Thursday, 4 May 2023

मुंबई के डिब्बे वालों को सलाम....




हम लोग आते जाते वक्त कार-टैक्सी में बैठे हुए मोबाइल में किस क़द्र खोए रहते हैं कि आस पास देखने की भी हमें फ़ुर्सत नहीं होती...इसलिए एक चौक पर जिधर से अकसर मैं गुज़रता हूं - भायखला का एस-ब्रिज ....भायखला (वेस्ट) स्टेशन से थोड़ा आगे चल कर ...चिंचपोकली की और जाने वाली सड़क पर ...यही दो तीन महीने हुए होंगे कि मैंने इस चौक पर एक बहुत बड़ा पीतल का खाने का डिब्बा स्थापित हुआ देखा तो मुझे देख कर मज़ा आ गया ..एक दम चमकता-दमकता हुआ पीतल का डिब्बा ...

पीतल की कुछ भी चमकती-दमकती चीज़ दिख जाए तो मुझे बड़ी खुशी होती है ..क्योंकि जब तक हम आठ-दस बरस की उम्र तक नहीं पहुंचे थे ...घर में हर तरफ़ पीतल ही पीतल छाया हुआ था...सब से पुरानी याद है ...पहले दिन स्कूल जाते वक्त मां ने पीतल की एक छोटी सी डिब्बी में एक परांठा डाल कर दिया और उस के बीचों बीच गुड़ की एक छोटी डली रख दी ...अभी घर से निकलने ही लगा था कि पिता जी आ गए दोपहर के खाने के लिए....वह मुझे घर के किवाड़ पर ही मिल गए और उन्होंने मुझे उन दिनों चलने वाला दस पैसे का पीतल का सिक्का दिया और मुझे दूर तक देखते रहे ...साथ में मेरा दोस्त देवकांत था ..हम लोग चल पड़े स्कूल की तरफ़...चलिए, उस सफ़र को अभी यहीं पर छोड़ते हैं, वरना ये डिब्बे वालों की बात बीच में रह जाएगी....


मैं उस चौक पर स्थापित पीतल के इस डिब्बे को आते जाते दो तीन बार देख कर समझ गया कि इसे मुंबई के डिब्बे वालों की सेवाओं के सम्मान में यहां पर स्थापित किया गया होगा...सोचा, फोटो खींच लूं, लेकिन भीड़ इतनी थी कि वह हो नहीं पाया, बड़ा भीड़ भाड़ वाला इलाका है। इस की फोटो खींचने का मौका मुझे दो दिन पहले मिला ...और आज सुबह जब टाइम्स आफ इंडिया पढ़ रहा था तो उस में इन से जुड़ी एक खबर भी दिख गई कि किंग्स चार्ल्ज की ताजपोशी जो ६ मई को लंदन में होनी है, उस के लिेए मुंबई डिब्बा वालों ने एक पगड़ी और एक शाल किंग्ज चार्ल्स को भिजवाई है और इस ताजपोशी से जुड़ा एक समारोह कुछ दिन पहले जब मुंबई के ताज होटल में आयोजित हुआ तो उसमें ये डिब्बे वाली भी विशेष निमंत्रण पर वहां गए थे...

जब प्रिंस चार्ल्स मुंबई में आए थे तो इन्होंने डिब्बे वालों को निमंत्रण भिजवाया था अपनी महफिल में आने के लिए ...तब से इन का और डिब्बे वालों का एक भावनात्मक नाता कायम हो गया है। इन के महान् काम के बारे में अकसर अखबारों में हम पढ़ते ही रहते हैं....पढ़ते तो रहते हैं ठीक है, लेकिन आज कल ये उस तादाद में नज़र नहीं आते जितना इन का काम २०-३० बरस पहले हुआ करता था, यह मेरा अनुमान ही है .....पहले तो मुंबई के लोकल स्टेशनों में इन के डिब्बों की वजह से और भी रौनक हुआ करती थी...

आज मुंबई में इस डिब्बेवाले के दीदार हो गए ....

आज मैंने एक बाज़ार में शाम को एक डिब्बे वाले को देखा ..लेकिन अब बहुत से डिब्बे वाले साईकिल पर चलते नज़र आते हैं....यह भी मेरा अनुमान ही है ...क्योंकि मैं इन की कार्य-प्रणाली के बारे में ऊपर ऊपर से ही जानता हूं ...हम लोग तो नौकरी के सिलसिले में जितना वक्त भी बंबई में रहे, घर भी बिल्कुल नज़दीक ही होते थे, खाना खाने चले जाते थे ....लेकिन इन डिब्बे वालों ने मुंबई के दफ्तरों में काम करने वाले, दुकानें चलाने वालों आदि की खूब सेवा की ....भले लोग...इन की वेशभूषा और टोपी एक दम से महाराष्ट्र की पारंपरिक पोशाक के अनुसार दिखती है....



