Saturday, 15 July 2023

चाय पे चर्चा .....

मैं अकसर सोचता हूं कि आज से २०-२५ बरस पहले जब लिखने का बहुत जज़्बा था, चाहत थी ....लेकिन लिखने के गुर न पता थे ...एक लेख लिखने के बाद लगता था कि कुछ ही विषय हैं जिन पर हम लोग लिख सकते हैं...अब जब कुछ थोड़ा जान पाए हैं लिखते लिखते कि विषय तो हर तरफ़ बिखरे पड़े हैं...हमारे आस पास, हमारी ज़िंदगी में, हमारी गलियों में, फुटपाथों पर ...स्टेशनों पर, लोकल गाड़ियों में और हां, अखबारों में भी ....बहुत कुछ है जिस पर अभी लिखा जा सकता है, लेकिन अब लिखने का वैसा पैशन नहीं रहा, शाम होने तक इतना थक जाते हैं, घुटने दर्द करने लगते हैं ....ख्याल आता भी है लिखने का तो फिर लगता है छोड़ो, यार, बहुत हो गया....बस, ऐसे ही लिखना पीछे छूटता जा रहा है ...ढीठ बन कर ब्लॉग लिखने बैठ जाता हूं कि जो काम १६ बरसों से कर रहा हूं उसे कम से कम चालू तो रख सकूं....यह पोस्ट भी मैं कोई बीस दिन बाद लिख रहा हूं ...

पोस्ट में बात तो छोटी सी है लेकिन दर्ज करने लायक है ...छोटी छोटी हल्की फुल्की बातें भी ज़रूरी होती है, केवल सिर-खपाने और दुखाने वाली भारी भरकम बातों से भी कभी छुट्टी लेनी चाहिए। 

चाय पर चर्चा करनी है थोड़ी आज ...चाय, जो बचपन में हमें कम मिलती थी क्योंकि मां को यह यकीन था कि चाय पीने से रंग काला हो जाता है...हमें तो यही लगता कि यार, पता नहीं रंग काला हो जाएगा तो कौन सा कहर ढह जाएगा...लेकिन मुझे अच्छे से याद है दसवीं जमात तक हमें चाय पीने के लिए लगभग मिन्नत करनी पड़ती थी ...क्योंकि वही काले हो जाने का डर ...😎😇😅...लिखते लिखते यह भी लगता है कि उस ज़माने के लोग भी कितने सीधे-सपाट थे ...बस, जो बात दिलोदिमाग में घर कर गई सो कर गई ...उस से टस मस नहीं....हां, यह वह ५०-५५ साल पुराना दौर था जब गोरा होना भी एक गुण जैसा होता था ....मुझे अभी तक समझ नहीं आई कि अगर काले हो भी जाते तो क्या हो जाता....

लेकिन हां, हमें नानी के यहां चाय बिना किसी रोक टोक के मिल जाती ......कईं बार नाश्ता में भी चाय में रस्क डुबो कर खाने को मिलते ...अच्छे से याद है २-३ रूपए में हम लोग अंबाला छावनी की एक बेकरी से वे रस्क ले कर आते ...दो बड़े बड़े खाकी रंग के लिफाफे में रस्क भरे हुए (देखिए, हम ने तो हमेशा रस ही सुना है और बोला है ...लेकिन लिखते हुए रस्क लिख रहे हैं, क्योंकि आज बड़ी बड़ी बेकरियों और ब्रांडों में इसे रस्क ही कहते है ं...) ...नानी की चाय, अंगीठी पर बनी हुई ....शक्कर से लैस होती थी ...वो एक पंजाबी में कहावत जैसी एक बात है.....चाय में दुध रोक के ते मिट्ठा ठोक के ...(दूध कम डालना लेकिन शक्कर भरपूर डालना)...

हां, नानी की बनी चाय से एक बाद याद आई ..वह ज़िंदगी में पी हुई अब तक की सब से बेहतरीन चाय थी ...शायद भरपूर चीनी की वजह से और नानी के प्यार का अदृश्य टी-मसाला भी तो उसमें ज़रूर रहता ही था ...नानी कभी भी चाय को छन कर नहीं पीती थी क्योंकि वह कहती थी कि उस से चाय का साह-सत्त (पंजाबी शब्द, चाय की जान) निकल जाता है ....बरसों बरस हम लोग नानी के जाने के बाद भी उस की यह बात याद कर के मज़ा लेते.....वही आदत नानी से मां में आ गई ....और मां से मेरे में ....जब तक मां रही, मुझे भी मां के साथ बिना छनी हुई चाय ही पीने में मज़ा आता था ....और जब तक चाय पीने के बाद मुंह में पत्ती के कुछ दाने न रह जाएं ....लगता ही न था जैसे चाय पी है....😂

