ्वी थियेटर में पहली बार ...

 28 अप्रैल 2023 

कल से ख्याल आ रहा था कि मीडिया डाक्टर ब्लॉग पर लिखते लिखते ऊबने सा लगा हूं...16 बरस हो गए उस पर लिखते लिखते ...सोच रहा हूं किसी दूसरे ब्लॉग पर भी लिख के देखूं...और फिर यही लगा कि आते जाते बंबई को जैसे भी देखता हूं, महसूस करता हूं, उसे ही क्यों न लिख दिया करूं इस मुंबई की डायरी में ...

दरअसल जब मैं इस नए ब्लॉग का यूआरएल चुन रहा था तो मेरा ख्याल यही था कि मुंबई डॉयरी नाम से ही लिखूं...लेकिन वह नाम उपलब्ध न था, इसलिए मैंने मुंबई नोटबुक नाम उठा लिया...क्या फ़र्क पड़ता है, डॉयरी भी अपनी है और कापी भी खुद की ...जो लिख रहे हैं वही लिखते रहेंगे...बंबई के बारे में बोले-बतियाएगें....कुछ अहसास, कुछ अनुभव, कुछ मंज़र, कुछ सपने ..कुछ हक़ीक़त इस शहर की ब्यां करेंगे..। 

मुझे लग यह भी रहा था कि मुझे फोटोग्राफी का शौक है लेकिन जितने फोटो मेरे पास हैं, उन का इस्तेमाल सही ढंग से तभी हो पाएगा अगर इस महानगर के बारे में कुछ लिखा भी जाए...दरअसल मैंने बंबई के ऊपर लिखी गई इतनी किताबें देखी हैं, और कुछ थोड़ी बहुत पढ़ी भी हैं कि मुझ में भी एक चाहत हुई कि सभी लिखने वालों ने अपने दौर के बंबई के बारे में बहुत कुछ लिखा, जैसे उन सब के तजुर्बे रहे। 

यह सिलसिला जारी रहना चाहिए ...अब बारी हमारी है, हमारे पास इतनी सुविधाएं हैं इस दौर में ...फिर भी हम लोग आंखो-देखी बातें दर्ज न करेंगे तो आने वाली पीढ़ी कहां से देखी यह सब। भाषा का भी मसला है ...मैं इंगलिश में और पंजाबी में भी लिख सकता हूं ...लेकिन हिंदी में लिखना ही मुझे ठीक ठाक आता है ....इतने बरस हो गए इसी ज़ुबान में लिखते लिखते...और वैसे भी अगर हम जैसे लोग हिंदी में नहीं लिखेंगे तो कौन लिखेगा...जी हां, हमें ही लिखना होगा ...


कल रात सोने से पहले बॉम्बे-टाइम्स उठाई तो पता चला कि इप्टा की तरफ़ से मुंबई के जुहू में कुछ नाटकों का मंचन किया जा रहा है, लेकिन यह क्या, उन में से अधिकतर नाटकों की टिकटें तो बिक चुकी थीं। जिस नाटक की टिकट अभी मिल रही थीं, उसे बुक-मॉय-शो पर जा कर ले लिया...400 रुपए के करीब की टिकट थी...एक तो कारण था कि इप्टा की तरफ़ से इस का मंचन किया जा रहा था ...लखनऊ में अपने 7-8 अपने प्रवास के दौरान इप्टा के बारे में सुना था और इन द्वारा मंचित नाटकों को भी बहुत बार देखने का मौका मिला था ...