आज सुबह मैं पैदल ही यह चौक क्रॉस कर रहा था तो मैं इस बोर्ड को पढ़ने लग गया और जिन का इस पर नाम है, उन के बारे में पूछने लगा ..बोर्ड के पास ही खड़े एक बुज़ुर्ग से ...उन्होंने बताया कि वह तो ऊपर चले गए हैं....लेेकिन डिब्बे वालों का वह नेता चिंचपोकली नाके के पास रहता था....मेरे मुंह से ऐसे ही निकल गया कि आज कल डिब्बे वाले कम दिखते हैं...तो वह कहने लगे कि अब कपड़े की मिलें कहां हैं, हैं क्या, जब थीं तो इन के पास बहुत अच्छा काम था, मिल वर्करों को भी यही डिब्बे वाले ही खाना सप्लाई करते थे ...अब मिले ही नहीं रहीं तो डिब्बे वालों का काम भी कुछ मंदा पड़ा हुआ है , और कुछ कोरोना की वजह से भी काम पर असर पड़ा है....हम दुआ करते हैं कि इन का काम बढ़िया चलता रहे, सब के काम धंधे चलते रहें ...क्योंकि ऐसे ही आम खास लोगों से इस मुंबई महानगरी की पहचान है, दूर दूर तक धूम है ...इन के अनुशासन एवं प्रबंधन के चर्चे हैं...नीचे एम्बेड की गई वीडियो को देखिए...


PS...पीतल की दो बातें तो लिख कर दर्ज कर दूं...मैंने ऊपर लिखा न कि हमारे ज़माने में पीतल का ही हर तरफ़ बोल बाला था ....इसलिए आज भी पीतल सोने से भी अच्छा लगता है हमें। कभी सोने की अंगूठी तक नहीं पहनीं, लेेकिन पीतल की शौक से पहन लूं...पता नहीं लोग पीतल के गहने क्यों नहीं पहनते, सोने से कम खूबसूरत थोडे़ न दिखते हैं....अच्छा, घर में सभी बर्तन पीतल के ही थे बचपन में...और नियमित उन की कलई करने के लिए हर गली-मौहल्ले में कलई करने वाला आता था ...वह हम के लिए बड़ा स्पैशल बंदा होता था....जब वह कहीं दिख जाता, हम उस के पास ही बैठ जाते, उस की भट्ठी जलने से लेकर, कलई होने तक और उस के बाद भट्ठी के बुझ जाने तक जब तक वह अपना सारा सामान साईकिल पर लाद न लेता ..उस दौर के बच्चों के सभी अन्य काम स्वतः स्थगित हो जाते...उस की भट्ठी चलने की आवाज़, आर उस का कलई करने के बाद पानी में बर्तन को डुबोना...फिर शूं.....शूं की आवाज़ का आना.....सब कुछ बहुत अच्छा लगता था हमें ...और उस की चुस्ती फुर्ती भी ...वह भी खुश दिखाई देता इतने बच्चे उसे घेरे रहते ....वाट्सएप पर एक लतीफा पिछले दिनों बड़ा चल रहा था न कि अकेलेपन से तो शेर भी परेशान हो जाता है ... 😎....फिर १९७० का दशक आया, लोग झोले भर भर के पीतल के बर्तन बाज़ार लेकर जाने लगे और स्टील के बर्तन लेकर आने लगे ...खुशी खुशी ....पहले तो थोड़ा विरोध भी होता था क्योंकि अफवाह थी कि स्टील इस्तेमाल करने से कैंसर हो जाता है ....लेकिन जो सुविधा स्टील की वजह से हुई ...न तो राख से घिस घिस के चमकाने की मशक्कत और न ही बार बार कलई करवाने का खर्च ...फिर तो हर तऱफ. पीतल ही दिखने लगा ...सच में माहौल पीतलमय हो गया....यहां तक कि त्योहारों के वक्त दरवाज़ों के पीतल के हैंडिल आदि की पीतांबरी से सेवा होने लगी...उन को चमकाने के लिए....😎

जब भी कभी किसी एंटीक शाप में जाता हूं तो पीतल की डिब्बीयां, पीतल के फ्रेम, पीतल के शो-पीस इत्यादि देख कर दंग रह जाता हूं ...अगर किसी चीज़ से नज़र हटने का नाम नहीं ेलेती, तो खरीद भी लेता हूं ....पीतल के बर्तनों पर कलई होते देखना चाहेंगे तो इस पंजाबी गीत को सुनिए....समझ न भी आए तो भी देखिए, आप को भी बहुत कुछ याद आ जाएगा...

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