यह जो नानी के चाय के साह-सत्त निकलने की बात कही ...उस से मुझे एक घटना याद आ गई ...उन दिनों हम लोग फिरोज़पुर में थे . गाड़ी से दिल्ली जा रहे थे, भटिंड़ा में एक बंदे ने अपनी छोटी सी बेटी की फरमाईश पर लिमका की बोतल दिलाई .....उस की बेटी वह खुली हुई बोतल हाथ में थामे हुए आराम से उस का उस का मज़ा लेते हुए आहिस्ता २ पी रही थी, बीच में ब्रेक दे दे कर ...इतने में उस पेंडू ने बच्ची को लगभग डांटते हुए कह दिया......हुन पी वी लै ऐन्नू जल्दी, सारी गैंस निकल जाऊ (अब इस को जल्दी से पी भी ले, वरना इस की सारी गैस निकल जाएगी)....कुछ कुछ किस्से होते हैं जो याद रह जाते हैं ..जैसे भाखड़ा डैम बना तो सुना है बहुत से गांव के बुज़ुर्गों ने यह शिकायत कि अगर पानी से बिजली ही निकल गई तो फिर पानी दा साह-सत्त (पानी की जान) तो निकल गया समझो....

खैर, चाय की बात पर याद आता है कि कालेज के ज़माने से फिर हमने चाय जम कर पीनी शुरू की ...लगता है चाय तो एक बहाना था उस के साथ बेसन और मोताचूर के लड़्डू, और बहुत से आटे के बेकरी वाले बिस्कुट खाने का ...और कभी कभी जलेबी, समोसा और बर्फी भी ....अब जा कर ६० साल की उम्र में डाक्टर की सलाह पर चाय में मीठा कम डाल कर पीना शुरू किया है ..और बड़ी मुश्किल से इन लड्डूओं और बिस्कुटों पर लगाम कसी है ...वैसे, एक बात देखी है जब हम इन सब को खाना बंद करते हैं या बिल्कुल कम भी करते हैं तो वह अच्छा लगने लगता है ..आदत की बात है ...

यह उन दिनों की बात है .....यही कोई 12-13 साल पहले ...लेखक किसी गंभीर मंथन में मग्न 😂

लेकिन चाय की आदत तो ऐसी है कि हमें हमेशा से अच्छी तरह से उबली हुई, देशी चाय ही पसंद रही है ...मुझे ये तरह तरह की ग्रीन, ब्लैक, लेमन टी....और भी पता नहीं क्या क्या ....ट्राई बहुत सी की हैं लेकिन एक बार पी कर फिर कभी न पी ...उस डिप-डिप वाली नौटंकी से भी अपना कुछ नहीं होता ....हमें तो घर और बाहर वही उबली हुई चाय ही भाती है .....जहां भी ये ग्रीन-ब्लैक-लेमन ऑफर की जाती है ..एक घूंट भरने के बाद वहीं रख देते हैं....क्योंकि हमें वह हमेशा कड़वी दवाईयां ही लगती हैं....

इतने शांत स्वभाव वाला, अपने आप में मगन विक्रेता मैंने कम ही देखा है ...ये जो लंबे लंबे पत्ते हैं, यही चाय के पत्ते हैं....
(संपादित--यह पोस्ट लिखने के बाद मुझे नीचे कमैंट से याद आया है कि ये लेमन ग्रास है ...) 

जिस रास्ते से गुज़रता हूं यहां बंबई में वहां पर मेरी ही उम्र का एक बुज़ुर्ग कढ़ी-पत्ता और लंबे लंबे पत्ते रखे दिखता है ....जो उस का अंदाज़ है, सिर पर रूमाल लपेटे हुए ....बड़े इत्मीनान से बैठा दिखता है हमेशा ...कुछ महीने पहले जब जिज्ञासा को रोक नहीं पाया तो पूछ ही लिया कि ये बडे़ बड़े पत्ते क्या हैं....मुझे उस बंदे के हाव-भाव से यही लगता था हमेशा जैसे कि ये कोई पूजा में इस्तेमाल होने वाले पत्ते ही होंगे ज़रूर ...(मुंबई की सड़कों पर तीज-त्यौहारों के मौके पर पूजा-अर्चना के लिए नाना प्रकार के पत्ते बिकते हैं )....खैर, मेरा अनुमान गलत था ...उस बंदे ने बताया कि यह चाय है ..मुझे लगा कि यही होगी ग्रीन टी ...मैने एक बंडल खरीद लिया उन ताज़ा पत्तों का ...उसने बताया दो तीन दिन में इस्तेमाल कर लेना....

