Sunday, 30 April 2023

दादर स्टेशन- जहां पब्लिक का समंदर उमड़ता है रोज़

यह पोस्टर मैंने दो बरस पहले बनाया था ...नई नई कैलीग्राफी सीखी थी तब मैंने 

बंबई नगरिया के बारे में अपनी नोटबुक में कुछ लिखना शुरु करें और उसमें लोकल गाडियों और लोकल स्टेशनों से जुड़ी ढ़ेरों बातें न हो तो यह कापी नीरस लगेगी बेशक....इसे एहसान-फ़रामोशी की हद भी कहा जा सकता है क्योंकि जिन स्टेशनों और ट्रेनों की वजह से इस महानगरी की सारी रौनक है ....सारा सिलसिला यहां का जिन के भरोसे चल रहा है, ऐसे कैसे इन को बिसार दें...

जो भी बंबई में रहते हैं, उन के पास यहां की ट्रेनों और लोकल स्टेशनों से जुड़ी ढेरों बातें-यादें होंगी ...लेकिन कौन किस का कहे, किसे सुनाए वे सब बेशकीमती बातें ...ऐसे ही अंदर ही दबाए रखने से क्या होगा...अपने आस पास के चार लोगों से अगर साझा कर भी लेते हैं तो कोई ख़ास बात नहीं, ज़माने के साथ उन को बांटिए...आज तो ये सब नेट-वेट की इतनी सुविधाएं हैं कि आप जो भी लिख देंगे, इंटरनेट का पटल हमेशा के लिए उसे सहेज लेगा....इसलिए, मैं हरेक को कहता हूं कि लिखा करिए...अपने अनुभव, ज़िंदगी ने जो सिखाया....आपने उस से कितनी सीख ली ...ये सब सहेजिए...

खैर, मेरे पास तो लिखने का इतना मसाला है कि मुझे बहुत बार यही समझ नहीं आती कि यार आखिर शुरु कहां से करूं....अब ये जो लोकल ट्रेनें हैं और मुंबई के जो लोकल स्टेशन हैं, उन पर इतना कुछ लिखा जा सकता है लेकिन कुछ करने के लिए मूड ठीक चाहिए और फ़ुर्सत होनी चाहिए ...और मेरे केस में मेरा सिर भी ठीक होना चाहिए, कमबख्त बात बात पर दुःखने लगता है और फिर सारा दिन खटिया पर लेटे रहने को मजबूर कर देता है ...मैं भी कोई कम थोड़े न हूं ...उस हालत में भी पड़ा पड़ा ख्याली पुलाव बनाता रहता हूं ..

दादर स्टेशन का मेन पुल ...मध्य रेल और पश्चिम रेल के बीच सेतु 


अच्छा, आज मुझे दादर स्टेशन के बारे में कुछ कहना है ...दादर स्टेशन - एक स्टेशन जिस की यादें मेरे बचपन की यादों में बड़े प्यार से गुंथी पड़ी हैं....१९७० का दशक ...हम लोग अमृतसर से अकसर डीलक्स ट्रेन सुबह साढ़े छः बजे के करीब लेते थे ....जो अगले दिन बाद दोपहर ढ़ाई बजे के करीब दादर स्टेशन पर पहुंच जाया करती थी, वहां से हमें लेने आए रिश्तेदार अपनी गाड़ी में या कभी कभी टैक्सी में लेकर चेंबूर के लिए निकल पड़ते ...ज़्यादातर रिश्तेदार तब चेंबूर में ही रहते थे...