आज शाम वहां पर जूहू के जानकी कुटीर में पृथ्वी थियेटर में उस नाटक का मंचन था...जो रविन्द्रनाथ टैगोर की कहानी दृष्टिदान पर आधारित था ...मैंने कहानी तो नही पड़ी वह ..लेकिन रविंद्रनाथ टैगोर की लेखनी पर कुछ भी बना ही देखना तो बनता ही है ...। रविंद्रनाथ टैगोर की एक रचना ही मेरे इस बंबईया ब्लॉग की प्रेरणा भी है ....कहते हैं कि एक बार रविंद्रनाथ टैगोर ने सत्यजीत रे (जब वे बालक थे) तो कुछ पंक्तियां लिख कर दीं ...और उस की मां से कहा कि इसे संभाल कर रखना, जब यह बड़ा होगा तो इसे इस की अहमियत समझ में आएगी...उन पंक्तियों में यही लिखा था....मैंने उन्हें कहीं लिख कर रखा तो है ...दिख नहीं रहीं .....यही लिखा था कि मैं दुनिया घूम आया ....पहाड़ों, झरनों, वादियों का आनंद ले आया, लेकिन अपनी खिड़की के बाहर चावल के पौधे पर मैंने ओस की चमकती बूंदे तो देखने की कभी मुझे फुर्सत ही न मिली ...

वर्ली सी-लिंक से ठीक पहले यह चौक आता है तो इस माडल के देख कर मुझे मेरे प्री-मेडीकल के कैमिस्ट्री के दिन याद आ जाते हैं ...उस के साथ ही याद आता है उस कैमिस्ट्री वाले प्रोफैसर का पढ़ाने का बिल्कुल नीरस ढंग ...मुझे कैमिस्ट्री पढ़ना कभी भी न भाता था, न ही कुछ याद रहता था ...सब कुछ एक जैसा ही लगता था ..कमबख्त मेरा तो उस प्रोफैसर की फुर्ती देख कर दिमाग ही घूम जाता था ...अकसर ये माडल रास्ते में देख कर मुझे उन दिनों की याद आ जाती है, जिन्हें मैं भूल जाना चाहता हूं. ...




जुहू रोड पर ये लोग पेंट से कोई रंगोली बना रहे थे ...

शाम के वक्त सांताक्रुज़ के पार्क के पास थोड़ा जाम सा लगा हुआ था ...श्री नारायण राणे जो केन्द्र में मंत्री हैं, उन का काफ़िला निकल रहा था....मैं भी पृथ्वी थियेटर तक पहुंचते पहुंचते 20 मिनट लेट हो गया ....बाहर खड़े गेटकीपर को अपनी टिकट दिखाई तो उसने कहा कि नाटक तो अपने टाइम पर शुरू हो चुका है, और हम लोग एक बार नाटक शुरू होने पर अंदर नहीं लेते ...बड़ा अफ़सोस हुआ...एक तो मैं इतनी दूर से आया था इस नाटक को देखने ..और थोड़ा बहुत 400 रुपए खराब हो जाने का भी मलाल था ...


मैंने उस को एक बार फिर कहा कि करने दो एंट्री ..तो उसने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता, 10-20 लोग और भी हैं जो बाहर देखिए वहां कैंटीन में बैठे हुए हैं, अब आप लोग तभी अंदर जा सकेंगे जब इंटर्वल होगा ....क्या करता, थोड़ी कैंटीन ही घूम ली ...लेकिन वहां मुझे ऐसा कुछ दिखा नहीं जो मुझे पसंद हो ...शायद पिज़ा ही ऐसा था जिस का नाम तो मैं जानता हूं लेकिन पसंद बिल्कुल नहीं खाना ...कभी एक टुकड़ा खा लेता हूं तो तबीयत बिगड़ जाती है ...क्या करें, जो है सो है....फिर मैं हाल के बाहर लगे हुए पोस्टर देखने लग गया ....तभी मुझे राकेश बेदी मिल गए ...उन से कुछ बात हो ही रही थी कि गेटकीपर ने कहा कि अब आप आ जाइए....इंटरवल हो गया था ...इतनी जल्दी इंटरवल हो गया...मैं हैरान था ... जो पोस्टर इत्यादि दिखे उस हाल के बाहर उन्हें यहां भी लगाए दे रहा हूं ...मुझे तो रोचक लगे, शायद आप में से भी किसी को लगें...हां, अगर कोई ठीक से पढ़ा न जाए तो उस फोटो पर क्लिक कर के भी आप उसे अच्छे से देख-पढ़ सकते हैं...










