Sunday, 21 May 2023

बम्बई में दैनिक भास्कर की एंट्री ...

२२ मई २०२३ 

मुझे कल सुबह बोईसर में टाटा होम्स की एक टाउनशिप में कोई आशियाना देखने जाना था ...यही कोई आठ बजे के पास बोरिवली पहुंच गया और डहानू रोड़ के लिए किसी गाड़ी की इंतज़ार करने लगा...एक लोकल ट्रेन आई लिखा था उस पर डहानू रोड लेकिन बीच में कुछ स्टेशनों पर घोषणा होते सुनी कि यह गाड़ी पालघर स्टेशन पर ही खत्म कर दी जाएगी...आगे आज रेल्वे का जम्बो-ब्लॉक है....

पालघर ...अब एक ज़िला है ....(रेलवे स्टेशन..प्लेट-फार्म नं १).. .साफ सुथरा स्टेशन...

पालघर की दूरी मुंबई से १०० किलोमीटर से कुछ ज़्यादा है ...गाड़ी वहीं तक थी तो वहां उतरना ही था, अभी विचार कर ही रहा था कि बाहर से रिक्शा ले लूं कि बोईसर जाने वाली ट्रेन का इंतज़ार करूं ...१० किलोमीटर की दूरी है पालघर से बोईसर की ..इतने में प्लेटफार्म नंबर १ पर ए.एच.व्हीलर की दुकान दिखी ....बचपन से ही इन दुकानों से हमारा गहरा रिश्ता रहा है ....स्टेशन पर पहुंचते ही चंदामामा, पराग, नंदन, लोटपोट, मायापुरी...इन सब के पन्ने उलटने पलटने के लिए पहुंच जाते ...और हमेशा एक-दो खरीद भी लेते ....पुरानी आदतें नहीं छूटतीं ...यह आदत आज भी कायम है। 

पालघर का बुक स्टाल जहां हमारी दैनिक भास्कर मुंबई से मुलाकात हुई 

विभिन्न अखबारों को ताक रहा था कि दैनिक भास्कर अखबार देख कर आंखें उसी पर टिकी की टिकी रह गईं। सब से पहले ख्याल यही आया कि पालघर में यह पहुंच गया लेकिन मुंबई में नहीं...फिर उस को ध्यान से देखा तो पता चला कि यह तो मुंबई ही में छपा है। हैरानी हुई, कोई खबर नहीं हमें इस के आने की ...हमारे वर्तमान महानगर में इतनी बड़ी घटना हुई और वाट्सएप यूनिर्वसिटी से भी इस के बारे में पता न चला...

दुकानदार ने बताया कि यह ९ मई से बंबई से छपना शुरू हुआ है...मैंने उसे खरीदा और पढ़ना शुरू किया...दैनिक भास्कर को २००५ से २०२० तक उत्तर भारत के विभिन्न नगरों में रहते हुए पढ़ते रहे हैं...यहां मुंबई में नहीं दिखता था...अखबार एक ऐसी चीज़ है जिसे कोई किसी के कहने से नहीं पढ़ता और किस के हाथ में कौन सी अखबार होगी, यह भी वह खुद ही तय करता है। इसलिए अकसर हम लोग देखते हैं कि लोगों का अपने टुथपेस्ट, शेविंग क्रीम की तरह अपनी अखबार से भी एक भावनात्मक जुड़ाव सा हो जाता है ...

मुझे दैनिक भास्कर को वहां से लेकर बहुत खुशी हुई ...और यह हैरानी भी हुई कि यह अखबार के मुंबई में प्रवेश करने की खबर हमें बंबई से १०० किलोमीटर दूर पालघर में हासिल हुई...खैर, मिल गई, यही अच्छी बात है ...

अच्छा, पिछले लगभग १५ से भी ज़्यादा वर्षों से लोग कहते रहे हैं कि अब सारे अखबार लैपटाप-मोबाइल में आ गए हैं, इसलिए कहीं का भी अखबार कहीं बैठे बैठे देख लो.......वह सब हम जानते हैं लेकिन दिल का क्या करें, वह तो कमबख्त कागज़ की साक्षात अखबार को हाथ में पकड़ कर, फोल्ड करने, उस पर फांउटेन पेन से गोले लगाने, कुछ पंक्तियों को अंडरलाइन करने, एक -दो कतरन लेने और उन्हीं समाचार-पत्र के पन्नों को हाथ में लिए लिए सो जाने और सपने बुनने से बाज़ ही नहीं आता। जब अखबार हाथ में आता है न तो वह अपना लगता है ...यह हमारी मानसिकता है, इस का आप विश्लेषण कुछ भी करें...

कल के दैनिक भास्कर में छपे ये नंबर इस्तेमाल कीजिए....

कुछ अखबारें पढ़ते हुए अपने स्कूल में पढ़े-लिखे हुए समाचार पत्र के निबंध का ख्याल आ जाता है, दैनिक भास्कर जैसे अखबार में भी सभी आयुवर्ग के पाठकों के लिए कुछ न कुछ बढ़िया रहता है ....आप के लिए क्या है, आज ही से इसे लगवा लीजिए और इसे पढ़ने का आनंद लीजिए....

