स्कूल में पढ़ते थे निबंध लिखने को कहा जाता था ...और इस तरह के विषयों पर ....रेलवे स्टेशन का दृश्य, गाड़ी का एक सफ़र ....कुछ दिन पहले मुझे बार बार यह ख्याल आ रहा था कि उस दौर में कितनी कम गतिविधियां चल रही होती थीं रेलवे स्टेशनों पर ...इस से हमारा काम आसान हो जाता था ..हमें कुछ बातें तो लिखनी होती थीं ...कुली के बारे में कि वह लाल कपड़े पहने हुए लोगों के भारी भरकम सामान को यहां से वहां ले कर जा रहा है, दूसरी बात कुछ चाय-नाश्ते या पूरी-छोले के खोमचों के बारे में कहनी होती थी ...साथ में जैसे ही गाड़ी स्टेशन पर रुकी ...चाय, चाय, गर्मागर्म चाय....बस, इस तरह की दो चार किस्से विस्से ऊट-पटांग लिख देेते, हमारे हिंदी के मास्साब हमें पास कर देते, और क्या .....
मज़ा तो अब आए अगर कोई इस तरह के विषयों पर कुछ लिखने को कहे ...लेकिन एक दिक्कत है, अब तो स्टेशनों पर और गाडि़यों में इतनी गतिविधियां एक साथ चल रही होती हैं कि उन का ट्रैक रखना मुश्किल हो जाए ....और वैसे भी अब स्टेशनों पर इतने रौनक-मेले हैं लेकिन स्कूल के बच्चों में अमूमन लिखने में कोई ज़्यादा रूचि है नहीं...बीस-तीस बरस से की-बोर्ड का ही तो बोलबाला है ..लिखने की आदतें छूटती जा रही है आज की पीढ़ी में ...जो है सो है, स्वीकार करिए या नकारिए, इस से कुछ फ़र्क नहीं पड़ता ...
लेकिन आज के स्टेशनों और ट्रेनों पर नावल, उपन्यास अगर कोई न भी लिखना चाहे तो एक लघु-उपन्यास जैसा तो कभी भी लिख सकता है ...बस, यही भावना थी इस पोस्ट को लिखने के लिए कि कभी एक दिन के सफर के बारे में लिखूंगा ...ज़ाहिर सी बात है, अब लिखने में यह छूट है कि जो मेरा दिल चाहेगा वही लिखूंगा....मास्साब नहीं है कान खींचने के लिए, एक बात ..दूसरा, कोई प्रतिक्रिया (फीडबैक) अगर देगा तभी न पता चलेगा कि कहां क्या कमी रह गई ...
| सुबह के वक्त में बांद्रा स्टेशन |
एक बात और क़ाबिले गौर यह है कि जैसे हम लोगों के दिन में कई तरह के मूड आते जाते हैं, वैसे ही गौरवशाली इमारतों, प्राचीन कलाकृतियों, बागों, रास्तों का हुस्न भी दिल में कई बार अलग अलग छटा बिखेरते हुए दिखता है ...इस को मैं इस पोस्ट के अंत में साबित भी करूंगा ...पढ़ते चलिए....😎...हां, सुबह के उस वक्त वहां अखबारें बेचने वाले हाकर्स का बोलबाला था....और यह काम उस वक्त वहां होता दिखता ही है ...
