Tuesday, 2 May 2023

टाइम्स ऑफ इंडिया मुंबई एडीशन है लाजवाब ....

आज सुबह बांद्रे वर्ली सी-लिंक पर अचानक गाड़ीयां चलती चलती थोड़ी धीमी हो गईं ...होता है अकसर यह ...सुबह सी-लिंक पर भी खूब ट्रैफिक होता है ..तभी मेरी नज़र पड़ी साथ वाली गाड़ी में एक काका पर जो बड़े मज़े से इक्नॉमिक्स टाइम्स पढ़ रहे थे ...अच्छा काका तो मैंने ऐसे मज़े लेने के लिए लिख दिया है ...सारा दिन लोग मुझे काका-काका कहते फिरते हैं ...और वह काका भी मेरी उम्र के ही रहे होंगे...कम से कम मेरे जैसे उन के सफेद बाल तो यही बता रहे थे ...



खैर, मैंने झट से मोबाइल निकाल कर उस लम्हे को अपने मोबाइल में कैद कर लिया ...क्योंकि मुझे खुद याद नहीं पिछली बार कब कितने बरसों पहले मैंंने किसी को ऐसे कार में जाते वक्त अखबार पढ़ते देखा होगा ...अखबार तो मुझे भी पढ़ना अच्छा लगता है, लेकिन मैं कार में नहीं पढ़ सकता, वैसे ही मेरा दिल कच्चा होने लगता है अगर मैं खिड़की खोल के न रखूं तो ...जैसे मैंने उस काका की फोटो खींच ली ....कोई न कोई इस लेखक काका की भी फोटो खींच ही लेता होगा जो हमेशा कार की खिड़की खोल कर ही सफ़र करता है ..वरना दिल कच्चा होने लगता है ...


हां, काका पढ़ रहे थे इक्नॉमिकस टाइम्स ... जो लोग मुंबई की टाइम्स आफ इंडिया के बारे में न जानते होंगे उन के लिए बता दें कि यहां टाइम्स आफ इंडिया जो इन दिनों सात रूपये में मिलता है ...उस के साथ बॉम्बे टाइम्स और इक्नामिक्स टाइम्स साथ में ही होता है ....लेकिन अगर कोई इक्नामिक्स टाइम्स नहीं लेकर, महाराष्ट्र टाइम्स लेना चाहे तो ले सकता है जो मराठी का एक बहुत सम्मानीय पेपर है। 

आज कल मोबाइल की वजह से अधिकांश लोग अखबारों से दूर हो चुके हैं...खास कर के युवा वर्ग तो बिल्कुल दूर ही है ..युवा क्या, जो लोग अभी ४०-५० की आयु के हैं, वे भी अखबार पढ़ने से दूर ही हैं..लेकिन जो मेरे उम्र के जो काका लोग हैं, उन में से बहुत हैं जिन का अखबार के बिना काम नहीं चलता...जब तक अखबार हाथ में न आ जाए, ऐसे लगता है जैसे कुछ कमी कमी सी है ....आदत हो जाती है....अब हम जैसे लोगों की उम्र ६० पार की है और जब से हमने होश संभाला, हमने घर में इंगलिश और हिंदी का अखबार आते देखा ...पंजाब में ट्रिब्यून आता था और मां को वीर-प्रताप हिंदी का अखबार पढ़ना ही अच्छा लगता था ...घर के सभी लोग अखबार पढ़ते थे ...कोई इंगलिश के नए शब्द लिखता, किसी को कोई कतरन चाहिए होती, कभी पड़ोसी किसी नौकरी के इश्तिहार के लिए उसे लेने आ जाता, मां स्वैटर के नमूने देख देख कर बनाया करतीं, घरेलू टिप्स भी बडे़ चाव से पढ़ती....

