यह गुलशन नंदा या सुरेंद्र मोहन पाठक के किसी नावल से लिया गया वाक्या नहीं है ....सच्ची घटना है।
इसलिए मैं भी नॉन-वेज पर लिखते हुए थोड़ा झिझकता हूं....लेकिन ब्लॉग है, अपनी डॉयरी में कुछ भी लिख तो सकते ही हैं...कुछ मंज़र आते जाते रास्तों में ऐसे दिख जाते हैं कि बिना लिखे, बिना उन को दर्ज किए चैन भी नहीं पड़ता....क्या करें...
बंबई में मैं जहां रहता हूं वहां पर हमें सुबह सुबह कौओं की आवाज़ें ही सुनती हैं ....चलिए, कुछ तो सुनता है और अगर करीब के एक बाग में चले जाएं तो वहां सुबह सुबह मुर्गा बांग दे रहा था ....आज भी उस की बांग सुनी तो सोचा कि बाग से बाहर आते वक्त उस के पिंजरे में उसे देखते आएंगे .....लेकिन दिखा नहीं, क्या पता उसे बांग दिलाने के लिए माली कहीं किसी दूसरे एरिया में ले गया हो....इस शहर में कुछ भी मुमकिन है ....
दो दिन पहले मैं एक बाज़ार से निकल रहा था ...एक मुर्गे की दुकान के बाहर एक लोहे की तार से बनी टोकरी में गुर्गे ठूंसे पड़े थे, चलिए, वह तो अब आम बात दिखती है ...लेकिन उस तारों वाली टोकरी के ऊपर एक मुर्गा खड़ा था...मुझे अचानक हैरानी सी तो हुई एक बार कि यार, यह इतनी शांति से कैसे खड़ा है, फिर मुझे लगा कि अभी इस पर चाकू चलने की बारी होगी...इसलिए उस बड़े से पिंजरेनुमा शो-केस में से निकाल कर ऊपर रख दिया होगा...फिर भी मैं उसे दूर से देखता ही रहा ...एक अजीब सा ख्याल यह भी आया कि खड़ा तो ऐसे है जैसे इस को फेवीकोल से चिपका दिया गया हो...मैं आगे निकल गया...
वापिस आते वक्त मुझे उसी रास्ते से आना था ...मैंने थोड़ा सा ध्यान से देखा तो उस के पैर के पंजों को एक पतली सी रस्सी की मदद से उस शो-केस से बांधा हुआ था...मुझे यह देख कर बेहद पीड़ा हुई ...अगले दिन देखा एक की जगह दो मुर्गे इस ड्यूटी पर लगे थे कि लोगों को दूर से पता चल सके कि इधर आइए, मुर्गा आप के सामने हलाल किया जाएगा...मैं जब भी उस मंज़र को याद करता हूं तो दिल दहल जाता है ...
दिल दहलने से याद आया ...यही कोई दो तीन साल पहले की बात है ...एक २०-२२ बरस का युवक सुबह सवेरे एक बाज़ार से पैदल निकल रहा था ...और उस के दोनों कंधों पर मुर्गे टंगे हुए थे ....उन की टांगें बंधी हुईं और उल्टे लटकाए हुए...आदत से मजबूर मैंने एक तस्वीर तो खींच ली लेकिन इस डर के चलते कि यह कहीं वॉयरल हो कर समाज को अमन चैन ही न खराब कर दे, उसे किसी के साथ शेयर नहीं किया...
लेकिन, वक्त बीतने के साथ मैंने देखा कि मुर्गों को इस तरह से लेकर चलना .कंधों पर उल्टा लटका के, या हाथों में उल्टा पकड़ कर ...टांगें बांध कर ....या फिर साईकिल-स्कूटर की पिछली सीट के दोनों तरफ़ टांगे बंधे हुए मु्र्गे लटकाए हुए अकसर दिख जाते हैं ...वे पंक्षी इतने खौफ़ज़दा और इतने डरे-सहमे, बीमार दिखते हैं कि उन्हें देख कर यही लगता है कि इन्हें काट के क्या ताकत मिलेगी, क्या किसी की खून की कमी पूरी हो जाएगी....कुछ नहीं होगा, सिवाए इसके कि इतने खौफ़ज़दा परिंदे को मार कर खाने से ज़िंदगी में खलबली ही मचने वाली है ...और कुछ नहीं...
बंबई में ही नहीं, लखनऊ में भी मैं अकसर देखा करता था कि मुर्गे जो बिकने के लिए वाहनों में जा रहे हैं, वे एक दम डरे-सहमे, सिमटे हुए, दुबके हुए ...बीमार से, और इतने बीमार की उन के पेट फूले हुए और ऊपर से पंख गायब ....ये सब हम आप देखते हैं ...और इन मुर्गों को जल्दी से बड़ा करने के लिए जो कुछ खाया-पिलाया जाता है, और कईं बार मीडिया में इन को जो इंजेक्शन लगा कर हृष्ट-पुष्ट करने की तस्वीरे दिखती हैं, वे सब विचलित करने वाली होती हैं....यह भी कितनी अजीब सी बात है कि हमारा मन तो विचलित होने से ही घबरा रहा है और जिन की जान पर रोज़ बन आती है...उन का क्या !
