Saturday, 27 May 2023

जैसी संगत, वैसी चढ़े रंगत

कल देर शाम मैं कांदिवली में एक ओला कैब में था... टैक्सी में बैठ कर वक्त कैसे बीते, सब से बढ़िया तरीका है ड्राईवर से गुफ्तगू शुरु कर दी जाए...जो मैं अकसर करता हू्...सब से बड़ी बात होती है ब्रेकिंग-दा-आईस ....याने बात शुरु कैसे की जाए...वह काम कोई मुश्किल नहीं है...बुज़ुर्ग ड्राईवर अगर फुर्ती से अपनी पुरानी गाड़ी भायखला के एस-ब्रिज से भी बड़ी सहजता से निकाल ले आता है तो उस से पूछ लेते हैं कि कितने समय से हैं...कितने समय से टैक्सी चला रहे हैं....बस, एक बार बात शुरू हुई तो फिर सिलसिला चल निकलता है, दूसरे की सुनने के साथ साथ अपने बारे में भी दो बातें कहनी होती हैं, और वह काम कोई मुश्किल नहीं है...कईं बार, जब कोई टपोरी बड़ी बेफ़िक्री से भाग कर सड़क क्रॉस करता है तो फिर बंबई के बिगड़ते ट्रैफिक से बात शुरू हो जाती है ....सौ बातों की एक बात, अगर आपने बात करनी है किसी अंजान से तो बहुत कारण हैं, और अगर बेकार में बिना वजह मुंह फुलाए बैठे रहना है तो वह भी हमारी च्वॉइस है ...

ब्रेकिंग-दा-आईस ..

हां, तो कल जो ड्राईवर था कैब का ...वह एस भीड़ भाड़ वाले एरिया से जैसे ही निकला तो अपने आप कुछ कहने लगा कि इस एरिया में रहने से आदमी तरक्की नहीं कर सकता। आदमी इसी दायरे का हो कर रह जाता है। मैंने उस की हां में हां मिला दी ...क्योंकि मैं तो वैसे ही किसी से भी बातचीत के लिए उतावला रहता हूं...यही चलती फिरती पाठशाला है ....

फिर वह कहने लगा कि मैं भी कुछ साल पहले तक इतना गुटखा खाता था कि क्या बताऊं....बाद में मेरे पूछने पर उसने बताया कि एक सौ रूपये से भी ऊपर का गुटखा हो जाता था। बताने लगा कि सब छोड़ दिया। 

यह कैसे मुमकिन हुआ? - मैंने सवाल दाग दिया...

ग्राहकों से ही मिली सीख ...

बस, तीन कस्टमर मिले अलग अलग वक्त पर उन दिनों जिन्होंने मुझे खिड़की से बाहर गुटखा थूकते हुए टोका, उसने बताया ...और फिर एक बार तो एक बुज़ुर्गवार इंसान के साथ एक महिला थी, उसने तो मुझे खूब झांपा और कहा कि तुम ऐसे कैसे अपना आस पास इतना गंदा कर सकते हो...तुम्हें ऐसा देख कर हमें उल्टी जैसा होता है, चलो, हमें अपने घर ले कर चलो, मैं वहां थूकूं तो तुम्हें कैसा लगेगा - उसने आगे बताया। 
उन दिनों की ही बात है कि उस यादव नाम के ड्राईवर को उसके एक दोस्त ने बताया कि अगर तुम्हें गुटखा छोड़ने में दिक्कत हो रही है तो एक बार मेरे साथ टाटा अस्पताल के कैंसर वार्ड में चलो और देखो कि मुंह के कैंसर से ग्रस्त लोग किस हालात में जीने पर मजबूर होते हैं...