मैंने चाय बनाई और उसमें टाटा टी की चाय पत्ती की जगह उस के दो चार पत्तों को डाल दिया ....कुछ भी न हुआ...शायद मैंने नेट पर भी सर्च तो किया लेकिन कुछ मिला नहीं...बस, वे पत्ते वहीं रखे रखे सूख गए और फैंक दिए....

यह फोटू मैंने अजमेर में 10 साल पहले एक चाय के खोखे पर खींची थी, जहां पर मैंने चाय पी थी  ...
वैधानिक चेतावनी- धूम्रपान सेहत के लिए खतरनाक है ..

दो दिन पहले मैं और मेरे दो-तीन साथी एक जगह से गुज़र रहे थे तो एक ने कहा कि चलो, यहां से चाय बिस्कुट का नाश्ता करते हैं...नेकी और पूछ पूछ ...ये जो चाय की गुमटियां होती हैं न ....बीच रास्तों में, सड़क किनारे पर ...इन की चाय एक दम परफैक्ट होती है ...और यह बंबई की बात नहीं है ...देश से कोने कोने की बात है यह ...मैं तो किसी नईं जगह जाऊं तो सब से पहले ऐसी गुमटी ही ढूंढता हूं जहां दस बीस लोग घेरा डाल कर खड़े होते हैं ....कुछ अखबार पढ़ते दिखते हैं, कुछ फेफड़े सेंकते ....। हां, तो जब वह बंदा चाय तैयार कर रहा था तो उस ने उबलती चाय में एक हरा सा पत्तों का एक पैकेट सा फैंका ...मुझे उत्सुकता हुई कि यह क्या फैंका इसने ....मेरे एक साथी ने कहा कि यह हरी चाय का पत्ता है ...मैं समझा नहीं, मैंने उस के थैले में झांका जहां से उस ने उसे निकाला था ...सारा माजरा मेरी समझ में आ गया....कि ये चाय के पत्ते वही हैं जो बंबई के फुटपाथ पर बिकते हैं ....जिन को चाय पत्ती डालने के साथ साथ इस ढंग से इस्तेमाल करन होता है ....आप देखिए, अगर हम अपने आस पास देखते हुए चलते हैं, लोगों से बोलते-बतियाते हैं तो ज्ञान का क्या है, वह तो हमें कहीं से भी मिल सकता है ....हर इंसान जिस से हम मिलते हैं, वह ज्ञान का भंडार इस तरह से है कि वह ज़रूर कुछ न कुछ ऐसा जानता है जिसे हम नहीं जानते ...मैंने तो इसे आजमाया हुआ है ...और हां, उस चाय का ज़ायका मज़ेदार था, उस दिन से मैंने वैसी चाय पीने की शुरुआत की तो है ...देखते हैं यह शौक कितने दिन तक ढो पाते है ं...😎😂

चाय का ज़ायका बढ़ाने वाले जुगाड़ - लेमन-ग्रास, अदरक...

चाय की बात यहीं खत्म करते हैं ....आप भी इत्मीनान से चाय पीजिए...चाय की ताकत को कम मत समझिए....चाय बेचते बेचते, चाय पर चर्चा करते करते लोग कहां से कहां पहुच गए ....और , मेरी चाय की पत्ती वाली गुत्थी भी इसी चाय पर हुई चर्चा के चक्कर में उस दिन सुलझ गई .... 

ऊपर मैंने एक जगह मेरी मां के दिल में बसी हुई बात का ज़िक्र किया कि चाय पीने से रंग काला हो जाएगा.......वैसे, अगर ऐसा होता भी हो ऐसा तो क्या फ़र्क पड़ता है ....इस दुनिया के फुलवाडी़ की निराली शोभा ही इसीलिए है क्योंकि इस में  भिन्न भिन्न रंगों के इंसान रूपी फूल इस को शोभायमान कर रहे हैं....इसी बात से वह गीत याद आ गया....जंगल में दो फूल खिले, इक गोरा इस काला.... 😎

7 comments:

  1. चाय पर रोचक चर्चा ।
    चाय से रंग काला होने वाली बात सभी जगह चलती है और फिर भी सभी चाय पीते हैं।

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    1. साहित्य देश, आप का बहुत बहुत धन्यवाद,..आपने पोस्ट देखी और टिप्पणी भी लिखी....सादर प्रणाम्।

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  2. आपकी बात लाजवाब और मन को प्रफुल्लित करने वाला है। चाय पे चर्चा मनोहारी है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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    1. जी धन्यवाद आप का ....सोचता हूं कि पुराने दिनों की यादें अकसर प्रफुल्लित ही करती हैं, आप को भी मज़ा आया, बहुत अच्छा लगा...ऐसे ही मिलते रहिए।..