वहां से फॉस्ट लोकल लेकर मैं दादर के लिए निकला ...निकला क्या कहूं, अगर कहूं कि उड़ गया तो ज़्यादा बेहतर होगा...कुछ पांच छः मिनट में दादर आ गया....चूंकि मुझे नासिक जाना था इसलिए मैं पश्चिम रेल से मध्य रेल की तरफ़ चला गया...उस के उस प्लेटफार्म पर चला गया जहां पर बाहर गांव गाड़ियां भी आती है और कल्याण और उस के आगे के लिए फॉस्ट-लोकल भी ...मैंने प्लेटफार्म पर नीचे उतर कर एक बंदे से पूछा - पूछने की भी रिवायत है हम लोगों की, क्या करें, पुरानी आदतें....इतनी बढ़िया एनांउसमैंट हो रही है, और इंडीटेकर पर सब कुछ अच्छे से इंडीकेट किया जा रहा है....लेकिन पूछने की आदत ...हां, मैंने उस बंदे से पूछा कि कौन सी गाड़ी आ रही है....उसने अगला सवाल दाग दिया - आपने जाना कहां है..... मैंने कहा-नासिक......कहने लगा कि वह मनमाड़ एक्सप्रैस तो अभी एक मिनट पहले निकली है ....। मैंने कहा कोई बात नहीं, और भी आएंगी ...यह किस गाड़ी का नंबर लिखा हुआ है ....उसने बताया ...वंदेमातरम का नासिक रोड होते हुए शिर्डी साईबाबा धाम पर जाती है....मुझे यही लगा कि देखते हैं, आए तो पता करूंगा...खैर, वह तो अभी न आई, उस से पहले कल्याण की फॉस्ट लोकल आ गई ....स्टॉप भी कम थे ...उस पर बैठ कर मैं सात सवा सात बजे के आसपास कल्याण पहुंच गया, मुंबई की फॉस्ट-लोकल गाड़ीयां चलती नहीं है, उड़ती हैं जैसे.....वहां उतर कर पता चला कि ७.१७ पर लोकमान्य तिलक टर्मिनस से चल कर गोरखपुर जाने वाली गाड़ी आएगी....
| जिन की मेहनत और हौंसले पर इस महानगरी का विकास टिका हुआ है ... |
| सूरज मामू भी जागे ... |
खैर, अभी मैं कल्याण प्लेटफार्म पर हो रहे निर्माण कार्य का जायजा लेने की कोशिश कर ही रहा था कि वहां एक स्मार्ट सी ट्रेन आ कर रूकी ...वंदेमातरम जो शिर्डी साई बाबा धाम जाती है ...नासिक होते हुए....मैंने सोचा कि देखता हूं, इस के दरवाज़े खुलते हैं तो टीटीई से पूछता हूं ...लेकिन यह क्या, दरवाज़ा कोई भी न खुला....मुझे लगा कि शायद जिसने अंदर जाना होगा, उसे बाहर से ही खोल कर अंदर जाना होगा...मैंने ऐसे ही एक हैंडल या बटन को हाथ लगाया, उस से क्या होना था, बस दिल की तसल्ली ही देनी थी ....गाड़ी तुरंत चल पड़ी...जैसे ही गाड़ी चली मेरे दूसरे साथियों का फोन आया किसी काम के बारे में...बात चीत हुई तो पता चला कि वे भी वंदेमातरम से नासिक ही जा रहे हैं...मैंने कहा कि वह तो मेरे सामने ही अभी निकली है, लेकिन उस के दरवाज़े ही नहीं खुले। तब उसने कहा कि दरवाज़े नहीं खुले, क्योंकि कल्याण में इस का हॉल्ट नहीं है...मुंबई के उपनगरीय स्टेशनों पर बहुत बढ़िया विकास कार्य हो रहे हैं....जगह जगह एस्केलेटर्ज़, लिफ्टें लग रही हैं...इंडीकेट्रस अच्छे लग रहे हैं....इन सुविधाओ की वजह से लोगों की ज़िंदगी आसान हो जाती है...
खैर, दो पांच मिनट के बाद गाड़ी आ गई....वही गोरखपुर जाने वाली गाड़ी...चढ़ तो मैं गया लेेकिन ठसाठस भरी पड़ी थी ...पब्लिक से ज़्यादा भारी भरकम सामान से ...जहां मैं कुछ वक्त बैठा वहां पर साइड की नीचे ऊपर की सीटें एक दंपति की थीं., सैकेंड ए.सी का कोच था...उन के चार रिश्तेदार उन का सामान लेकर जैसे तैसे जल्दी जल्दी सामान पटक तो गए..उस बंदे ने सीट के नीचे पूरी जगह में वह सामान बिछा दिया...और ऊपर वाली सीट पर भी भारी भरकम सामान ही टिका दिया....मुझे तो यही लग रहा था कि ऊपर वाली बर्थ कहीं नाराज़ हो कर नीचे ही न लुढक जाए ...लेकिन रेलवे की सीटों की ताकत तो आप जानते ही हैं....