यादव ने बताया - बस, ऐसे ही इतना सब होने पर, तीन सवारियों के टोके जाने पर मुझे गुटखे से नफरत होने लगी ...और मैंने धीरे धीरे उस का इस्तेमाल कम करना शुरू कर दिया। क्योंकि जब मैं गुटखा चबाता था तब मैं चिढ़चिढ़ा सा रहता था, जल्दी में रहता था...कईं बार सिग्नल भी जंप कर जाता था, यही थूकने के चक्कर में ....और फिर धीरे धीरे मैंने इसे चबाना बिल्कुल बंद कर दिया। हमारा नाता यू.पी से है और वहां पर तो इन सब चीज़ों का इस्तेमाल कितना होता है, वह आप जानते ही हैं, पिता जी डायमंड बिजनेस में थे ...और वह निरंतर गुटखा खाते थे...और मैं पांचवी कक्षा से उन का गुटखा चुरा चुरा कर चबाना शुरू कर दिया...एक बार तो पिता जी ने पकड़ भी लिया....

पिता जी ने पकड़ कर अच्छे से ठुकाई की या झिड़क दिया, यह वह बता नहीं पाया,  कैब के सामने कोई वाहन आ गया था। और मैंने भी पुराने ज़ख्‍म कुरेदने की ज़रुरत नहीं समझी....वैसे मैं उस की इस बात से इत्तफाक नहीं रखता कि यह गुटखा अब यूपी की ही समस्या है, यह जानलेवा शौक अब देश के कोने कोने में फैल चुका है ...

और गुटखे की लत से मिल गई निजात ...

उसने बताया कि पिछले साढ़े तीन साल से उसने गुटखा नहीं चबाया ...यह सुन कर मुझे बहुत खुशी हुई...कहने लगा कि सारा दिन थूकने से उस के शरीर से कैल्शीयम कम हो रहा था...खैर, यह उस की सोच थी...गुटखे के नुकसान ही नुकसान...

बहुत बढ़िया, भई ...बहुत अच्छा किया...मैंने कहा और पूछा---वैसे गुटखा छोड़ने के फायदा क्या हुआ?

फायदे ही फायदे हुए...अब मैं ग्राहक से अच्छे से बात कर सकता हूं। वैसे भी कैब में बड़ी बड़ी कंपनियों में काम करने वाले सफर करते हैं तो उन की बातें सुन सुन कर मैंने भी अच्छे से बात करना सीख लिया है। पहले मुझे मुंह खोलने में दिक्कत होती थी, और मेरे मुंह में दो उंगली ही जा पाती थी,अब देखिए तीन उंगली के बराबर मैं मुंह खोल सकता हूं....और मुंह के अंदर जो मुझे मिर्ची-तीखा खाते वक्त लगता था, वह अब नहीं लगता...

वह ३०-३२ वर्षीय युवक बिल्कुल सही कह रहा था... यह मुंह का खुलना कम होना गुटखा खाने वाले में एक महत्वपूर्ण लक्षण है ....और इसे छोड़ने पर बहुत से  मरीज़ों में मुंह के अंदर की लचक वापिस आने लगती है और मुंह पहले से बेहतर खुलने लगता है...

गुटखे की जगह ले ली तंबाकू ने ..

अब, आंवला खाया करो, साग-सब्जी लिया करो और सलाद भी खाया करो, उस से और भी बढ़िया लगेगा...आंवला खाने पर मैंने बहुत ज़ोर दिया तो उसके मुंह से अचानक निकल गया - पूरा ख्याल रखता हूं अपना , बस कभी कभी तंबाकू रख लेता हूं ...वह भी ज़्यादा वक्त के लिए ...थोड़े समय के बाद ही उसे थूक देता हूं..

अब मुझे उसे अपनी पहचान बतानी पड़ी ताकि वह मेरी कही बात मान ले। मैंने उसे समझाया कि ज़हर तो ज़हर है ....चाहे तुम उसे तंबाकू के रूप में इस्तेमाल करो या गुटखे के रूप में चबा लो। चाहे जल्दी थूको या देर से ...तंबाकू के लफड़े से नहीं बच पाओगेे...गुटखा छोड़ दिया तो क्या, अब तंबाकू को पकड़ लिया ....बचो, इस से भी, छोड़ो इसे भी ....मैं रोज़ाना इस से ग्रस्त अनेकों मरीज़ देखता हूं इसलिए कह रहा हूं....