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  3. Chai par Rochakpost haiThe name of that leave is lemon grass and very famous kerala side

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    1. अनानीमस बंधु, आप का विशेष शुक्रिया कि आपने लेमन-ग्रास का नाम याद दिला दिया....सुबह से आप के सिवाए किसी ने नहीं कुछ कहा था इस के बारे में ...तहेदिल से शुक्रिया ...सादर प्रणाम्.

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  4. एक अज़ीज दोस्त हैं …पोस्ट पढ़ कर मुझे वाट्सएप पर अपनी राय भेजते हैं…दिल से लिखते हैं….मैंने उन को कहा है कि आप भी ब्लॉग लिखा करिए…कुछ नहीं है इसमें …लेकिन बात को टाल जाते हैं….(नाम नहीं लिख रहा हूूं…लेकिन उन की टिप्पणी यहां दर्ज करना इसलिए चाहता हूं कि उन की लिखी बातों से मेरे ब्लॉग में चार चांद लग जाते हैं….जैसे मेरी कही हुई बात को वह आगे बढ़ा देते हैं …

    चाय की बात से शुरू करते हैं..कितनी यादें हैं आप लिख कर संकलन करते जा रहे हैं। बहुत ही खूबसूरत विवरण है …नानी के हाथों की चाय शुद्ध प्यार से भरी होती है, तो उस से अच्छी उस की बेटी यानि मां ही बना पाती है, खानदानी डीएनका चक्कर होता है।

    जो चाय की गठडी आपने दिखाई है यह मेरे सुबह के टहलने के वक्त कोलाबा के ढाबे पर मिलता है, इस घस का बड़ा अद्भुत स्वाद है, मुंह तरोताज़ा हो जाता है…काले होने वाली बात हमारे यहां तो नहीं थीं पर चाय मिल जाए बडे़ कप में तभी तृप्ति होती थी ..

    हां, गांव में हम लोग भेड़ के मेमनों को सुबह सुबह हरी भरी घास चराने के लिए भेज देते थे . टुथब्रुश का कोई नाम नहीं, ..जब गड़रिया आवाज़ देकर पूछता था कि आज मेमनों को किस तरफ़ लेकर जाना है तो वह जहां खड़ा होकर यह पूछता, उसी दिशा में मेमनों को ले जाकर उस के हवाले कर देते थे। तब घर आते थे तो मीठी चाय और चीला जैसा रोटी दी जाती थी….

    चाय की एक रेड-लेबल ब्रांड की चाय आती थी 250 ग्राम की …अब तो भगवान मालिक है, कितने किस्म के और कितने डाक्टर हेल्थ के गुण गा गा कर नाना प्रकार की चाय बेचते हैं …ग्रीन टी, मसाला टी, डिप डिप, ताज महल चाय, पता नहीं और भी कितनी तरह की चाय पर जो चाय ढाबे में मिलती है वैसी चाय कहीं नहीं मिलती।

    और क्या कहें, अत्यंत मज़ा आया यादों के सिलसिले जब छिडे़ तो …हम कहां से कहां आ गए पर मां-बाप, नाना नानी, दादा-दादी तो हमारी रग रग में बसे रहते हैं …भले ही रोज़ याद नहीं आता हो पर बगिया तो उन की ही लगाई हुई है, कैसे भूल सकेंगे …

    आप के ब्लॉग में कुछ टिप्पणी करने से ही अच्छा लगता है …ज़िंदगी में कहने को बहुत है लेकिन आप जिस तह से लिखते हैं, हम दूर दूर तक कहीं नहीं हैं, पर इसी बहाने कुछ लिखा तो जा रहा है …

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1970 के दशक के शुरुआती साल ...हम बच्चे थे, छोटे ....😎 लेकिन अपनी कॉलोनी की एक महिला की बहादुरी का एक किस्सा सुना करते थे अकसर...बार बार ......