उस दंपति का सामान देख कर मुझे यही लगता रहा कि यह भारतीय रेल में ही संभव है कि टिकट के साथ कोई इतना सामान ले कर चल सकता है ...ख्याल आया कि कुरिअर करवाने जाते हैं तो अब अच्छी कंपनियां चार-पांच सौ रूपये की फीस मांगती हैं, सरकारी स्पीड पोस्ट का रेट भी बिलकुल वज़न पर आधारित है ...लेकिन रेलवे में लोग सवारी गाड़ियों में जितना सामान लेकर चलते हैं अगर हवाई जहाज़ से लेकर जाना चाहें तो दिवाला निकल जाए....वहां तो हम जाने से पहले कैसे सुनिश्चित करते हैं कि अटैची १५ किलो से ज़्यादा तो नहीं लग रही ......लेेकिन भारतीय रेल कि दिल बड़ा खुला है....यह मैं नहीं कहता, आप हम रोज़ देखते हैं...चलिए, मै उन का तामझाम देख कर और पानी का १० लिटर की कैन देख कर समझ तो गया कि ये तो लंबे सफर के राही हैं....लेकिन वह हेल्दी सा बंदा नीचे सीट पर पसरा रहा, उन का प्यारा बाबू अपने बापू के पेट पर मस्ती करता रहा ..बंदा लईया, चना, चूरा खाता रहा ....बेटा तो सो गया लेकिन वह औरत की हालत खराब हो रही थी ..कहां बैठे वो......मुझे यही लगता रहा कि ३६ घंटे ऐसे बैठे बैठे इस का क्या हाल होगा, क्योंकि वह "हेल्दी" बंदा तो जिस तरह से उस साइड वाली नीचे की बर्थ पर पसर चुका था, मुझे उठता हुआ नहीं रहा था ....उसे तो चूरा खाने से और बीच बीच में पानी पीने से मतलब था...
| नासिक रोड स्टेशन पर यह बोर्ड लगा देख कर अच्छा लगा... |
चलिए, मैं तो थोड़े समय के लिए ऊपर वाली बर्थ पर सो गया था...भारतीय रेल की मेल-एक्सप्रेस गाड़ीयां कब उड़ती हुई आप को आपके ठिकाने तक पहुंचा देती हैं, पता ही नहीं चलता...नासिक रोड पहुंच तो गया ..सोचा चाय पी लूं....लेकिन मेरे लिए चाय पीना इतना आसान कहां है। मैंने स्टेशन के बाहर आकर कोई चाय की गुमटी को ढूंढना चाहा ..लेकिन कहीं न दिखी, शायद मुझे ही न दिखी हो ...खैर, चाय कहां से पीनी है इस के बारे में अपने फंड़े बहुत पक्के हैं...जिस चाय की दुकान या ठेले पर सारा शहर उमड़ा हुआ होता है ...रिक्शेवाले से लेकर, सुबह टहलने निकले हुए दोस्त लोग....और जिस चाय वाले को फुर्सत नहीं यहां वहां देखने की ....ऐसी दुकानों की भट्ठी पर रखी पीतल के बडे़ पतीले में पक रही चाय की खुशबू ही आप को बुला लेती हैं, आप को वहां जाना ही पड़ता है, हर शहर में ऐसे खोमचे और गुमटीयां होती ही हैं......देखिए, मुझे ऐसी कुछ जगह अमृतसर की याद आ रही है तो साथ में वेसन के लड्डू याद आ रहे हैं, जिन का दौर चाय के साथ चलता था हमारे ज़माने में, लखनऊ की यादों में हज़रतगंज के पास ही शर्मा टी स्टाल की चाय जो बडे़ बडे़ स्टार और नेता लोग वहां पीने आते थे ....वह यादों में है, साथ में बन-मस्का (जो मैंने ज़िंदगी में कहीं नहीं खाया) और साथ में समोसे (समोसे मुझे लखनऊ के कभी पसंद नहीं आए...एक दम मोटे-मोटे छिलके वाले (जब तक लखनऊ में रहा और समोसे खाने की गल्ती की, उस कच्चे मैदे की वजह से अपने सिर को ही दुःखाया..)....खैर, चाय शर्मा टी स्टॉल के तो कहने ही क्या ...