ऐसे ही पेपर तो पढ़ते ही रहे ...हमेशा ...और नौकरी में भी आ गए इस पेपर की वजह से....१९९१ में एक नाई की दुकान पर मेरा एक दोस्त हजामत करवा रहा था ...मैंने बैठे हिंदी की अखबार उठा ली, उसमें यूपीएससी का विज्ञापन देख कर, अर्जी भेज दी....कुछ महीने बाद चयन भी हो गया....ऐसे हम सब के पास बहुत से किस्से-कहानियां हैं सुनाने के लिए...


पिछले ३२ बरस से टाइम्स ऑफ इंडिया ही पढ़ रहा हूं ...इस के साथ दूसरे अखबार भी देखता था ...संयोग से जब चार पांच बरस के लिए पंजाब में नौकरी कर रहा था तो वहां भी टाइम्स आफ इंडिया आना शुरू हो गया....लेकिन वहां इसे पढऩे का वह मज़ा न था, जो बंबई में था ...हरियाणा में भी जब तक रहे, और लखनऊ में भी ...टाइम्स आफ इंडिया बंबई जैसा न था। हां, लखनऊ बड़ा पढ़े-लिखों का शहर है, वहां पर फिर भी ठीक ही लगता था। बहुत से अखबार देखने-पढ़ने के बाद मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि बंबई से छपने वाला टाइम्स ऑफ इंडिया लाजवाब था .....कालेज की पढ़ाई होने के बाद जितना कुछ भी सीखा उसमें टाइम्स ऑफ इंडिया की अहम् भूमिका है ...मेरे लिए यह लिखना भी मुश्किल हो रहा है कि इस से हमें क्या क्या मिलता है.....मैं अगर यह कहूं कि कुछ भी ऐसा नहीं है जो हमें इस से न मिलता हो.....सूचना मिलती है, मनोरंजन होता है, दिलो-दिमाग़ खुलता है ....और क्या चाहिए...

दस साल पुरानी एक फोटो.....अजमेर में चाय पर होती चर्चा दिखी थी कुछ इस तरह से ...


हां, अपनी अपनी रूचि है, अब इस के साथ जो इकॉनोमिक्स टाइम्स आता है, जो सुबह वाले काका पढ़ रहे थे ....वह हमारे यहां भी आता है टाइम्स के साथ ...लेकिन मैंने कभी उसे खोला तक नहीं, जिस विषय की एबीसी नहीं आती, उस के पन्ने उलट कर भी वह कहावत ही चरितार्थ होगी ..काला अक्षर भैंस बराबर .....मैेंन आज तक एक शेयर नहीं खरीदा, मेरे लिए इकॉनोमिक्स टाइम्स का क्या मतलब....वैसे भी हम लोगों की पढ़ाई ऐसी रही है कि इन विषयों का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है, सिवाए इस के कि डाकखाने में एनएससी, केवीपी और पीपीएफ बचत योजनाएं हैं....और हां सावधि बचत योजना भी ...(रेकरिंग डिपॉज़िट)...😎 ...

मुंबई को लोकल गाड़ी में जब बैठने की जगह मिल जाए तो अखबार मैं आराम से पढ़ने लगता हूं ...कईं कईं बार कुछ लोग और भी दिख जाते हैं अखबार पढ़ते ...लेकिन १९९० के दशक में जो अखबार का क्रेज़ था न कि लगभग हरेक के हाथ में अखबार ....उस पर अब मोबाइल का कब्जा है ...अपनी अपनी पसंद है, हमें तो अभी भी अखबार पढ़ कर ही मज़ा आता है...यह मेरे लिए और भी ज़रूरी है क्योंकि हमारे यहां टीवी बंद पड़ा है, कईं बरसों से ...कोई पसंद नहीं करता .....किसी ज़माने में सुनते थे लेकिन जब से उछल उछल कर खबरें पेश की जाने लगीं और हमारा सिर दुःखने लगा, हमने सोचा ....छोड़ो यार, बंद करो..। घर में मुझे ही नहीं, किसी को भी पसंद नहीं, शायद आठ दस साल तो हो ही चुके होंगे ..हमारे टीवी को बंद होए हुए ...। 