राकेश बेदी से मिलना भी एक बढ़िया संयोग ही था, हमारी पीढ़ी के वह सुपर-स्टार हैं...इन के नाटक का भी मंचन होने वाला था आज रात ९ बजे ...इन का एक नाटक मैंने कुछ महीने पहले मुंबई के यशवंतराय चव्हान ऑडीटोरियम में भी देखा था ...इस फ़नकार के फ़न को सलाम ...मैंने कहा- तुहाडे नाल इक शेल्फी लैनी ए ....कहने लगे ..हां जी, हां जी, क्यों नहीं...आओ....






खैर, उस गेटकीपर ने मेरे मोबाईल पर टिकट का क्यू-ऑर कोड था, उसे स्कैन किया और मुझे अंदर जाने दिया...अंदर जा कर मैं कोई सीट ढूंढ ही रहा था कि वहां पर डा गुरप्रीत दिख गए ...अपनी मिसिज़ और अपनी माता जी के साथ नाटक देखने आए हुए थे...हम लोग अभी हाल चाल पूछ ही रहे थे कि नाटक का अगला हिस्सा फिर से शुरू हो गया....मुझे मलाल तो मन में रहा ही कि न तो मैंने यह कहानी पहले से पढ़ रखी है और न ही मैंने इस नाटक का पहला भाग ही देखा है ...खैर, जितना भी नाटक देखा, बहुत ही बेहतरीन लगा ....सब की एक्टिंग क़ाबिले-तारीफ़ ....सच में हैरान कर देने वाला अभिनय था सब किरदारों का ...

मेरी इच्छा हुई कि एक फोटो ही खींच लूं ..पास बैठे गुरप्रीत से मैंने पूछा कि फोटो ले लूं...उसने बताया कि नहीं, यहां फोटो नहीं खींच सकते, अगर कोई ले भी लेता है तो उसे डिलीट करवा देते हैं....अभी अगली लाइन में बैठे एक बंदे की फोटो इन लोगों ने डिलीट करवाई है, उसने बताया। मैंने उस की बात सुन कर कैमरा जेब के हवाले कर दिया....साईलेंट मोड पर तो था ही, बीच बीच में वाट्सएप देख लेता था ..लेेकिन पीछे किसी का कैमरा बज उठा नाटक मंचन के दौरान....बहुत अजीब सा लगा  ...सब को ख्याल रखना चाहिए ... 

अंजन श्रीवास्तव के साथ कुछ वक्त बिताने का मौका मिला ...मैं और इन का एक और प्रशंसक वागले की दुनिया के दिनों को याद कर रहे थे...तो इन के चेहरे पर खुशी छा गई...मैंने अपने बारे में बताया तो बताने लगे रेलवे में एक महाप्रबंधक थे कोई मिस्टर आर्य ..रिटायर हो गए हैं ...वह नाटक करवाने के लिए हमारी पूरी मंडली को भोपाल या आगरा (मैं भूल गया) ले कर गए थे ...कल जो नाटक हम देख कर बाहर निकले थे उन में इन की बेटी की भी एक अहम् भूमिका थी ....लोग उस के अभिनय की भी दाद देेने लगे तो इन्होंने उस की अन्य बेहतरीन भूमिकाओं के बारे में भी बताया ... 

खैर, नाटक खत्म हुआ और फिर सभी कलाकारों का तारुफ़ करवाया गया...सब के बारे में जान कर अच्छा लगा ...अंजन श्रीवास्तव को देखा और रमेश तलवाड़ ने इस नाटक का निर्देशन किया था ... रमेश तलवाड़ की निर्देशित फिल्मों के बारे में तो सब जानते ही हैं...एक महान् हस्ती ...एक बात इन सब हस्तियों के बारे में यह भी लिखना ज़रुरी समझता हूं कि इन लोगों को फ़न और क़द अपने पेशे में जितना बड़ा है, ये उतने ही हलीम हैं...यही इन का बड़प्पन है...वरना मेरे जैसे थोथे चने तो ज़्यादा बजा करते हैं...(थोथा चना बाजे घना ..यह कहावत तो सुन ही रखी होगी आप सब ने ...😀)

रमेश तलवाड़ साब भी बडी सहज सरल शख्सियत के मालिक लगे ..इन्होंने ने बहुत सी महान फिल्में दीं ... 