यह धर्म-मज़हब की कोई क्या बात करे इस देश में ....विज्ञान की ही बात करनी मुनासिब है ......और वह यही है कि मानव शरीर की संरचना मांस-मच्छली खाने के लिए हुई ही नहीं है, अगर हम खाते भी हैं तो यह कुदरत के नियमों के ख़िलाफ़ है, लेकिन हमें क्या परवाह कुदरत की ....
इतनी गलतफहमियां हैं - इतनी भ्रामक जानकारियां है नॉन-वैज से संबंधित कि क्या कहें.....जो इन के बारे में सचेत करते है सच में कईं बार ऐसे लगता है कि बांग देने वाली है ...और इस के कुछ भी नतीजे हो सकते हैं...इतने बीमार, इतनी तकलीफ़ मे, इतने भूखे प्यासे मुर्गे खा कर क्या बनेंगे......बाई-सैप्स, ट्राई-सेप्स ...जब ये परिंदे इतने डरे-सहमे-बीमार होते हैं तो इन के शरीर में बहुत से हार्मोन्स रिलीज़ होते हैं ......और मीट मुर्गा खाने वाले उस विष को भी गटक जाते हैं ..खुशी खुशी ...चटखारे लगा के ...लज़ीज़ बटर-चिकन के ज़ायके के मतवाले उंगलियां चाटते भी तो देखे होंगे आपने ...
मुनव्वर राणा कहते हैं ...
एक निवाले के लिए मैेने जिसे मार दिया ..
वह परिंदा भी कईं दिन का भूखा निकला...
मैं अकसर देखता हूं कि मुर्गे की दुकान पर जिस फट्टे पर इन के टुकड़े किए जाते हैं उस पर दर्जनों टांगे पडी़ होती हैं मुर्गे की ....मुझे आज ख्याल आया कि क्या ये खरोड़े होते हैं...मैंने गूगल किया ....मुझे तब पता चला कि खरोड़े ये नहीं, वे तो बकरे के पैर होते हैं...
खरोड़ें मुझे याद इसलिए आते हैं कि अमृतसर के ऐतिहासिक हाथी गेट के अंदर ही हमारा स्कूल था...और उस के बिल्कुल आस पास कुछ रेहड़ीयां लगी देखा करते थे ...खरोड़े के सूप की ....कभी पिया तो नहीं लेकिन इस की तारीफ़े खूब सुना करते थे....और असलियत तो हम अब जानते हैं कि यह है क्या, आपने भी पढ़ ही लिया....अच्छा, लिखते लिखते याद आया कि जैसे ही खरोड़ों के खोमचों की लाइन खत्म होती ...और तंबाकू की दुकानें शुरू हो जातीं ...जहां से आने वाली बदबू की वजह से हमेें उन दुकानों के सामने से जल्दी आगे निकल जाने की जल्दी होती .......और ठीक स्कूल से सामने होती ...ताज़ा ताज़ा पतीसे की दुकान -महाजन की ..हमें तो उसे ही खाने से मतलब होता ....वह स्वाद, वह महक जो उन दिनों वहां के पतीसे में थी, वह फिर कहीं नज़र न आई ....चवन्नी (२५ पैसे) का पतीसा वह खुशमिज़ाज़ महाजन कागज़ में लपेट कर इतना दे देता कि वह सारे रस्ते खत्म ही न होता.....एक एक रेशा अलग पतीसे का ....देखिए, हम लोग भी ज़िदगी की किताब पढ़ कर फिर स्कूल में प्रवेश किया करते थे ...और एक पाठ, हाथी गेट के बाहर अमृतसर का श्मशान घाट ...उस उम्र में हमें उस के सामने से निकलते डर लगता था कि भूत-प्रेत, कोई आत्मा ही न गले पड़ जाए...
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अकसर मैं सोचता हूं कि यह ब्लॉगिंग वॉगिंग का चक्कर भी बांग देने जैसा ही काम है, अंज़ाम कुछ भी हो सकता है, ....लोग बेकार में खीझने लगते हैं....खीझ समझ में आती है ....कुछ आत्माएं ऐसी भी दिखीं ब्लॉगिंग के इन १५ बरसों में जो इस बात से परेशान हैं कि यह लिख कैसे लेता है यह सब ...हम सब भी सोचते यही हैं, लेकिन लिख नहीं पाते......उस का जवाब यही है कि कुछ भी करने के लिए, कुछ सीखने के लिए ज़िंदगी के बरसों-बरस उसे देने पड़ते हैं, कोई काम रातों-रात नहीं हो जाता.....मैने भी दिए है लेखन को २२-२३ बरस....और पूरी इमानदारी से कर रहा हूं ....लेकिन मुझे पता है कि अभी भी मैं सीखने की स्टेज पर ही हूं ....किसी को कुछ भी लगे...पर यह एक समंदर है, और समुद्र-मंथन कहां किसी मानस के बस की बात है ....बस, कभी कभी वाहनों के पीछे लिखी बात यूं ही याद आ जाती है......स़ड़ न, रीस कर ...(जलो नहीं, प्रेरणा लो)...
(लेखक ने ३० बरसों से मांस-मच्छली का सेवन नहीं किया)

आपकी सोच और नजर को सैलूट है सरजी 🙏👍
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