दादर का मुंबई वासियों की ज़िंदगी में बडी अहमियत है ...एक तो यहां से लोकल ट्रेन में यात्रा करने वालों को पश्चिम और मध्य रेल की लोकल गाड़ियों की अदला बदला करने को मिलती है ...इंटरचेज स्टेशन ...वैेसे तो कईं दूसरे स्टेशन भी हैं, लेकिन दादर ठहरा दादर ....किसी भी वक्त यहां पर लोगों का हुजूम देिख जाता है ..सब अपनी धुन में चले जाते हैं...मैं कईं बार सोचता हूं कि मुंबई में आ कर रहने वाली की कुछ परेशानियां तो तब खत्म हो जाती हैं जब उसे मुंबई की लोकल गाडि़यों का रूट-मैप समझ में आ जाता है ...आज नेट की वजह से, नए नए ऐप की वजह से यह जितना आसां हो गया है, उतना आज से तीस-चालीस बरस पहले न था ...मैं जब नया नया मुंबई में आया तो मेरे भाई ने मुझे कागज़ पर लोकल स्टेशनों के नाम - सेंट्रल और वेस्ट्रन दोनों के - लिख दिए थे और साथ में इंटरचेंज स्टेशन के बारे में बता दिया था...मैं अगर एक दो बरस नहीं भी तो भी कुछ महीने तक तो उस कागज़ को अपनी जेब में रखता था ...और पहले लोकल ट्रेनों में दरवाज़े के पास मध्य और पश्चिम रेल का एक रूट-मैप लगा रहता था ...जिसे लोग यात्रा करते वक्त निहारते रहते थे ....अच्छा गाइड का काम करता था वह रूट मैप...

दादर स्टेशन - मध्य रेल का और पश्चिम रेल का एक ही है ....प्लेटफार्म अलग अलग हैं....मुझे तो इतने बरस हो गए हैं इस स्टेशन पर आते-जाते, अभी तक मैं उस स्टेशन को अच्छे से समझ नहीं पाया...मेरे कहने का मतलब है कि अकसर मुझे नहीं पता चलता कि यह सीढ़ियां या यह एक्सकेलेटर किस पुल पर ले जाएगा....पिछले बीस तीस बरसों में दादर स्टेशन का इतना कायाकल्प हुआ है कि मेरे जैसे इंसान के लिए इस का लेखा-जोखा, इस की ओरिएंटेशन रखना भी मुश्किल है ....

इतने ज़्यादा सामान की हमें क्या फ़िक्र - बापू ले कर आए हैं, वही जाने कैसे लदेगा यह सब, हमें तो मस्ती से मतलब है ..

सब से बड़ा कौतूहल मेरे मन में जो बरसों से है वह यह है कि जब हम लोग डी-लक्स ट्रेन पर आते थे ...जिसे बाद में पश्चिम एक्सप्रे कहने लगे ...तो दादर उतर थे, तो टैक्सी से बाहर निकल कर किसी पुल से होते हुए सीधा आम्बेडकर रोड़ पर निकलते थे ...जो माटुंगा सायन को जाती है ...कुछ बरसों से मैं इस प्रश्न से जूझ रहा हूं कि हम जहां पर उतरते थे वह तो पश्चिम रेल का एरिया है और उस के आगे तो मध्य रेल का एरिया है ...इतने प्लेटफार्म हैं..और फिर बाद में मध्य रेल के दादर स्टेशन का बाहरी इलाका शुरू हो जाता है ....इस के समाधान के लिए मैंने कईं बार सोचा कि एक बार दादर स्टेशन के किसी ऊंचे से ब्रिज पर खड़े होकर सभी तरफ देखने की कोशिश करूंगा ...तो शायद बात मेरे पल्ले पड़ जाए ...

सच में दादर मेरे लिए अभी भी भूल-भुलैयां जैसा ही है ...जैसा कि मैंने ऊपर लिख ही दिया...लेकिन एक बात यह भी है न कि अगर हम लोग किसी चीज़ को ज़्यादा समझने की कोशिश करेंगे तो शायद यही होगा, दिमाग पर वज़न ही पडे़गा ....वैसे भी बंबई में लोगों के पास इस तरह की मगज़मारी का वक्त ही कहां है, उन्हें अगर ५.१३ की फास्ट लोकल चाहिए तो उन्होंने अपनी दिमाग में जो घड़ी फिट कर रखी है, उसे अच्छे से पता है किस एस्केलेटर को लेकर, किस ब्रिज से होते हुए और कहां से नीचे उतर कर उस प्लेटफार्म पर आने वाली गाड़ी के किस डिब्बे की जगह पर खड़े होना है ....सब कुछ सैट है ...और इस दौरान न तो किसी को देखना है, न ही किसी के किसी भी झमेले में पड़ना है...

सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं ...लोग आते हैं, लोग जाते हैं....

दादर स्टेशन ऐसा है जहां पर इस के मेन ब्रिज पर (जो सेंट्रल और वेस्ट्रन लाइनों को भी जोड़ता है...वैसे तो सभी ब्रिज यही काम करते हैं ...और अब तो ब्रिज भी पर्याप्त संख्या में हैं और एस्केलेटर भी ...)....लोगों का समंदर तो देखने को मिलता ही है...सच में कईं बार ऐसा माहौल होता है ..जैसे कहते हैं न ..सावधानी हटी, दुर्घटना घटी....अगर आप ने थोड़ा भी इधर उधर देखा, अपने निशाने से चूक कर थोड़ा सा भी टस से मस हुए तो अगले पल आप को दूसरी तरफ से कोई टक्कर मार के निकल जाएगा....इसलिए फोकस बहुत ज़रूरी है ...😎 

इन पुलों पर बहुत कुछ चल रहा होता है ..जैसे किसी पुल पर किसी दिन अगर कोई रक्त-दान कैंप चल रहा होता है तो किसी दिन एच.आई.व्ही संक्रमण के संबंधित जागरूकता अभियान चल रहा होता है....कभी लिज्जत पापड़ वाली संस्था की कोई प्रदर्शनी ब्रिज पर ही किसी थोड़े से खुले एरिया में लगी दिखती है तो वहीं आस पास दो पुलों को जोड़ने वाले एरिया में एक शहर-एक उत्पाद का स्थायी स्टॉल दिख जाता है ....यहां वहां फूलों के गजरे बेचने वाली बैठी होती हैं, कोई दृष्टि बाधित अपनी बांसुरी वादन से लोगों के मन को लुभा रहा होता है ...और भी बिल्कुल छोटे मोटे काम-धंधे यहां अकसर चलते दिखते ही हैं....अकसर चलते फिरते .....कईं बार ब्रिज के बीचों बीच कुछ फरियादी बैठते दिखते हैं ...और कई ंबार सीढ़ियों पर भी ....

सपनों की नगरी कहते तो हैं बम्बई को...

कौन जाने कितनों के ख़्वाव साकार हुए, कितनों के राख ...

दादर स्टेशन के पुल के ऊपर कईं बार बीमार लोग भी दिखते हैं....जो दादर सेंट्रल की तरफ़ से केईएम अथवा टाटा अस्पताल जैसी जगहों के लिए बेस्ट बस सेवा का इस्तेमाल करते हैं....बस सेवा का स्तर बेहतरीन है ...शायद दस दस मिनट के अंतराल पर ए.सी बस सेवा है जो पांच-छः रूपये में पब्लिक को उन के गंतव्य स्थल तक पहुंचा देती हैं। बीमारों के स्वस्थ होने की दुआ ही तो कर सकते हैं ...लेकिन मन दुःखी होता है किसी की परेशानी देख कर। कल दोपहर में भी एक अधेड़ उम्र का पुरूष बहुत बीमार दिखा उसी मेन पुल पर ..साथ में उस की पत्नी और बेटा से शायद ...बेहद कमज़ोर दिख रहा था, चल नहीं पा रहा होगा...ब्रिज पर रेलिंग की टेक लगा कर बैठ गया...मुझे लगा उसे चक्कर आया होगा ...मैंने उस के बेटे से इशारा कर के पूछा कि पानी चाहिए....उसने अपने झोले की तरफ़ इशारा कर के मुझे बताया कि है, पानी है ....बस, इतने से ही मेरी ड्यूटी पूरी हो गई और मैं आगे बढ़ गया...यही मुंबई है ...