लिखते लिखते इस वक्त भी यह ख्याल आ रहा है और अकसर आता है कि हम लोग किसी छोटे शहर को भी कितना देख पाते हैं...मैं इतने शहरों में रह चुका हूं ...लेकिन जब इमानदारी से सोचता हूं तो यही पाता हूं कि कुछ नहीं जानता उन के बारे में ....यहां तक कि अपने होम-टाउन अमृतसर के बारे में ही कितना कम जानता हूं ...फेसबुक पर एक पेज है ...अमृतसर वॉकिंग टूर्ज़ ....कुछ दिनों से मैं उसे ज़रूर देखता हूं ...मुझे ऐसे लगता है कि जैसे मैं भी अपने शहर को ही घूम रहा हूं....जो मेरी उम्र है उस का आधा हिस्सा मैंने उस शहर में बिताया है ...फिर नौकरी करने लगे ....पढ़ाई के दौरान हम लोग जितना शहर को देख सकते हैं, उतना ही देखा.....नौकरी के कारण जिन जिन शहरों में भी रहे, यही २-४ पांच फ़ीसदी ही जानते होंगे इन शहरों को ...बंबई की ही बात करूं तो इस शहर से जुड़े हुए लगभग ३० बरस हो गए ....१५ बरस सीधे तौर पर और १५ बरस आते जाते हुए .....लेकिन फिर भी लगता है इस महानगर को पांच फ़ीसदी से भी ज़्यादा नहीं जान पाया ...नौकरी करते हुए जितना हो पाया, उतना देखा ...लेकिन फिर भी ऊपर ऊपर ही से देख पाया ....और यह हाल तब है जब कि मुझे कार में बैठ कर शहर को घूमने में कोई दिलचस्पी नहीं रहती ....घूमना तो दूर, मेरा तो  ट्रैफिक देख कर सिर दुखने लगता है ...वैसे भी किसी शहर को देखने के लिए आप को ढेर सारी फुर्सत चाहिए होती है ...जो नौकरी के दौरान मिल मयस्सर हो नहीं पाती....भीड़-भाड़ वाले इलाकों में पैदल चलने से गुरेज न करने की तबीयत होनी ज़रूरी है ...लेकिन जब तक ज़िंदगी के टंटों से फ़ुर्सत मिलती है तब तक ये डाक्टर लोग घिसे-पिटे घुटनों से बड़ी एहतियात से काम लेने की नसीहत देने लगते हैं...अगर कोई नसीहत न माने तो फिर उस का अंजाम भुगतने के लिए भी तैयार रहे ...

हां, मैं बात यही दर्ज करना चाहता था कि मुझे बंबई में रहते इतना वक्त गुज़र गया ...कईं बार जब जुहू के इस्कॉन टेंपल गये तो रास्ते में जानकी कुटीर का बोर्ड तो पढ़ते थे ...लेकिन यह नहीं समझ आता था कि यह जो पृथ्वी थियेटर है यह मेन रोड पर ही है या कहीं अंदर जा कर है...लॉक-डॉउन के कुछ महीनों में वर्सोवा तक फैट-बाइक चलाते हुए भी अकसर उधर ही से गुज़रता था लेकिन कभी इस थियेटर के दर्शन न हुए ...कल पहली बार वहां जाना हुआ जब कि टाइम्स आफ इंडिया में इस में होने वाले इवेंट्स के बारे में इतना कुछ आता रहता है, देखते पढ़ते रहते हैं ...


पृथ्वी थियेटर की बुक-शॉप भी देखने वाली है ....हर दिन सुबह ११ से रात ११ बजे तक खुली रहती है ...