चाय की कोई अच्छी सी दुकान की टोह लेते लेते मुझे यह केले की रेहड़ी देिख गई....मैंने दो केले खाए .....जब छिलके फैंकने के लिए कचरे वाली टोकड़ी के बारे में पूछा तो उस महिला ने ऐसे ही इशारा किया कि यहीं कहीं पास ही में रख दीजिए....अजीब लगा इसलिए क्योंकि अब हमें भी बीच बाज़ार में, सड़कों पर केले खाते खाते उस के छिलके को कचरेदान में फैंकने की आदत पड़ गई है...इस में सब से ज़्यादा भूमिका मां की रही जिसने बचपन से समझाया बार बार कि केले का छिलका इधर उधर गिराने से किसी दूसरे की टांग टूट सकती है....उन्होंने ऐसा कहीं होते देखा था...वह बात ऐसी दिलोदिमाग पर हमारे भी घर कर गई कि आज भी सड़क, फुटपाथ पर कहीं केले का छिलका पड़ा मिलता है तो पहले उसे ठिकाने लगाते हैं, फिर ही आगे चलते हैं....खैर, नासिक में उस केले की रेहड़ी से यह पता चला कि या तो यहां पर ऐसे बीच बाज़ार खड़े होकर केले खाने का रिवाज़ है नहीं या फिर केले के छिलके के निशाने इधर उधर मारने का चलन है, अब क्या पता सच्चाई क्या है....और दूसरी बात, उस रेहड़ी पर यह देखी कि उस महिला का साइड-बिजनेस भी था, मोबाइल आयल बेचने का .....मैं अभी केले खा ही रहा था कि एक रिक्शा वाला आया, और उस महिला ने खुद उस की टैंकी में मोबाइल ऑयल डाला........शाम के वक्त जब लौट रहे थे तो हमारे एक साथी ने बताया कि यहां केरोसीन से आटोरिक्शा चलते हैं, इसलिए उन में यह मोबाइल ऑयल डालना पड़ता है। मुझे यह नहीं पता कि क्या केरोसीन से भी आटो चल जाते हैं, वैसे वाट्सएप ज्ञानी तो पानी पर भी चलाने की बातें कहते रहते हैं....
और हां, केले खाते खाते मेरी नज़र पड़ गई सामने ही एक स्टेशनरी की दुकान पर ...मैं जहां भी जाऊं किसी भी शहर में ....पिछले लगभग २५ बरसों से अगर वहां से पुराने दौर के फाउंटेन पैन मिलते हैं तो मैं उन को ज़रूर खरीद लेता हूं ..मैं फाउंटेन पेन कलेक्टर हूं ..कल उस दुकानदार के पास यही तीन तरह के थे, खरीद लिए ....दो चल रहे हैं, एक नहीं....अब शौक के सामने गारंटी की भी तमन्ना करना आज के दौर में बेवकूफी सी लगती है ...
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| निदा फ़ाज़ली साब के अल्फ़ाज़ का जादू देखिए .... |
मैं पेड़ की फोटो खींच कर वाापिस रिक्शा में बैठा ही था कि ड्राईवर ने बताया कि आपने अगर पुराने पेड़ देखने हैं तो तपोवन जाइए, यह भी नासिक ही में है, वहां पर जो पुराना पेड़ है, उसे भगवाना श्री राम के द्वारा रोपा गया था, उसने बताया, मुझे याद आया जैसे मैं पहले वहां पर जा चुका हूं । आगे एक पुल से गुज़र रहे थे, मौसम भी अच्छा था ....गोदावरी नदी का बोर्ड देखा। आटो वाले ने बताया कि यहां बारिश के मौसम में नदी पूरी ऊपर तक भर जाती है, उसने बताया कि यहां पर बरसात मुंबई से भी ज़्यादा होती है....अभी हमारी बातचीत चल ही रही थी कि वह विवाह-स्थल आ गया जहां जाना था....
| लीजिए, घर बैठे आप को गोदावरी मैया के भी दर्शन करवा दिए ..🙏 |
| बांद्रा स्टेशन (पश्चिम) |
शीर्षक तो था, रेल का सफर ...लेकिन इसमें उस के अलावा भी बातें आ गईं ...कोई नई बात नहीं मेरे लिए ...स्कूल में उत्तर-पुस्तिकाओं के पन्ने भी हम इसी तरह लिख लिख कर काले करते रहते थे...मास्साब को खीझ कर पास करना ही पड़ता था ...वैसे भी किस्से कहानियां पढ़ने में लुत्फ तो आया ही होगा उन्हें भी ....😎😁....उन सब स्कूल के मास्टरों की याद को सादर नमन....

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