पटरियों का रख-रखाव भी निरंतर चलता रहता है ...ट्रैकमैन अपने काम में लगे रहते हैं...

मुंबई के लोकल स्टेशनों की मेरे पास कम से कम एक हज़ार तो तस्वीरें होंगी लेकिन अब देखिए मेरा आलस कि यहां इस पोस्ट में लगाने के लिए मुझे फोटो ढूंढने की फुर्सत नहीं है ...ये तस्वीरें हैं जिन में ज़िंदगी के लगभग सभी रूप देखने को मिलते हैं ....मैं कोई हिंदी का न तो विद्वान हूं और न ही कोई साहित्यकार ...यह जो हिंदी थोड़ी बहुत लिख लेता हूं यह लिखते रहने का ही नतीजा होगा...हिंदी की अखबार और किताबें पढ़ता रहता हूं ...और लखनऊ में जो सात आठ बरस रहा, उस से हिंदी में कुछ तो सुधार हुआ ही होगा...लखनऊ जगह ही ऐसी है ...बिना कुछ किए आप की हिंदी लखनऊ ठीक कर देता है ...हां, तो वहां रहते हुए कईं बार सुना था कि जीवन में नौ रंग होते हैं ...वात्सल्य, प्रेम, करुणा, पीड़ा ...देखिए, मेरा सतही ज्ञान ...मुझे तो इन के नाम भी नहीं आते ..लेकिन इतना मैं कह सकता हूं कि दादर स्टेशन के पुलों पर और इस के प्लेटफार्मों पर खड़े खड़े आप को सभी नौ रस अनुभव करने का मौका मिल सकता है ....

यह भी दो साल पहले लिखा था ..

दादर स्टेशन के मध्य रेल के प्लेटफार्मो पर बहुत अच्छी अच्छी पेंटिंग्स देखने को मिलती हैं...यह जो ऊपर दिख रही है, यह भी वहीं के किसी प्लेटफार्म की है दो बरस पहले की ...लिखा मैंने है उस के चेहरे के भाव देेख कर ....यह उन दिनों की बात है जब कोविड की दूसरी लहर चल रही थी...मैं अकसर इन पेंटिंग्स की तस्वीरें खींच लेता हूं ...
















दादर स्टेशन पर अकसर कर्मचारी संगठनों के बड़े नेताओं के फुल-बॉडी टाइप के बड़े पोस्टर भी नज़र आते हैं....दो दिन पहले की एक घटना का ज़िक़्र करना चाहता हूं...एक बुज़ुर्ग पुरुष रैंप से नीचे प्लेटफार्म पर उतरा और आते ही उसने सामने दिखे एक नेता की तस्वीर पर उस के पैर छू कर अपने माथे पर हाथ लगाया...। यह बिल्कुल सच्ची घटना है, मेरी आंखों देखी....और उस बंदे को ऐसा करते देख कर मैंं यही सोचने लगा कि हमारा जन-मानस भी कितना सीधा-सरल है....इससे पहले कि मुझे कुछ और सोचने का मौका मिलता मेरी लोकल आ गई और मैं उस में सवार हो गया...

दादर स्टेशन पर पांच दस मिनट बिताने को मिलें तो बंदा रेलवे विभाग की कार्य कुशलता की दाद देने पर मजबूर हो जाता है ..हर दो मिनट के बाद स्लो और फॉस्ट लोकल आ जा रही हैं ...और बीच बीच में बाहर गांव की गाड़ियां (आउट-स्टेशन ट्रेन) दादर से आ जा रही हैं ....ये गाड़ीयां आती हैं दो मिनट रूक कर आगे निकल जाती हैं और अगले मिनट ही उसी प्लेटफार्म पर लोकल गाड़ी यात्रियों की सेवा के लिए हाज़िर हो जाती है...यह सारी व्यवस्था जिन रेल कर्मियों एवं अधिकारियों के जिम्मे है, उन को सलाम .... लोगों के इतने समंदर को कंट्रोल में रखना....यह किसी अजूबे से कम नहीं है...