अच्छा, इस के बाद पृथ्वी थियेटर की बुक शाप में भी जाना तो था ही ...गुरप्रीत तो चला गया, उसे ओशीवाड़ा जाना था...मैंने काउंटर पर पूछा कि हिंदी की किताबें हैं, तो उसने हिंदी की किताबों की तरफ़ इशारा कर दिया ...मुझे भी वापिस लौटने की जल्दी थी...लेकिन इतना तो मैं समझ गया कि इन्होंने रस्म अदायगी के लिए ही हिंदी की किताबें इक्ट्ठी नहीं कर रखीं, इन के पास जो भी किताबें हैं, वे सभी बड़ी नामचीन लेखकों, शायरों की कृतियां हैं, जब उन का काम ही थियेटर का है तो उन का इस के बिना काम कैसे चल सकता है...मैंने भी जल्दी जल्दी से दो किताबें खरीदीं और वहीं से जुहू बीच पर आ गया ....

मैं इन दोनों लेखकों का जबरदस्त फैन हूं....देखते हैं सफल लेखक बनने का कोई गुर तो पता चले मुझे भी 😇..

शहर के जिन इलाकों में हम कभी टहल रहे होते हैं तो उन से जुड़ी यादें भी अनायास हमारे मन में उछल-कूद करने लगती हैं...जुहू बीच पर आते ही पचास बरस पुरानी यादें आने लगती हैं...उन दिनों या आज से बीस तीस बरस पहले भी इतनी भीड़ नहीं हुआ करती थी यहां ..खैर, भीड़ से हमें एतराज़ क्यों, सब लोग अपनी यादें बनाने आए हैं, हरेक को हक़ है ....सब से ज़्यादा मज़ा तो आया नन्हे-मुन्ने बच्चो में रेत में घर बनाते देख कर ...हम भी बचपन में यह सब खूब किया करते थे ...घर के पास ही एक सरकारी स्कूल बन रहा था ...रेत वेत के ढेर वहां लगा कर चले गए ...अब उसे बनना तो अपनी स्पीड से ही था ...हम कितने महीनों तक वहां पर खेलने जाया करते थे ..बीच में कभी बरसात हो जाती तो हमारे और भी मज़े हो जाते, हमें गीली रेत में अपने आशियाने बनाने में बड़ी आसानी होती..

जुहू बीच पर लगा हुआ था लोगों का तांता ....मेले जैसा मंज़र 

बनाओ यार बनाओ ....लगे रहो ....kids creating life-long memories! 

जुहू बीच में अभी थोड़ा आगे चला था कि होटल पाम-ग्रोव दिख गया और इस के साथ ही वहां पर मिली १९८९ मार्च में - ३५ बरस पहले- मिली एक बहुत बडी़ ट्राफी की ...बेस्ट रिसर्च पेपर अवार्ड मिला था ...जब वापिस अपने शहर गया तो वहां पर अखबार में खबर में छपी थी ...इतनी बड़ी ट्राफी देख कर लोगों की आंखें खुली की खुली रहने लगी थीं ..जो भी देखता, पूछने लगा कि चांदी की होगी ..हार कर कुछ दिनों के बाद मैं उसे सुनार को दिखाने ले गया .....उस ने देखते ही फैसला सुना दिया यह चांदी नहीं है......एक दो को और दिखा दी .....शायद कोई ज़्यादा सयाना हो, लेकिन उन का डॉयग्नोसिस न बदला ....मतलब वह चांदी की नहीं थी, इसलिए उसे भी दूसरे शो-पीसों के साथ एक शेल्फ पर रख दिया गया...घर में आने जाने वालों पर धाक जमाने के लिए....फिर नौकरी के लिए घर से निकल गए ....कुछ बरसों में घर में एक बड़ी चोरी हुई ...चोरों ने सारे सामान के साथ साथ उस बड़ी सी ट्राफी पर भी हाथ साफ कर दिया ....अब उस के चोरी होने का अफसोस तो हुआ ही ...चाहे चांदी की न थी, लेकिन ईनाम में एक चपत की भी अपनी अहमियत होती है ...
होटल रामदा प्लाज़ा पाम-ग्रोव ....से भी जुड़ी यादें हैं अपनी ...जब डॉयरी लिखने लगते हैं तो यह भान होता है कि कमबख्त हमारी यादें भी हमारी तरह सीधी-सपाट नहीं हैं, ये भी तहों में एक के अंदर छिपी पड़ी हैं....जैसे कह रही हों उसी अंदाज़ में ....भूली हुई यादों  इतना न सताओ, अब चैन से रहने दो ....पास न आओ....😂