बात उस की समझ में आ गई ...कहने लगा कि छोड़ दूंगा धीरे धीरे ...मैंने कहा - एक ही झटके में छोड़ दो.....

कहने लगा कि यह न हो पाएगा उससे क्योंकि गुटखा भी उसने धीरे धीरे कर के छो़ड़ा था। मैंने सोचा कि इतना भी किसी के क्या पीछे पड़ा जाए, बंदे में विल-पॉवर है तो ..तभी तो गुटखे जैसी नामुराद चीज़ से निजात पा ली उसने, मुझे यकीं था कि तंबाकू भी वह छोड़ देगा...

फॉलो-अप भी कर लेंगे !!

फिर भी लगा कि इस का फॉलो-अप ज़रूरी है ...उसे कहा ...मेरा फोन नंबर और नाम तुम्हारे पास आ गया है, ंतंबाकू छोड़ने पर मुझे वाट्सएप करना....वह कहने लगा ज़रूर करूंगा....मैंने कहा कोई दिक्कत आए तो बताना, मुझ से पूछ भी लेना...कभी भी ....देखूंगा ...कुछ दिन तक नहीं बताएगा, तो खुद मैसेज कर लूंगा .....फोन मैंने भी सेव कर लिया है उस का ....रास्ते में इतनी बातें हुईं...यह तो फिर टाइम-पास हो गया अगर उसने मेरी बात मान कर तंबाकू न छोड़ा ....तंबाकू तो उस का छुड़ा कर ही दम लेंगे हम भी...देखते  हैं...बताएंगे आप को भी .... अपना काम है लोगों को इस भयंकर तंबाकू के किसी भी रूप के बारे में जागरूक करना और तब तक उन की पीछा न छोड़ना जब तक वे इस लत को लात न मार दें....क्योंकि यादव हो, शर्मा हो, कपूर हो, शेट्टी हो या शिंदे,...एक एक बंदे के साथ पूरा कुनबा जुड़ा होता है ...वे सब खुश रहें, स्वस्थ रहें ....यही शुभ इच्छा है ...

मैंने उससे ऐसे ही सरसरी पूछा- तुम ग्रेजुएट हो? ......नहीं, सर, मैट्रिक हूं और बंबई में ही पढ़ाई की है, और जो लोग कैब में बैठते हैं उसने बहुत कुछ सीखा है....👍 जैसे कि बात चीत करने का तरीका, सलीका...बहुत कुछ। 

सही कह रहा था वह ....सयाने भी तो यही कहते हैं ...जैसी संगत, वैसी चढ़े रंगत... 

बस, इतने में कांदिवली स्टेशन आ गया...हम टैक्सी से उतर गए....एक बार उस को फिर मुफ्त की सलाह बांट कर ....😎तंबाकू भी छोड़ दो और मैसेज करो.... 😄..और हां, आगे से जब तीन ग्राहकों की बात किसी को सुनाओ तो मुझे चौथे नंबर वाले की भी सुना दिया करना....😃