रेल प्रशासन की नज़र एक एक गतिविधि पर रहती है ....लोकल स्टेशनों पर जो हो रहा है ...दादर मध्य रेल का प्लेटफार्म नंबर १ की चौड़ाई थोड़ी कम है ...अब भीड़ ज़्यादा होने लगी है ..कुछ महीने पहले कुछ युवक लोकल गाड़ी के नीचे आ गए थे ...अब सुन रहे हैं कि इस प्लेटफार्म की चौड़ाई शीघ्र बड़ाई जा रही है ..वैसे अभी भी समुचित पुलिस कर्मी तैनात कर के उस प्लेटफार्म की भीड़ को नियंत्रित किया जाता है ताकि लोग इधर उधर एक दूसरे से न टकराएं और सजग-सचेत हो कर चलें....कईं बार प्लेटफार्म पर भी गाड़ी चढ़ते उतरते वक्त ऐसा कुछ लफडा हो जाता है ...देखिए इस काका की कमीज़ का बटन एक महिला के बैग की ज़िप में अटक गया...छूट तो गया बाद में लेकिन आने जाने वाले लोग ...क्या काका, क्या काका कहने से कहां चूके!! 😎


एक बात तो मैं लिखना भूल ही गया कि आज से पच्चीस तीस बरस पहले मैंने भी बच्चों के लिए दादर स्टेशन के ब्रिज से बहुत खिलौने खरीदे हैं- पानी में चलने वाली नांव, साबुन के लिक्विड से बबल बनाने वाला खिलौना, हैलीकाप्टर (जो घर आ कर पहली उड़ान भरते वक्त ही धाराशाही हो गया था), हवाईजहाज़ 😀...एक दो बार तो मैं वहां से बच्चों की सूती निक्कर-और कमीज़ें ले आया ...यही कोई ३०-३५ रूपये में बच्चों की कमीज़ मिलती थी तब पुल पर बैठे हुए उन हॉकरों से ...और बेटे को इतनी पसंद आई कि वह उसे ही पहनना पसंद करता था ...

जाते जाते एक बात और दिख गई जो मैंने लिखी थी कैलीग्राफी सीखने के दौरान ...वैसे दादर स्टेशन की बातें अभी पूरी नहीं हुई हैं, इस की और इस के आसपास की बातें अभी बची हुई हैं, फिर कभी समेट लेंगे ...😎


1 comment:

  1. एक दोस्त ने यह कमैंट लिख भेजा है ...बहुत बहुत धन्यवाद शर्मा जी ....

    "इंडिया को समझना है तो दादर स्टेशन परिसर में एक घंटा बिता लें....तो कितना मुश्किल और आसान देश है, कईं बोलीयां, कईं रंग कई पोशाक, अलग अलग तरह के नयन नक्श वाले लोग...तालमेल लगभग एक जैसा। सर नीचे कर के, स्लीपर को घिसते हुए बड़े बुज़ुर्ग, बच्चों की शैतानी, सामान और उस की रखवाली...यानि कोई भी कोना स्टेशन ऐसा नहीं जहां पर चहल पहल न हो।

    यह बॉम्बे ही है जहां पर एक दूसरे से अलग ज़रूर दिखते हैं ...पर यही हमारे देश की छवि है और ऐसा ही होना चाहिए। मैं कौन तुम कौन यहां आकर सब एक जैसे दिखते हैं..। पैसेंजर गाड़ी में हिंदुस्तानी कहीं जा रहे हों, बिना किसी खटपट के मिल जुल कर चले जाते हैं...अपने अपने स्टेशन पर उतर कर विदा हो जाते हैं...कभी कभी लगता है यह सफ़र तो कहीं न खत्म होगा...

    दादर स्टेशन इस अहसास का जीता जागता मिसाल है ...
    धन्यवाद ...."

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