यह मुंबई डॉयरी लिख रहा हूं ...इसलिए कोई शब्द-सीमा नहीं है इस में ...जैसे डॉयरी लिखते हैं, वैसे ही लिख रहा हूं....इसे किसी के लिए पढ़ने ज़रूरी नहीं है, ब्लॉग पब्लिक डोमेन में हैं, इसलिए लिंक शेयर कर देता हूं .....लेकिन इसे पढ़ना बिल्कुल ऐच्छिक है, जहां भी मन उचाट होने लगे, इसे वहीं छोड़ कर अपने मनचाहे काम में लग जाइए ...जिसमे आप को खुशी मिले ....हां, मेरे खुद के लिए यह डॉयरी बड़ी अहम है, मैं इस के ज़रिए अपनी यादों को, तस्वीरों को एक जगह करीने से सहेज पाता हूं ...

लो कर लो बात...सारी रात रामायण की कथा होती रही और कथा के बाद किसी ने पूछा आचार्य जी, सीता कौन थीं....यही बात यहां भी है, पृथ्वी थियेटर की बात हुई , उस नाटक की तो ज़्यादा बात हुई नहीं जिसे मैं देखने गया था ....बात क्या करूं, अगर इंटरवर के बाद आप नाटक देखने जाते हैं तो क्या समझ पाते हैं, खैर, एक सबक तो मिल गया कि ऐसा भी होता है कहीं कि जब नाटक शुरू हो जाए तो प्रवेश बंद हो जाता है ...यह मेरी प्राब्लम थी कि मैं वहां वक्त पर नहीं पहुंच पाया.....प़ृथ्वी थियेटर के प्रबंधन का यह नियम एकदम दुरुस्त है, क्या करें उन्होंने भी अपने म्यार को कायम रखना है ...हमें ही अपनी लेट-लतीफ़ी की आदतों को बदलना होगा...

अच्छा, मैंने कहा न कि मुझे उस कहानी के बारे में भी कुछ नहीं पता था ...घर लौटने के बाद रात में गूगल सर्च किया ...एक जगह कहानी दिख गई, लेकिन इतनी लंबी थी कहानी कि पढ़ने की हिम्मत न कर पाया ...नींद की वजह से। यू-ट्यूब पर भी इस नाटक को देखना चाहा लेकिन किसी अन्य ग्रुप की पेशकश ही दिखी...मुझे नहीं लगता कि पृथ्वी थियेटर वाले इन की रिकार्डिंग भी करते होंगे .....जब वहां एक तस्वीर खींचने की इजाज़त ही नहीं है तो कहां होती होगी रिकार्डिंग ....खैर, यह भी अच्छी बात है, क्योंकि थियेटर माध्यम ही ऐसा है, इत्मीनान से बैठ कर वहीं देखने का, सोचने का ....और कलाकारों के काम से गदगद होने का।  

वैसे इस पोस्ट को लिखने के बाद मैंने जब इस नाटक को यू-ट्यूब पर देखना चाहा तो मुझे इस का पंजाबी भाषा में हुआ मंचन दिख गया और वह भी अमृतसर में 😁.....वाह क्या संयोग ....लेकिन अभी मैंने इसे देखा नहीं, बाद में देखूंगा....यह रहा इस का लिंक ..अगर आप देखना चाहें तो ... दृष्टिदान ...

चलिए, आज के लिए अपनी नोटबुक को बंद कर रहा हूं ....

भारतीय रेल.....ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी!

1970 के दशक के शुरुआती साल ...हम बच्चे थे, छोटे ....😎 लेकिन अपनी कॉलोनी की एक महिला की बहादुरी का एक किस्सा सुना करते थे अकसर...बार बार ......