आज कल किसी को अखबार पढ़ने के बारे में अगर गल्ती से पूछ लें ....(वैसे तो पूछने का सवाल ही पैदा नहीं होता), तो वह इंसान बड़ी हैरानी से आप की तरफ़ देखेगा और कहेगा....सब नेट पर ही हो जाता है। लेकिन हमारी पीढ़ी शायद इस से इत्तेफाक नहीं रखती, मेरी मां ८५ बरस की उम्र के आगे तक भी जब अंग्रेज़ी का अखबार पढ़ती तो बेड की साइड टेबल पर एक डिक्शनरी रखी होती ...मुश्किल लफ़्ज का फौरन मानी देख लेतीं ...जो आदत हमें नहीं पड़ी, हम अनुमान लगा लगा कर ही काम चला लेते हैं...

टाइम्स आफ इंडिया के एक अलग ही नाता है ....मुझे तो टाइम्स ऑफ इंडिया की बि्लडींग के आगे से गुज़रते वक्त भी बडा़ अच्छा लगता है ...मेरे पास एक किताब है इंडिया डाउन दा पेजेज़ (India- Down the Pages) ....यह टाइम्स ऑफ इंडिया का प्रकाशन है ....बीस साल पुराना...२००२ में छपा था (उस वक्त की कीमत थी...१२०० रूपए) ..उसमें टाइम्स ऑफ इंडिया का १५० बरसों का इतिहास है ...जब भी उस के पन्ने उलटता हूं मज़ा आता है ...टाइम्स आफ इंडिया के प्रकाशन समूह की अन्य जो मैगज़ीन हैं उन के बारे में भी उस में भी बहुत कुछ दर्ज है ...जैसे इलेस्ट्रेटेड वीकली जिस के हम दीवाने रहे हैं...नवभारत टाइम्स के बारे में भी ....


नवभारत टाइम्स के बारे में इतना ही कहना है कि मुझे आज से तीस-चालीस बरस पहले जो दिल्ली से निकलती थी, वह बहुत पसंद थी ...लेकिन बंबई से निकलने वाली नवभारत टाइम्स पढ़ना पसंद नहीं है, उस में इंगलिश और हिंदी की एक तरह की खिचड़ी है, हिंग्लिश है..संपादक कहते हैं कि लोग यही चाहते हैं ....ठीक है, फिर जो लोग चाहते हैं उसे पढ़ें...मैं उसे जब भी पढ़ता हूं तो यही सोचता हूं कि हिंदी और इंगलिश पाठक के लिए जो सामग्री उपलब्ध है, उस में ज़मीन आसमां का फ़र्क़ है ....मैंने बहुत बार उसे पढ़ने की कोशिश की क्योंकि मैं हिंदी में लेखन करता हूं और मुझे हिंदी का अखबार भी पढ़ना चाहिए, लेकिन मेरे से नहीं पढ़ा जाता ....वैसे भी मैं सात-आठ बरस लखनऊ में रह कर आया हूं, वहां के हिंदी के कुछ अखबार पढ़ कर अच्छा लगता था ...और रोजा़ना हिंदी का अखबार भी पढ़ता था ..

15 बरस पहले ..काका बनने और दिखने से पहले का दौर...लेखक टाइम्स ऑफ इंडिया बांचते हुए ...😎

चलिए, यही बात को खत्म करें..कुछ कहने को ज़्यादा है नहीं इस टापिक पर ..लेकिन सातवीं आठवीं कक्षा में समाचार पत्र के लाभ - इस शीर्षक के साथ लिखा जाने वाला निबंध याद अकसर आ जाता है ...और पिता जी को हिंदी न आती थी, लेकिन वे कहते थे कि कोई भी निबंध लिखते वक्त सब से पहले कुछ बड़ा सा वाक्य लिखो तो निबंध में चार चांद लग जाते हैं....अखबार वाले निबंध के ऊपर उन्होंने लिखवाया था....

खींचों न कमानों को न तलवार निकालो....

जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो....

1 comment:

  1. वाह, टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदी में। वाह सर।

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