और जाते जाते एक बात तो लिखनी भूल गया....वहीं पालघऱ स्टेशन पर बैठे बैठे दैनिक भास्कर को पढ़ा कल भयंकर गर्मी थी ....दैनिक भास्कर को हाथ में लेकर दिल को ठंडक तो मिल चुकी थी लेकिन शरीर पर लगने वाली उमस भरी तपिश के लिए क्या करता, उस के लिए वहां के मशहूर एवं मीठे चीकू और मलाई वाला नारियल पानी बहुत काम के साबित हुए ....सारी तपिश ..रूह की, शरीर की भी जाती रही ..😎
वाह रे, पालघर के चीकू...तेरा भी जवाब नहीं!!

 बढ़िया मीठे चीकू और मलाईदार नारीयल पानी से बढ़िया नाश्ता क्या होता होगा🙌

शीर्षक लिखते वक्त एक बार लगा कि लिख दूं ..बम्बई में दैनिक भास्कर की हुई धमाकेदार एंट्री ..लेकिन यही लगा अगर कुछ धमाकेदार हुआ ही नहीं, उस के लिए किसी लफ्‍ज़ का इस्तेमाल करना खुशामद होगी, जो हमें गवारा नहीं ....जो बात हुई ही नहीं, उसे कैसे दर्ज कर दें और वह भी अपनी डॉयरी में, अखबार का पता ही हमें मुंबई से १०० किलोमीटर दूर जने पर चला..वैसे हमने कल २१ मई २०२३ का अखबार संभाल कर रख लिया है ..सोविनर की तरह ...😄... मुंबई में भी धाक जमाने के लिए दैनिक भास्कर को ज़रूरत होगी बहुत मेहनत करने की ...नीचे एक फिल्मी गीत में एक बालक किस तरह से अपना अखबार बेचने के लिए कितनी मशक्कत कर रहा है...दैनिक भास्कर को भी ऐसे ही इस महानगर के जन-मानस के दिलो-दिमाग में जगह बनानी होगी ....क्योंकि अब हम भी तो इस महानगरी की रग पहचानते हैं ....ज़्यादा नहीं तो थोड़ी सी सही। 

और जिस काम के लिए बोइसर गया था उस आशियाने की खिड़की से भी एक नज़ारा देखिए...एक बार तो लगा कि यहीं रूक जाऊं..क्या करना है वापिस उस कंकरीट के जंगल में जाकर ....फिर पापी पेट का ख्याल आ गया जो कमबख्त भरने का नाम ही नहीं ले रहा 😁😎😇...!!

बोइसर के टाटा होम्स के जिस आशियाने को देखने गया था, वहां से बाहर का मंज़र कुछ ऐसा दिख रहा था ...

डा प्रवीण चोपड़ा 
मुंबई 

6 comments:

  1. धन्यवाद सरजी आप कहाँ भी रहोगे खुष ही रहोगे । जांना था बोईसर लेकिन गाडी पालघर तक पहुँची और कॅनसल हूँ इतनी गर्मी, आप परेशान नहीं हुए , उसमें भी खुशी ढूंड ली और घर बैठे हमें भी खुशी दी आपका बहुत बहुत धन्यवाद सरजी 🙏🌷

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आप का ...
      सादर प्रणाम....

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  2. बहुत कुच्छ लिखना था लेकिन मोतियाबिंद और गोलकोमा है मै किसे कुच्छ मोबाइल से लिखता नहीं और मोबाइल जादा इसतेमाल कर्ता नहीं लेकिन रहा नहीं गया इसिलिए 🙏🌷

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    1. मोतियाबिंद और ग्लोकोमा से जूझते हुए भी आप के ये आशीर्वचन मुझ तक पहुंचे, ये बेशकीमती हैं, तहेदिल से शुक्रिया आपका...
      आभार,
      प्रवीण ...

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    2. Very nice sir ji aapne to dil hi jeet liya sir ji aapko salute hai sir ji

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  3. वाह सर, दैनिक भास्कर तो मुझे भी बहुत पसंद है। जबलपुर में जब यह शुरू हुआ था तो उसमें मैं लिखता भी था। गौरी शंकर शर्मा शायद संपादक थे। और उप संपादक थीं एक मैडम राजश्री रंजिता जिनके माध्यम से मेरे लेख व कहानी प्रकाशित होती थीं। एक सज्जन और थे पं. सतीश तिवारी, बहुत अच्छे लएखक विचारक आकाशवाणी के उद्घोषक, बहुत अच्छे फोटोग्राफर, यानी हरफनमौला और अपने आप में विचित्र। उन्हीं के जरिए रंजिता और शर्मा जी से परिचय हुआ। वे दैनिक भास्कर के फोटोग्राफर थे। सर आपको बहुत बहुत धन्यवाद। बहुत कुछ याद करा दिया। इस पर मैं भी लिखूंगा।

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