कांदिवली ...यादों के झरोंखे से

स्टेशन के बाहर एक बहुत बड़ी लाइन लगी हुई थी रिक्शा के लिए ....कम से कम ५० लोग होंगे उस लाइन में ....लोकल गाड़ी पकड़ने से पहले स्टेशन के बाहर एक बहुत मशहूर वडे़-पाव की दुकान दिखी ....मशहूर का पता हमें देखते ही चल जाता है जिस तरह से लोग वहां जमघट लगा कर खड़े थे, उससे सब पता चल जाता है..हमने भी वड़ा-पाव खाया, और साथ की दुकान से दो गिलास गन्ने का रस पिया और किसी के पूछ कर प्लेटफार्म पर आ गए....शायद मैं २७-२८ साल बाद कांदिवली स्टेशन आया था ..१९९५ के अगस्त महीने में यहां दो तीन हफ्तों के लिए आता था ...एस एस वॉय का कोर्स किया था ...वह भी ज़िंदगी में एक टर्निंग-प्वाईंट से कम न था ...शाम के वक्त तीन घंटे की क्लास लगती थी ...और बंबई सेंट्रल से एक घंटा आने का और एक घंटा कांदिवली से वापिस लौटते वक्त...लेकिन जवानी के दिनों के क्या कहने .....हम लोग हंसते खेलते यह सब नया कुछ भी सीखने के लिए करते ऱहते थे ...

इस पोस्ट का कोई खास मकसद नहीं था, बात सिर्फ इतनी सी है कि आपस में हम सब बात करते रहना चाहिए, कोई बंदा भी परफेक्ट नहीं है, क्या पता किस की कौन सी बात किस की ज़िंदगी बदल दे, यह सच में होता है, हमने देखा है, और अभी आपने यह सच्चा किस्सा भी पढ़ लिया..बात करने से ही बात बनती है। ऐंठे ऐंठे , अलग थलग रहने से कुछ नहीं होता, सिरदर्द के सिवा.....हम ने वह भी अजमाया हुआ है। 

चलिए, कांदिवली जहां गए थे वहां की कुछ फोटू ही दिखा दें आप को ....

बहुत से श्रमिक प्लास्टिक के इन बेल-पत्तों से सजावट करते दिखे....मैंने कहा वह गाना सुना होगा....रूप ले आएंगे, रंग ले आएंगे....ये कागज़ के फूल...खुशबू कहां से लाएंगे...यह सुन कर हंसने लगे...

जहां गए थे वहां की पहली मंज़िल पर पोडियम का एक नज़ारा -खुशनुमा एकदम 



चिट्ठीयां तो लोग लिखते नहीं अब....लैटर-बॉक्स बराबर लगाए जा रहे हैं... 


मल्टीलेवल पार्किंग ...आज किसी ने बताया कि उन के यहां तो "पज़ल-पार्किंग" है....पूछने पर पता चला कि यह नाम इसलिए है कि आप अपनी गाड़ी खड़ी करिए, वह अपने आप उस जगह पर पहुंच जाएगी जहां तक उस वक्त पार्किंग स्लॉट खाली मिलेगा...

कांदिवली स्टेशन पर मखाने देख कर हमें भी खाने की इच्छा हुई..स्टॉल पर मिल रहे थे, खरीद लिए ...१६ ग्राम बीस रूपये के ..हवा से लैस हुए लिफाफे में ...😀😂😎

अब गाना कौन सा लगाऊं...उमस बड़ी है, कल बरसात का गीत लगाया था....और कल शाम को मैं ड्रम्स बजा रहा था, सीख रहा हूं बिल्कुल किंडरगार्डन के छात्र की तरह यू-ट्यूब से ....दो छोटे ड्रम्स खरीद लिए हैं...कल मैं बजा रहा था ..बहुत अच्छा लग रहा था, बेटे ने देखा फोटो खींचने लगा...विडियो बनाने लगा ....मैंने पूछा ..यार, कैसे लगा................उसने कहा ...वाह, बाप, वाह ....बस, इतना देख लेना, बाप, आप के बजाने से कहीं बरसात ही न शुरू हो जाए....😂😃😎😇

4 comments:

  1. बहुत सुंदर सर। बातों ही बातों में कैंसर का इलाज कर दिया। धन्यवाद सर।

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    1. शु्क्रिया...श्रीमान जी, पोस्ट देखने के लिए....अच्छा लगता है अगर किसी के कुछ काम आ पाएं।

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